ओडिशा में कागजों पर मृत 2,487 मजदूर फिर ‘जिंदा’, आधार से राशन लेते मिले

ओडिशा में निर्माण श्रमिकों के लिए चल रही ‘निर्माण श्रमिक’ कल्याण योजना में बड़े पैमाने पर अनियमितता सामने आई है. ‘द हिंदू’ में सत्यसुंदर बारिक की रिपोर्ट के मुताबिक, 2,487 निर्माण श्रमिकों को सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित कर उनके नामित व्यक्तियों को मृत्यु सहायता दी गई, जबकि ये श्रमिक बाद में भी राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून और राज्य खाद्य सुरक्षा योजना के तहत सब्सिडी वाला राशन लेते रहे.

15.10 करोड़ रुपये की मृत्यु सहायता

मामला तब और गंभीर हो जाता है जब 753 मामलों में इन कथित मृत श्रमिकों ने मृत्यु दर्ज होने के बाद राशन लेने के लिए अपने आधार की बायोमेट्रिक पहचान कराई. ऑडिट के मुताबिक, इन मामलों में नामित व्यक्तियों को कुल 15.10 करोड़ रुपये की मृत्यु सहायता दी गई.

मसौदा सूचना प्रणाली ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया है कि इससे संकेत मिलता है कि संबंधित लाभार्थी वास्तव में जीवित थे और उन्होंने स्वयं आधार प्रमाणीकरण कराया. इससे जीवित व्यक्तियों के नाम पर मृत्यु लाभ के फर्जी भुगतान और चिकित्सा अधिकारियों द्वारा जीवित लोगों के मृत्यु प्रमाण पत्र जारी किए जाने की आशंका सामने आती है.

यह ऑडिट रिपोर्ट ‘राज्य में पीएआरईश्रम और निर्माण श्रमिक पोर्टल के क्रियान्वयन’ से संबंधित है और वित्त वर्ष 2024-25 की नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी सीएजी रिपोर्ट का हिस्सा बनने की प्रक्रिया में है.

अलग-अलग सरकारी रिकॉर्ड में बड़ा विरोधाभास

ऑडिटरों ने निर्माण श्रमिक योजना के आंकड़ों का राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के रिकॉर्ड से मिलान किया. इसमें 3,013 ऐसे मृत्यु लाभार्थी मिले, जो एनएफएसए के तहत भी लाभ ले रहे थे. 914 मामलों में निर्माण श्रमिक रिकॉर्ड और एनएफएसए रिकॉर्ड में नाम अलग थे, लेकिन दोनों में एक ही आधार नंबर दर्ज था.

जन्म-मृत्यु पंजीकरण प्रणाली के आंकड़ों से भी रिकॉर्ड का मिलान किया गया. कुल 15,265 मृत्यु मामलों का मिलान हुआ, जबकि 9,325 मामलों का रिकॉर्ड नहीं मिला. 405 मामलों में जांच के दौरान मृत्यु प्रमाण पत्र फर्जी पाए गए या किसी दूसरे व्यक्ति का प्रमाण पत्र अपलोड किया गया था.

इन 405 मामलों में 268 मामलों में 5.49 करोड़ रुपये का लाभ जारी किया जा चुका था, जबकि 137 मामलों में 2.81 करोड़ रुपये की सहायता के आवेदन स्वीकृति की प्रक्रिया में थे. ऑडिटरों ने दो ऐसे लोगों से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात भी की, जिन्हें निर्माण श्रमिक योजना में मृत घोषित कर मृत्यु लाभ दिया गया था.

पहले भी सामने आया था घोटाला

निर्माण श्रमिक योजना के तहत 18 से 60 वर्ष की उम्र के वे निर्माण श्रमिक पात्र होते हैं, जिन्होंने पिछले 12 महीनों में कम से कम 90 दिन काम किया हो और किसी अन्य कल्याण कोष में पंजीकृत न हों. पात्र श्रमिक की मृत्यु पर नामित व्यक्ति को 2 लाख रुपये और अंतिम संस्कार के लिए 5,000 रुपये दिए जाते हैं. यह राशि निर्माण श्रमिक कल्याण बोर्ड के कोष से आती है, जिसमें निर्माण लागत पर एक प्रतिशत उपकर लगाया जाता है. 2024 तक बोर्ड के पास 4,000 करोड़ रुपये से अधिक जमा थे.

ऑडिट में विवाह सहायता योजना में भी गड़बड़ी मिली. 676 मामलों में विवाह प्रमाण पत्र की पंजीकरण तारीख वास्तविक विवाह की तारीख से पहले की थी.

‘द हिंदू’ ने अगस्त 2024 में भी इस योजना में फर्जीवाड़े की रिपोर्ट प्रकाशित की थी. उस समय ओडिशा के श्रम विभाग ने रायगढ़ा थाने में आपराधिक मामला दर्ज कर बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार के सबूत सौंपे थे. हालांकि, जांच से कोई निर्णायक नतीजा सामने नहीं आया और कथित रूप से मामले में शामिल श्रम अधिकारी को निलंबन के बाद फिर बहाल कर दिया गया.

अब सीएजी की मसौदा ऑडिट रिपोर्ट ने पुराने आरोपों को फिर सामने ला दिया है. रिपोर्ट फिलहाल अंतिम जांच और प्रकाशन की प्रक्रिया में है.

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