तेलंगाना में 30 लाख से अधिक मतदाता सुनवाई में नहीं पहुंचे, एसआईआर की समयसीमा करीब

‘साउथ फर्स्ट’ की रिपोर्ट के मुताबिक, तेलंगाना में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान नोटिस पाने वाले 30 लाख से अधिक मतदाता अब तक सुनवाई के लिए उपस्थित नहीं हुए हैं. मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) द्वारा मंगलवार, 29 सितंबर को जारी आंकड़ों के मुताबिक, दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की प्रक्रिया 7 अक्टूबर को समाप्त होगी, जबकि अंतिम मतदाता सूची 9 नवंबर को प्रकाशित की जानी है.

29 सितंबर तक निर्वाचन आयोग ने उन मतदाताओं को जारी किए जाने वाले 92,88,181 नोटिसों में से 92,88,180 तैयार कर लिए थे, जिनके मतदाता विवरण में विसंगतियां थीं या जिनका नाम 2002 की मतदाता सूची से नहीं जोड़ा जा सका था. केवल एक नोटिस तैयार होना बाकी था. तैयार नोटिसों में से 88,52,173 मतदाताओं तक पहुंचाए जा चुके थे, जबकि 4,36,007 नोटिस अभी वितरित नहीं हुए थे.

सीईओ कार्यालय के अनुसार, अब तक 61,87,444 सुनवाइयां पूरी की जा चुकी हैं. इनमें 48,88,076 मतदाता अंतिम सूची में शामिल किए जाने के योग्य पाए गए, जबकि 12,99,368 मामलों की जिला निर्वाचन अधिकारियों (डीईओ) द्वारा जांच की जा रही है.

पुनरीक्षण के दौरान 73,39,235 मतदाताओं को अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या दोहरी प्रविष्टि वाली श्रेणी यानी एएसडीडी सूची में रखा गया है. इस श्रेणी में शामिल मतदाताओं को नए मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए फॉर्म 6 जमा करना होगा. इसके साथ घोषणा-पत्र और संबंधित दस्तावेज भी देने होंगे.

देशभर में अब तक 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए

एसआईआर की शुरुआत जून 2025 में बिहार से हुई थी. इसके बाद इसे तीन चरणों में देश के अधिकांश हिस्सों तक बढ़ाया गया. पहला चरण सितंबर 2025 में पूरा हुआ. अप्रैल 2026 में समाप्त हुए दूसरे चरण में छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, केरल, मध्य प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के साथ अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह, लक्षद्वीप तथा पुडुचेरी शामिल थे.

तीसरे चरण में अब 16 राज्यों और तीन केंद्रशासित प्रदेशों में प्रक्रिया जारी है. इनमें आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना भी शामिल हैं.

निर्वाचन आयोग अब तक 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की मसौदा मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम हटा चुका है. नामों की बड़ी संख्या में कटौती और एसआईआर की वैधता को लेकर उठे सवालों के कारण आयोग की प्रक्रिया सार्वजनिक जांच और आलोचना के दायरे में है.

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