महंगी होती पढ़ाई: स्कूल फीस, कोचिंग और बढ़ता ख़र्च परिवारों पर भारी
भारत में बच्चों की पढ़ाई का ख़र्च लगातार बढ़ रहा है. परिवार अब स्कूल के साथ-साथ निजी कोचिंग पर भी ज़्यादा पैसा ख़र्च कर रहे हैं. 2025 के शिक्षा सर्वे के अनुसार, सेकेंडरी स्कूल के लगभग 38% छात्र कोचिंग लेते हैं, जबकि प्राइमरी स्तर पर यह संख्या 25% से भी कम है. विजय जाधव की इंडिया स्पेंड की रिपोर्ट के मुताबिक़ यह सर्वे अप्रैल से जून 2025 के बीच 52,085 घरों में किया गया था. इसमें यह भी सामने आया कि करीब 38% बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं, जहां प्रति छात्र खर्च सरकारी स्कूलों के मुकाबले लगभग 10 गुना ज़्यादा है. कुल मिलाकर, परिवार अपनी मासिक आय का 5% से 10% तक हिस्सा बच्चों की पढ़ाई पर खर्च कर रहे हैं.
शिक्षाविद किशोर दरक के अनुसार, शिक्षा सिर्फ फीस तक सीमित नहीं है. कई बार बच्चों की देखभाल के लिए मां को काम छोड़ना पड़ता है, जिससे परिवार की आय कम होती है. इसे भी शिक्षा की लागत माना जाना चाहिए. सर्वे के मुताबिक, प्री-प्राइमरी (नर्सरी) में एक बच्चे पर औसतन ₹9,807 सालाना खर्च होता है, जो सेकेंडरी स्कूल के खर्च का लगभग दो-तिहाई है.
प्री-प्राइमरी सेक्टर में नियम-कानून की भी कमी है, जिससे फीस पर कोई नियंत्रण नहीं है और अक्सर लोग इसे पढ़ाई पर ख़र्च हुए पैसे के तौर पर कम, बल्कि स्टेटस सिंबल की तरह देखते हैं.
शहरी इलाकों में पढ़ाई का ख़र्च गांवों से ज़्यादा है. शहरों में मिडिल स्कूल तक होने वाला ख़र्च गांव में होने वाले ख़र्च से लगभग तीन गुना ज़्यादा है. जबकि हायर सेकेंडरी तक आते आते यह ख़र्च दो गुना रह जाता है. इतना ही नहीं सरकारी स्कूल बनाम निजी स्कूल भी एक ऐसी बहस है जिसको लांघना मुश्किल है. सरकारी स्कूल में औसतन 2,863 रुपये ख़र्च होते हैं, और यही सालाना खर्च निजी स्कूल में बढ़ कर 28,693 रुपये होजाता है.
सरकारी स्कूलों में किताबें और स्टेशनरी कुल खर्च का 40% होती हैं, जबकि निजी स्कूलों में फीस करीब 65% होती है. हाल के वर्षों में सरकारी स्कूलों में नामांकन घटा है, जबकि निजी स्कूलों में बढ़ा है. माता-पिता बेहतर शिक्षा की उम्मीद में निजी स्कूल का चयन कर रहे हैं.
आज उच्च शिक्षा में दाखिला काफी हद तक प्रतियोगी परीक्षाओं पर निर्भर है और कोचिंग संस्थान इसमें अहम भूमिका निभाते हैं. प्री-प्राइमरी में 11.6% बच्चे कोचिंग लेते हैं, सेकेंडरी में यह बढ़कर 38.1% हो जाता है. प्री प्राइमरी तक इसके लिए 525 रुपये ख़र्च करना पड़ता है और हायर सेकेंडरी तक यह ख़र्च बढ़कर 6,311 हो जाता है.
अलग-अलग वर्गों में ख़र्च में भी अंतर देखा गया है. अनुसूचित जनजाति सालाना 7,363 ख़र्च करती है. वहीं अन्य वर्ग इससे 2 से 3 गुना ज़्यादा ख़र्च करने पर यक़ीन रखती है. हायर सेकेंडरी स्तर पर अन्य वर्ग के परिवार 40,348 प्रति छात्र खर्च करते हैं, जबकि ST परिवार 15,303 ख़र्च करते हैं.

