चुनाव आयोग पर नियंत्रण के आरोप और एसआईआर: सतही सुधारों से भरोसा बहाल होने पर सवाल

‘आर्टिकल 14’ में समर हलर्नकर ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर सवाल उठाए हैं. उनका तर्क है कि आयोग की ओर से हाल में घोषित सुधार मतदाता सूची से जुड़े संकट का समाधान नहीं करते. लेख में चुनाव आयोग पर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रभाव में काम करने और मतदाता पंजीकरण की व्यवस्था को केंद्रीकृत करने के आरोप लगाए गए हैं.

हलर्नकर ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक जांच का हवाला देते हुए लिखा है कि चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने मुख्य चुनाव आयुक्त के कुछ फैसलों पर बार-बार आपत्ति जताई थी. इनमें नए मतदाताओं को जोड़ने, नाम हटाने और एसआईआर लागू करने से जुड़े निर्णय शामिल थे. लेख के अनुसार, जांच का एक अहम पहलू मतदाता डेटाबेस के सॉफ्टवेयर को स्थानीय स्तर से हटाकर दिल्ली में केंद्रीकृत करने की कोशिश थी. लेखक का कहना है कि इससे मतदाताओं के नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया पर केंद्रीय नियंत्रण बढ़ सकता है.

चुनाव आयोग ने विवादित सॉफ्टवेयर के स्वतंत्र ऑडिट का आश्वासन दिया है. लेकिन हलर्नकर को संदेह है कि आयोग के भीतर बनी व्यवस्था को आसानी से बदला जा सकेगा. उन्होंने 28 सितंबर को भाजपा के 12 मुख्यमंत्रियों द्वारा आयोग का समर्थन किए जाने और एसआईआर के पक्ष में हिंदू संगठनों के प्रदर्शनों का भी उल्लेख किया है.

आयोग ने नोटिस पाने वाले मतदाताओं के घर जाकर सत्यापन करने की बात कही है. हालांकि, लेखक के अनुसार, बेघर और वंचित लोगों के पास अब भी 2002 की मतदाता सूची से संबंध या पहचान साबित करने वाले आवश्यक दस्तावेज़ नहीं हैं. दिल्ली के आश्रय गृहों में पुनः पंजीकरण शिविरों पर बेटवा शर्मा की रिपोर्ट का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि घर जाकर सत्यापन की व्यवस्था दस्तावेज़ों की कमी दूर नहीं करती.

लेख में पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ लंबित 37.3 लाख अपीलों का भी उल्लेख है. हलर्नकर के अनुसार, अब तक निपटाई गई करीब 1.2 लाख अपीलों में लगभग 92 प्रतिशत सफल रहीं. उन्होंने इसे पुनरीक्षण प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाने वाला तथ्य बताया है. साथ ही, उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका की आलोचना की है. यह लेखक का विश्लेषण है; अदालत ने 27 मई को कहा था कि एसआईआर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की संवैधानिक अनिवार्यता को कम नहीं करता.

हलर्नकर ने मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों, मतदान के आंकड़ों में अंतर और चुनावी रिकॉर्ड तक सीमित सार्वजनिक पहुंच को लेकर पहले उठे सवालों का भी जिक्र किया है. उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव के आंकड़ों, वोटों की संख्या में कथित विसंगतियों और सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी उपलब्ध न कराने के मामलों को चुनावी पारदर्शिता से जुड़ी चिंताओं के रूप में प्रस्तुत किया है. इन आरोपों और निष्कर्षों को लेकर लेख में उद्धृत रिपोर्टों तथा संबंधित पक्षों के दावों का संदर्भ दिया गया है.

लेख में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए हैं. हलर्नकर के अनुसार, नियुक्ति समिति में सरकार का बहुमत होने से चयन प्रक्रिया पर कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ता है. उन्होंने 2023 में नियुक्ति कानून में किए गए उस बदलाव का उल्लेख किया, जिसके तहत चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश को हटाया गया था.

हलर्नकर का निष्कर्ष है कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और मतदाता अधिकारों पर भरोसा बहाल करने के लिए केवल प्रक्रियागत आश्वासन पर्याप्त नहीं होंगे. उनके विचार में एसआईआर को समाप्त करने और आयोग की स्वायत्तता सुनिश्चित करने पर गंभीर कार्रवाई की आवश्यकता है.

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