क्या मतदाता सूची से नामों की कटौती ने बंगाल में बीजेपी की जीत की राह आसान की?
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने देश की राजनीति को चौंका दिया. भारतीय जनता पार्टी ने लगभग 70 प्रतिशत सीटें जीतकर सत्ता हासिल कर ली. लेकिन चुनावी नतीजों के बाद एक सवाल लगातार चर्चा में बना हुआ है. क्या चुनाव से पहले मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर हुई कटौती का चुनावी परिणामों पर असर पड़ा?
नवंबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच चुनाव आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान चलाया. इस प्रक्रिया के दौरान पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से 90 लाख से अधिक नाम हटाए गए. चुनाव आयोग का कहना है कि इनमें मृतक, स्थानांतरित, डुप्लिकेट और अन्य त्रुटिपूर्ण प्रविष्टियां शामिल थीं. लेकिन विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि बड़ी संख्या में वैध मतदाताओं के नाम भी सूची से हटा दिए गए.
इसी सवाल की जांच के लिए उपलब्ध चुनावी आंकड़ों का सांख्यिकीय विश्लेषण किया गया. उद्देश्य यह समझना था कि जिन क्षेत्रों में मतदाता सूची ज्यादा सिकुड़ी, क्या वहां बीजेपी को अपेक्षाकृत ज्यादा राजनीतिक लाभ मिला?
विश्लेषण का तरीका क्या था?
‘भानु जोशी’ और ‘नीलांजन सिरकार’ के इस अध्ययन में सीधे यह नहीं देखा गया कि हटाए गए मतदाताओं की संख्या जीत के अंतर से ज्यादा थी या कम. शोधकर्ताओं का तर्क है कि यह तरीका अधूरा है क्योंकि मतदाता सूची में बदलाव केवल कुछ वोट घटाने का मामला नहीं होता. इससे पूरे निर्वाचन क्षेत्र की राजनीतिक संरचना, सामाजिक गठबंधन और चुनावी माहौल प्रभावित हो सकता है.
इसलिए विश्लेषण का केंद्र यह था कि 2021 और 2026 के बीच बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस के वोट अंतर में कितना बदलाव आया और उसका संबंध मतदाता सूची में हुई कटौती से था या नहीं.
उदाहरण के तौर पर कोलकाता की भवानीपुर सीट को देखा गया. 2024 लोकसभा चुनाव के समय यहां 2.05 लाख मतदाता दर्ज थे. SIR के बाद यह संख्या घटकर लगभग 1.60 लाख रह गई, यानी करीब 22 प्रतिशत की कमी.
2021 में यहां बीजेपी तृणमूल से 22.5 प्रतिशत अंक पीछे थी. लेकिन 2026 में वही सीट बीजेपी के पक्ष में 10.8 प्रतिशत अंक चली गई. कुल मिलाकर यह सीट 33.3 प्रतिशत अंक बीजेपी की ओर खिसक गई.
बंगाल और बिहार की तुलना
विश्लेषण को अधिक विश्वसनीय बनाने के लिए बिहार के आंकड़ों की भी तुलना की गई. बिहार में भी एसआईआर जैसी प्रक्रिया हुई थी और वहां भी मतदाता सूची को लेकर विवाद सामने आए थे.
लेकिन दोनों राज्यों में एक महत्वपूर्ण अंतर दिखाई दिया.
पश्चिम बंगाल में औसतन मतदाता सूची 9.6 प्रतिशत तक सिकुड़ी, जबकि बिहार में यह आंकड़ा केवल 3 प्रतिशत था. यानी बंगाल में मतदाता सूची में कटौती का पैमाना कहीं अधिक बड़ा था.
अगर मतदाता सूची का सिकुड़ना स्वाभाविक रूप से सत्तारूढ़ दल को लाभ पहुंचाता, तो बिहार में भी ऐसा ही पैटर्न दिखाई देना चाहिए था. लेकिन वहां ऐसा नहीं हुआ.
आंकड़े क्या बताते हैं?
सांख्यिकीय विश्लेषण के लिए वोट-भारित रैखिक प्रतिगमन का इस्तेमाल किया गया. इसका उद्देश्य यह समझना था कि मतदाता सूची में कमी और चुनावी परिणामों के बीच कोई व्यवस्थित संबंध मौजूद है या नहीं.
नतीजे बताते हैं कि पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची में हर 1 प्रतिशत कमी बीजेपी-तृणमूल वोट अंतर में औसतन 0.38 प्रतिशत अंक के बीजेपी-समर्थक बदलाव से जुड़ी हुई थी.
दूसरे शब्दों में, यदि किसी क्षेत्र में मतदाता सूची 10 प्रतिशत सिकुड़ी, तो वहां लगभग 3.8 प्रतिशत अंक का झुकाव बीजेपी की ओर देखा गया.
इसके विपरीत बिहार में ऐसा कोई सकारात्मक संबंध नहीं मिला. वहां परिणाम सांख्यिकीय रूप से महत्वहीन रहे.
यही कारण है कि शोधकर्ताओं का मानना है कि बंगाल का पैटर्न केवल संयोग कहकर खारिज करना आसान नहीं है.
केवल कुल कटौती नहीं, अलग-अलग श्रेणियों में भी दिखा पैटर्न
विश्लेषण केवल कुल मतदाता कमी तक सीमित नहीं रहा. शोधकर्ताओं ने अलग-अलग प्रकार की हटाई गई प्रविष्टियों का भी अध्ययन किया.
इनमें गैर-मृतक हटाव, एएसडीडी श्रेणी (यानी अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या डुप्लिकेट) और अंतिम चरण में हुई सप्लीमेंट्री डिलीशन शामिल थीं.
तीनों श्रेणियों में एक समान रुझान दिखाई दिया. जहां इन हटावों का अनुपात ज्यादा था, वहां बीजेपी को अपेक्षाकृत अधिक चुनावी फायदा मिला.
यह निष्कर्ष यह साबित नहीं करता कि हटाए गए सभी मतदाता वैध थे या किसी तरह की धांधली हुई. लेकिन यह जरूर दिखाता है कि संबंध केवल एक व्यापक आंकड़े तक सीमित नहीं था, बल्कि अलग-अलग श्रेणियों में भी मौजूद था.
सीटों पर कितना असर पड़ सकता था?
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि मतदाता सूची में इतनी बड़ी कटौती नहीं हुई होती, तो क्या चुनाव परिणाम अलग हो सकते थे?
इसका जवाब देने के लिए शोधकर्ताओं ने एक "यूनिफॉर्म स्विंग मॉडल" का उपयोग किया. इस मॉडल में यह अनुमान लगाया जाता है कि वोट प्रतिशत में होने वाला बदलाव सभी सीटों पर समान रूप से लागू हुआ.
विश्लेषण के अनुसार 2021 से 2026 के बीच बीजेपी-तृणमूल वोट अंतर में औसतन 14.8 प्रतिशत अंक का बदलाव बीजेपी के पक्ष में हुआ.
मॉडल का अनुमान है कि यदि मतदाता सूची में कोई कमी नहीं होती, तब भी बीजेपी को लगभग 11 प्रतिशत अंक का लाभ मिलता. यानी कुल बदलाव में लगभग 3.8 प्रतिशत अंक उस पैटर्न से जुड़े दिखाई देते हैं जो मतदाता सूची के सिकुड़ने से संबंधित था.
इस स्थिति में भी बीजेपी लगभग 163 सीटें जीत सकती थी, जो बहुमत के लिए जरूरी 148 सीटों से अधिक है.
हालांकि मॉडल यह भी बताता है कि यदि बिना सूची कटौती वाले परिदृश्य में राज्यभर में केवल 2 प्रतिशत अतिरिक्त झुकाव तृणमूल के पक्ष में होता, तो विधानसभा में बीजेपी का बहुमत अनिश्चित हो सकता था.
इस विश्लेषण का मतलब क्या है?
यह अध्ययन यह दावा नहीं करता कि एसआईआर ने बीजेपी की जीत सुनिश्चित कर दी या मतदाता सूची से हटाए गए सभी लोग तृणमूल समर्थक थे. यह भी नहीं कहा गया है कि किसी प्रकार की चुनावी धांधली साबित हो गई है.
लेकिन आंकड़े एक महत्वपूर्ण तथ्य की ओर इशारा करते हैं. जिन निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाता सूची अधिक सिकुड़ी, वे क्षेत्र अपेक्षाकृत ज्यादा तेजी से बीजेपी की ओर झुके. बिहार में ऐसा पैटर्न नहीं मिला.
यही कारण है कि यह बहस केवल चुनावी नहीं बल्कि संस्थागत महत्व की भी है. किसी भी लोकतंत्र में मतदाता सूची को अद्यतन रखना जरूरी होता है ताकि मृतकों, डुप्लिकेट प्रविष्टियों और त्रुटियों को हटाया जा सके. लेकिन दूसरी ओर, यदि योग्य नागरिकों के नाम सूची से हट जाते हैं और यह प्रक्रिया किसी खास भौगोलिक पैटर्न में दिखाई देती है, तो इससे चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं.
लोकतंत्र में चुनाव आयोग की भूमिका प्रतियोगिता का संचालन करने की होती है, न कि उस मैदान को बदलने की जिस पर प्रतियोगिता लड़ी जाती है. पश्चिम बंगाल के एसआईआर को लेकर उठे सवाल इसी मूल सिद्धांत के इर्द-गिर्द घूमते हैं.
भानु जोशी और नीलांजन सिरकार के इस लेख का यह हिंदी में अनुदित सारांश है. अंग्रेजी में मूल लेख यहां पढ़ा जा सकता है.

