मनोज कुमार झा | बुद्ध, अंबेडकर और नेहरू का साझा दर्शन आज अधिक प्रासंगिक है

मनोज कुमार झा ने ‘द टेलीग्राफ’ में प्रकाशित अपने लेख में लिखा है कि भारतीय संविधान की कहानी प्रायः संस्थाओं, संसदीय बहसों, मौलिक अधिकारों, संघवाद और न्यायिक समीक्षा जैसे विधिक प्रावधानों के माध्यम से समझी जाती है. किंतु संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि नैतिक कल्पना का भंडार भी होता है. प्रत्येक संवैधानिक पाठ के मूल में मानव, समाज और सत्ता के संबंधों से जुड़ा एक गहरा दर्शन निहित होता है.

झा के मुताबिक, भारत का संविधान विविध बौद्धिक परंपराओं का संगम है. स्वतंत्रता संग्राम, उदारवादी संविधानवाद, समाजवाद और सामाजिक सुधार आंदोलनों के अनुभवों ने इसे आकार दिया. इन तमाम प्रभावों के बीच, सबसे मौलिक किंतु अक्सर उपेक्षित प्रभाव गौतम बुद्ध की दार्शनिक विरासत का रहा है. तर्क, करुणा, समानता और नैतिक उत्तरदायित्व पर बुद्ध के विचारों को आधुनिक भारत में दो प्रमुख व्याख्याकार मिले—डॉ. बी.आर. अंबेडकर और जवाहरलाल नेहरू. दोनों के दृष्टिकोण और उद्देश्य भिन्न थे, परंतु साथ मिलकर उन्होंने भारतीय लोकतंत्र को एक अद्वितीय नैतिक शब्दावली प्रदान की.

मानव स्वतंत्रता और तर्कसंगतता का दर्शन

अंबेडकर और नेहरू दोनों ने बुद्ध को किसी धर्म के संस्थापक तक सीमित न मानकर मानव स्वतंत्रता के दार्शनिक के रूप में देखा. बुद्ध ने भारत में वैचारिक जांच और तर्क की उस परंपरा की नींव रखी, जिसने अंधविश्वास, कर्मकांडीय पदानुक्रम और पारंपरिक सत्ता को चुनौती दी. 'कालामा सुत्त' में बुद्ध का यह संदेश कि किसी विचार को केवल परंपरा या ग्रंथ के आधार पर स्वीकार न करें, लोकतांत्रिक चेतना के अत्यधिक अनुकूल था. यह विचार प्रत्येक नागरिक के विवेक और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता की पुष्टि करता है.

नेहरू के लिए बुद्ध की यह शिक्षा आधुनिक भारत के निर्माण हेतु अत्यंत प्रासंगिक थी. 'द डिस्कवरी ऑफ इंडिया' में वे बुद्ध को भारत की तर्कसंगत और मानवतावादी परंपरा के संवाहक के रूप में देखते हैं. नेहरू का मानना था कि लोकतंत्र केवल चुनाव तक सीमित नहीं रह सकता; इसके लिए नागरिकों में 'वैज्ञानिक दृष्टिकोण' (साइंटिफिक टेम्परामेंट), बौद्धिक विनम्रता, सहिष्णुता और साक्ष्यों की जांच करने की प्रवृत्ति का होना अनिवार्य है.

सामाजिक मुक्ति और संवैधानिक नैतिकता

दूसरी ओर, डॉ. अंबेडकर ने बुद्ध के दर्शन में सामाजिक मुक्ति का आधार खोजा. उनका यह चिंतन जातिगत उत्पीड़न और सामाजिक बहिष्कार के विरुद्ध उनके आजीवन संघर्ष का परिणाम था. अंबेडकर का मानना था कि राजनीतिक लोकतंत्र तब तक स्थायी नहीं हो सकता जब तक समाज में 'क्रमिक असमानता' व्याप्त है. उनके अनुसार, सामाजिक उत्पीड़न केवल व्यक्तिगत नैतिक विफलता नहीं, बल्कि परंपराओं द्वारा पोषित एक संरचनात्मक बुराई है.

संविधान में बुद्ध का नाम प्रत्यक्ष रूप से दर्ज न होने पर भी इसकी अंतरात्मा में बौद्ध नीतियां समाहित हैं. मौलिक अधिकारों द्वारा अस्पृश्यता का अंत केवल एक सामाजिक कुरीति का उन्मूलन नहीं, बल्कि बहिष्कार के पूरे ढाँचे पर प्रहार है. नीति निदेशक तत्व विशेषाधिकार-रहित और न्याय-आधारित सामाजिक व्यवस्था की वकालत करते हैं. अपनी अंतिम कृति 'द बुद्ध एंड हिज धम्म' में अंबेडकर ने बौद्ध धर्म की पुनर्व्याख्या करते हुए इसे आध्यात्मिक मोक्ष के स्थान पर सामाजिक लोकतंत्र का दर्शन बताया. उनके अनुसार, धर्म का मुख्य सरोकार मनुष्यों के आपसी संबंध होने चाहिए, जहाँ कर्मकांड से ऊपर न्याय और धर्मशास्त्र से ऊपर नैतिकता स्थापित हो.

पूरक दृष्टिकोण और समकालीन प्रासंगिकता

नेहरू ने बुद्ध को भारत की बौद्धिक सभ्यता के शिल्पकार के रूप में देखा और नैतिक शासन पर बल दिया, जबकि अंबेडकर ने उन्हें शोषितों का मुक्तिदाता मानकर सामाजिक क्रांति का जरिया बनाया.ये दोनों विचार एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक थे. साथ मिलकर वे संवैधानिक लोकतंत्र के दो अनिवार्य स्तंभ बनते हैं.

लेखक का मानना है कि यही दार्शनिक संश्लेषण भारतीय संविधान को एक विशिष्ट नैतिक गहराई प्रदान करता है. यह केवल सत्ता का बंटवारा नहीं करता, बल्कि समाज के नैतिक रूपांतरण का प्रयास करता है. वर्तमान दौर में, जब कई लोकतंत्रों में संवैधानिक ढांचा तो कायम है लेकिन लोकतांत्रिक मूल्य कमजोर हो रहे हैं, जब बहुसंख्यकवाद और ध्रुवीकरण के कारण सार्वजनिक बहस में तर्क की जगह दुष्प्रचार ले रहा है, तब बुद्ध, अंबेडकर और नेहरू का यह साझा दर्शन अधिक प्रासंगिक हो जाता है.

संवैधानिक लोकतंत्र केवल एक राजनीतिक व्यवस्था नहीं, बल्कि मानव गरिमा का सम्मान करने और मनमानी सत्ता पर सवाल उठाने की निरंतर जीवन-शैली है. अंबेडकर ने संविधान को सामाजिक लोकतंत्र की भाषा दी और नेहरू ने इसे लोकतांत्रिक मानवतावाद से सींचा. इस वैचारिक जुगलबंदी ने यह सुनिश्चित किया कि भारत केवल एक राजनीतिक 'राज्य' न बनकर स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और मानवीय गरिमा पर आधारित एक नैतिक समुदाय के रूप में विकसित हो.

(मनोज कुमार झा राष्ट्रीय जनता दल से राज्यसभा सांसद हैं. यह अंग्रेजी में उनके मूल लेख का हिंदी में अनूदित सारांश है.)

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