बीजेपी शासित राज्यों के सभी कोयला बिजली टेंडर अडानी समूह के नाम, 25 वर्षों में 13.27 लाख करोड़ रुपये की होगी कमाई
‘द रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ में श्रीगिरीश जलिहाल की रिपोर्ट बताती है कि साल 2024 से भारत सरकार द्वारा दीर्घकालिक कोयला बिजली खरीद समझौतों (पीपीए) को दोबारा शुरू किए जाने के बाद से थर्मल पावर मार्केट में एक बड़ा उछाल आया है. इस नीतिगत बदलाव का सबसे बड़ा लाभ अडानी समूह को मिला है. समूह ने मार्च 2024 से जनवरी 2026 के बीच जारी निविदाओं (टेंडर्स) में अभूतपूर्व सफलता हासिल की है, जिससे उसे अगले 25 वर्षों में ₹13.27 लाख करोड़ से अधिक का अनुमानित राजस्व प्राप्त होने की संभावना है.
इस पूरे घटनाक्रम में एक विशेष राजनीतिक पैटर्न और राज्यों द्वारा दी गई नीतिगत रियायतें चर्चा का मुख्य विषय बनी हुई हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, अडानी समूह की इस व्यावसायिक सफलता में राजनीतिक सह-संबंध स्पष्ट रूप से दिखाई देता है: मसलन, बीजेपी शासित राज्यों का दबदबा दिखाई पड़ता है. मार्च 2024 से जनवरी 2026 के बीच देश में कुल 12 दीर्घकालिक बिजली अनुबंधों के लिए बोलियाँ मँगाई गईं. इनमें से 8 टेंडर बीजेपी शासित राज्यों द्वारा जारी किए गए थे. अडानी समूह ने इन सभी 8 अनुबंधों में जीत हासिल की—या तो स्वतंत्र विजेता के रूप में या फिर अन्य सफल बोलीदाताओं के साथ मिलकर.
विपक्ष शासित राज्यों की स्थिति यह है कि शेष 4 टेंडर विपक्ष शासित राज्यों द्वारा निकाले गए थे, जिनमें से अडानी समूह केवल एक ही जीत सका. पश्चिम बंगाल (तत्कालीन टीएमसी सरकार) में तो अडानी समूह योग्य घोषित होने के बाद भी स्वयं बोली प्रक्रिया से पीछे हट गया.
हालांकि, अडानी समूह ने राजनीतिक जुड़ाव पर अडानी पावर ने स्पष्ट किया कि उनकी भागीदारी पूरी तरह से खुली और प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रियाओं के माध्यम से रही है. इसका किसी राज्य की राजनीतिक संबद्धता से कोई लेना-देना नहीं है. कंपनी ने यह भी रेखांकित किया कि उन्होंने गैर-बीजेपी राज्यों में भी अनुबंध जीते हैं.
बिजली नीति में बदलाव (कोयला बिजली की वापसी का कारण)
प्रधानमंत्री मोदी के पहले और दूसरे कार्यकाल के दौरान थर्मल पावर अनुबंधों में गिरावट आई थी, जिसके तीन मुख्य कारण थे: आर्थिक गतिविधियों की सुस्ती, अंतर्राष्ट्रीय मंच पर जलवायु परिवर्तन (कोयले से दूरी) की प्रतिबद्धता और सौर ऊर्जा की गिरती कीमतें. लेकिन 2024 में यह रुख पूरी तरह पलट गया. नवीकरणीय ऊर्जा की सीमाएं हैं. सौर और पवन ऊर्जा स्वभाव से रुक-रुक कर (इंटरमिटेंट) मिलने वाले स्रोत हैं. रात के समय या बाद में उपयोग के लिए बिजली को स्टोर करना अभी भी अत्यधिक महंगा है. इसके विपरीत, ग्रिड स्थिरता बनाए रखने और चौबीसों घंटे बिजली आपूर्ति के लिए कोयला एक विश्वसनीय 'बेस-लोड' स्रोत है. कोविड महामारी के बाद देश में बिजली की औद्योगिक और नागरिक मांग तेजी से बढ़ी, जिसने सरकारों को थर्मल पावर की तरफ लौटने पर मजबूर किया. वर्ष 2024 के संसदीय चुनावों के करीब केंद्र सरकार ने ऐसी नीतियां बनाईं जिससे थर्मल पावर कंपनियों को आसानी से कोयला मिल सके और राज्यों के रूप में उन्हें एक पक्का खरीदार उपलब्ध हो. अगस्त 2024 में केंद्र ने 2031-32 तक थर्मल क्षमता में 80 गीगावाट (36.8% की वृद्धि) जोड़ने का लक्ष्य रखा, जिसे बाद में बढ़ाकर 95 गीगावाट कर दिया गया.
टेंडर शर्तों में बदलाव और राज्य सरकारों की मेहरबानियां
विभिन्न राज्यों में टेंडर की शर्तों को इस तरह से बदला गया, जिससे सीधे तौर पर अडानी समूह को लाभ पहुँचा. महाराष्ट्र का विवादित टेंडर: महाराष्ट्र सरकार ने बिना राज्य बिजली नियामक आयोग की अनिवार्य अनुमति के एक ऐसा टेंडर निकाला जिसमें कोयला बिजली के साथ प्रचुर मात्रा में सौर ऊर्जा की भी शर्त थी. ऐसी क्षमता देश में केवल अडानी समूह जैसी कुछ ही कंपनियों के पास थी. अन्य कंपनियों के विरोध के बावजूद यह टेंडर अडानी समूह को मिला.
असम में अतिरिक्त गारंटी: असम सरकार ने बिजली कर्मचारी संघ के विरोध के बावजूद अडानी समूह के आगामी 3200 मेगावाट क्षमता के प्लांट से अतिरिक्त बिजली खरीदने के लिए अपने राज्य के फंड की गारंटी दे दी, जबकि राज्य को इसकी आवश्यकता नहीं थी.
बिहार में ₹1 की लीज: बिहार सरकार ने अडानी समूह को थर्मल पावर प्लांट स्थापित करने के लिए "1 रुपये प्रति वर्ष" के नाममात्र के किराए पर 1,000 एकड़ की भारी-भरकम जमीन सौंप दी.
मध्य प्रदेश में 'ग्रीनशू' विकल्प: मध्य प्रदेश में जुलाई 2025 के टेंडर के बाद, केंद्र से अतिरिक्त कोयला मिलने पर राज्य ने 'ग्रीनशू विकल्प' का उपयोग किया. यह अतिरिक्त 800 मेगावाट क्षमता पहले दो अन्य कंपनियों को दी गई, जिन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया. अंततः 8 सितंबर 2025 को अडानी समूह ने इसे स्वीकार कर लिया.
राजस्व (कमाई) के अनुमान का गणित
अडानी समूह के लिए अनुमानित ₹13.27 लाख करोड़ का राजस्व विश्लेषण कुछ बुनियादी मानकों पर आधारित है: संयंत्रों को पूरे वर्ष उनकी कुल क्षमता के तीन-चौथाई (75%) पर संचालित माना गया है, वार्षिक बिजली उत्पादन को टेंडर में तय हुए टैरिफ से गुणा करके यह आंकड़ा निकाला गया है.
इस अनुमान में भविष्य में होने वाली मुद्रास्फीति (महंगाई), ईंधन की बढ़ती कीमतों या परिवहन लागत को नहीं जोड़ा गया है. चूंकि अनुबंधों में महंगाई के साथ भुगतान बढ़ाने का प्रावधान होता है, इसलिए वास्तविक कमाई इस अनुमान से भी कहीं अधिक हो सकती है.
इस पूरे परिदृश्य से स्पष्ट है कि केंद्र सरकार के कोयला आधारित बिजली विस्तार के महत्वाकांक्षी लक्ष्यों और राज्यों द्वारा दी गई अनुकूल परिस्थितियों के चलते भारतीय ऊर्जा बाजार में अडानी समूह एक 'एकछत्र राजा' (पोल पोजीशन) के रूप में स्थापित हो चुका है. निवेशकों के साथ बातचीत में खुद समूह ने भी माना है कि यह वित्तीय रूप से मजबूत और अनुभवी निजी खिलाड़ियों के लिए एक बेहद आकर्षक अवसर है.
(श्रीगिरीश जलिहाल की यह रिपोर्ट मूलतः अंग्रेजी में है, यहां इसका हिंदी में अनुदित सारांश दिया जा रहा है)

