नारों के नीचे: उत्तर प्रदेश 2027 की राजनीति की असली दरारें
‘कॉउंटरकरंट्स’ में निहार नलिनी सारंगी ने लिखा है जातीय गणित अब भी वही भाषा है, जिसमें उत्तर प्रदेश की राजनीति बोली जाती है. लेकिन इस चुनावी चक्र में जो वाक्य लिखे जा रहे हैं, वे किसी और सवाल के बारे में हैं - किसे वोट देने की अनुमति है, किसके पास खोने के लिए कुछ नहीं है और भारत के भविष्य का कितना हिस्सा लखनऊ से होकर गुजरता है.
उत्तर प्रदेश के 2027 के विधानसभा चुनाव की हर चर्चा आखिरकार उसी परिचित व्याकरण में सिमट जाती है - पीडीए बनाम हिंदुत्व का ध्रुवीकरण, यादव-मुस्लिम बनाम बढ़ता गैर-यादव ओबीसी गठबंधन और बसपा की अनिश्चित तीसरी ताकत. यह विश्लेषण गलत नहीं है, लेकिन यह पुरानी खबर को नए विश्लेषण की तरह पेश करने जैसा है. उत्तर प्रदेश की राजनीति की सतही भाषा जाति है - जिसे समझना जरूरी है, लेकिन जो पूरी तस्वीर समझाने के लिए पर्याप्त नहीं है. इसके नीचे तीन शांत धाराएं काम कर रही हैं, जिनका असर नारों में दिखाई देने वाले प्रभाव से कहीं ज्यादा हो सकता है.
कौन मतदाता माना जाएगा, इसे लेकर लड़ाई
मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर इस साल राज्य की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना बन गया है. अपने तरीके से यह किसी भी राजनीतिक रैली से ज्यादा महत्वपूर्ण है. जनवरी में जारी मसौदा मतदाता सूची से करीब 2.9 करोड़ नाम गायब हो गए. इसके बाद दावों और आपत्तियों की प्रक्रिया पूरी होने पर अप्रैल में जारी अंतिम सूची में करीब 84 लाख मतदाताओं की शुद्ध बढ़ोतरी हुई.
समाजवादी पार्टी ने आरोप लगाया है कि नाम हटाने की कार्रवाई का असर गरीबों, प्रवासी मजदूरों और अल्पसंख्यकों पर अधिक पड़ा है - यानी ठीक उसी पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक गठबंधन पर, जिसे पार्टी मजबूत करने की कोशिश कर रही है. पार्टी ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ नाम ऐसे लोगों की शिकायतों के आधार पर हटाए गए, जिन्होंने खुद कहा कि उन्होंने ऐसी कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई थी.
निर्वाचन आयोग का कहना है कि यह लंबे समय से अत्यधिक बड़ी हो चुकी मतदाता सूची में दोहराव वाले नामों को हटाने की नियमित प्रक्रिया है. दोनों बातें प्रक्रियात्मक रूप से एक साथ सच हो सकती हैं और फिर भी उनके राजनीतिक परिणाम बेहद विस्फोटक हो सकते हैं.
2027 के लिए महत्वपूर्ण बात सिर्फ यह नहीं है कि इनमें से कौन-सा पक्ष सही है. असली महत्व इस बात का है कि मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग अब खुद मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर संदेह करने लगा है. जिस चुनाव में मतदाता सूची ही विवादित हो, वह केवल मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की लड़ाई नहीं रह जाता. यह इस सवाल की लड़ाई भी बन जाता है कि एक भी वोट पड़ने से पहले किसके मत को वैध माना जाए. यह एक नया और अस्थिर करने वाला राजनीतिक अंतर्धारा है - ऐसी अंतर्धारा जो केवल राजनीतिक खिलाड़ियों पर नहीं, बल्कि चुनाव के निर्णायक यानी निर्वाचन व्यवस्था पर भरोसा कमजोर करती है.
एक ऐसी पीढ़ी जिसके पास खोने के लिए कुछ नहीं
दूसरी धारा जाति की रेखाओं के साथ नहीं, बल्कि उन्हें काटते हुए आगे बढ़ रही है. हालिया ट्रैकिंग सर्वेक्षणों से पता चलता है कि उत्तर प्रदेश के 18 से 24 वर्ष के करीब आधे मतदाता राज्य सरकार से असंतुष्ट हैं. इन युवाओं की सबसे बड़ी चिंता बेरोजगारी है, जो पहचान से जुड़े मुद्दों सहित बाकी सभी मुद्दों से आगे है.
यह भी कोई नई बात नहीं है. भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक, सरकारी नियुक्तियों में संविदा व्यवस्था की ओर बढ़ता रुझान और बिजली जैसे विभागों का धीरे-धीरे निजीकरण 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को उत्तर प्रदेश में लगे झटके से काफी पहले से असंतोष के मुद्दे रहे हैं.
नई बात सरकार की ओर से इसका जवाब देने का पैमाना है - हर तिमाही रोजगार मेले, बीजेपी के लिए अपेक्षाकृत कमजोर पश्चिमी क्षेत्र को लक्ष्य बनाकर निवेश बढ़ाने की कोशिश और कल्याणकारी योजनाओं को रोजगार सृजन के रूप में नए तरीके से पेश करने का स्पष्ट प्रयास.
लेकिन इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि यह चिंता क्या संकेत देती है. असंतोष का एक ऐसा वर्ग उभर रहा है जो वास्तव में जाति से आगे का हो सकता है. ये युवा इतने छोटे हैं कि किसी जातीय बुजुर्ग के मतदान संबंधी निर्देश से ज्यादा प्रभाव उनके स्मार्टफोन पर दिखाई देने वाले रद्द किए गए परीक्षा के नोटिफिकेशन का हो सकता है.
अखिलेश यादव के नेतृत्व वाले विपक्ष ने इस बदलाव को सही ढंग से समझा है. यही वजह है कि उसके अभियान में पीडीए के साथ रोजगार, कीमतों और आरक्षण की बात भी एक साथ की जा रही है. यानी आर्थिक असंतोष को जातीय गठबंधन में शामिल किया जा रहा है, बजाय इसके कि केवल जाति के भरोसे चुनाव जीतने की कोशिश की जाए.
बड़े होते उत्तर प्रदेश की छाया
तीसरी धारा पर सबसे कम चर्चा हुई है और लंबे समय में शायद यही सबसे महत्वपूर्ण साबित हो. परिसीमन की प्रक्रिया अब संसद में आगे बढ़ रही है. यह लंबित जनगणना और महिला आरक्षण के वादे से जुड़ी हुई है. इसके तहत उत्तर प्रदेश की लोकसभा सीटों की संख्या मौजूदा 80 से बढ़कर करीब 130 होने की उम्मीद है.
किसी दूसरे राज्य को राजनीतिक प्रभाव के लिहाज से इतनी बड़ी बढ़ोतरी मिलने की संभावना नहीं है. यही वजह है कि 2027 के चुनाव पर इसकी लंबी छाया पड़ रही है, भले ही तब तक परिसीमन की प्रक्रिया पूरी न हुई हो.
लखनऊ पर नियंत्रण अब केवल भारत के सबसे बड़े राज्य पर नियंत्रण नहीं रह गया है. यह उस लोकसभा पर नियंत्रण की दिशा में भी एक अग्रिम कदम है, जिसका राजनीतिक ढांचा आने वाले समय में हिंदी हृदयभूमि की ओर अधिक झुक सकता है.
इससे केंद्र में बीजेपी के नेतृत्व के लिए 2027 का महत्व सामान्य सत्ता-विरोधी भावना से कहीं ज्यादा बढ़ जाता है. यह राज्य बीजेपी के लिए भी बड़ा दांव बन जाता है और ऐसे मुख्यमंत्री के लिए भी, जिनके बारे में लंबे समय से माना जाता है कि उनकी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाएं हैं. इसलिए 2027 का चुनाव उनके लिए सामान्य चुनाव के बजाय अस्तित्व का सवाल बन सकता है.
विपक्षी गठबंधन के लिए भी इससे जाति से कहीं अधिक मजबूत राजनीतिक तर्क निकलता है - इतना निर्णायक राज्य ऐसी मतदाता सूची प्रक्रिया की ओर नहीं बढ़ सकता, जिस पर लोगों का भरोसा कमजोर हो रहा हो, और न ही उसे ऐसे निराश और बेरोजगार युवा मतदाताओं के साथ आगे बढ़ना चाहिए जिन्हें अपने भविष्य की चिंता है.
सतह के नीचे की हलचल को पढ़ना
इन तीनों धाराओं को एक साथ देखें तो 2027 का चुनाव इस सवाल से कहीं आगे जाता दिखाई देता है कि कौन-सा जातीय समीकरण किसे पछाड़ देगा. इसके बजाय तीन शांत सवाल ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकते हैं - क्या मतदाता उस सूची पर भरोसा करते हैं जिसमें उनका नाम है, क्या युवाओं को उत्तर प्रदेश में अपना भविष्य दिखाई देता है और भारत की आने वाली लोकसभा की कितनी राजनीतिक ताकत वास्तव में कुछ साल पहले ही उत्तर प्रदेश की जमीन पर तय की जा रही है.
जातीय समीकरण अब भी अलग-अलग सीटों का फैसला करेंगे - इतने बड़े और सामाजिक रूप से जटिल राज्य में ऐसा होना तय है. लेकिन इन समीकरणों के नीचे चल रही धाराएं यह तय करेंगी कि सतह पर दिखाई देने वाला राजनीतिक गणित वास्तव में कायम रह पाएगा या नहीं.
(निहार नलिनी सारंगी राजनितिक टिप्पणीकार हैं. यह उनके अंग्रेजी लेख का हिंदी अनुवाद है.)

