कर्नाटक एसआईआर: ‘बड़ी संख्या में नाम हटाने के आवेदनों’ और ‘मतदाताओं पर बोझ’ को लेकर एनडीए में हलचल
कर्नाटक विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया में दावों और आपत्तियों के निपटारे की 15 अक्टूबर की समयसीमा जैसे-जैसे नज़दीक आ रही है, सूत्रों का कहना है कि नोटिस पाने वाले लगभग एक-चौथाई लोगों का अंतिम मतदाता सूची में जगह बना पाना मुश्किल है.
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में अकरम एम की रिपोर्ट के मुताबिक, कम से कम चार विधानसभा क्षेत्रों से मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए बड़े पैमाने पर आवेदन दिए जाने की शिकायतों के बीच, एनडीए खेमे के भीतर भी असहजता महसूस की जा रही है. भाजपा के सहयोगी दल जेडी(एस) के नेता निजी बातचीत में कर्नाटक में मतदाता नाम हटाने का "पश्चिम बंगाल मॉडल" लागू किए जाने की बात कर रहे हैं.
पश्चिम बंगाल में, राज्य विधानसभा चुनावों से पहले शुरू की गई एसआईआर प्रक्रिया नौ महीने बीत जाने के बाद भी अटकी हुई है. राज्य में मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने से जुड़ी लाखों अपीलें सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित न्यायाधिकरणों के समक्ष लंबित हैं.
'द इंडियन एक्सप्रेस' की उस जांच के बाद, जिसमें एसआईआर प्रक्रिया को लेकर भारत निर्वाचन आयोग के भीतर की कई चिंताओं को उजागर किया गया था, चुनाव आयोग ने नए निर्देशों का एक सेट जारी किया है. इसमें बूथ स्तर अधिकारियों (बीएलओ) द्वारा घर-घर जाकर दस्तावेजों का सत्यापन शामिल है. हालांकि, सभी ने इस कदम का स्वागत किया है, लेकिन कर्नाटक के अधिकारियों का कहना है कि आदेश अभी उन तक नहीं पहुँचने के कारण इसके क्रियान्वयन को लेकर असमंजस बना हुआ है.
एसआईआर प्रक्रिया शुरू होने से पहले, कर्नाटक में 5.54 करोड़ मतदाता थे. इनमें से लगभग 1 करोड़ मतदाताओं को गणना चरण के दौरान सूची से हटा दिया गया था, क्योंकि उन्हें अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृतक, हटाए गए और अन्य श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया था. प्रारूप मतदाता सूची में जगह बनाने वाले लगभग 4.4 करोड़ मतदाताओं में से 43.81 लाख लोगों को नोटिस जारी किए गए थे. यदि 20-25% यानी 9 से 11 लाख मतदाता वापस सूची में शामिल नहीं हो पाते हैं, जैसा कि अधिकारियों को अंदेशा है, तो कर्नाटक में कुल मतदाताओं की संख्या 5.54 करोड़ से घटकर लगभग 4.35 करोड़ रह जाएगी. एक सूत्र ने बताया, "ये मौजूदा अनुमान हैं. चुनाव आयोग द्वारा जारी नए निर्देशों के कारण अंतिम मतदाता संख्या में बढ़ोतरी हो सकती है."
यदि ऐसा होता भी है, तो जेडी(एस) के एक नेता ने कहा कि यह समझ से परे है कि पूरा एसआईआर का बोझ आम आदमी पर क्यों डाल दिया गया. "बीएलओ को गणना चरण की तरह पहले ही सत्यापन ड्यूटी पर लगाया जा सकता था. इसके बजाय, लोगों को अपने दस्तावेजों के साथ कतारों में खड़ा होने के लिए मजबूर किया गया है."
नेता ने कहा कि जेडी(एस) ने कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) की अध्यक्षता में हुई बैठकों में यह मुद्दा उठाया था. "सीईओ ने हमें बताया कि उन्होंने इस संबंध में एक प्रस्ताव भेजा था."
बूथ स्तर अधिकारियों द्वारा सत्यापन के संबंध में चुनाव आयोग की नई अधिसूचना के बाद, इस बात को लेकर भी भ्रम है कि सहायक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों (एईआरओ)— जिन्हें अब तक दस्तावेजों की जांच का काम सौंपा गया था — की भूमिका क्या होगी.
अधिकांश निर्वाचन क्षेत्रों में जारी किए गए नोटिसों की संख्या के आधार पर एईआरओ की नियुक्ति की गई थी. उदाहरण के लिए, उडुपी जिले के कापू निर्वाचन क्षेत्र में लगभग 20,000 नोटिस भेजे जाने के बाद, सुनवाई करने के लिए विभिन्न विभागों से 18 अतिरिक्त एईआरओ को प्रतिनियुक्त किया गया था.
24 अगस्त से शुरू हुए दावों और आपत्तियों के चरण के अंतिम कुछ दिनों में, मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए फॉर्म-7 को भारी संख्या में दाखिल किए जाने पर चुनाव आयोग को सवालों का सामना करना पड़ रहा है. जिन चार विधानसभा क्षेत्रों — भालकी, बाबलेश्वर, मुदिगेरे और बेलगाम उत्तर — से ऐसे आरोप सामने आए हैं, उनमें कुल 6,259 मतदाता शामिल हैं और ये सभी सीटें कांग्रेस विधायकों की हैं. मुदिगेरे में, अज्ञात व्यक्तियों द्वारा फॉर्म-7 आवेदन जमा करने के लिए बूथ लेवल एजेंट (जो पार्टी प्रतिनिधि होता है) के विवरण का "दुरुपयोग" करने पर चुनाव अधिकारियों ने पुलिस से संपर्क किया.
सीईओ कार्यालय के सूत्रों ने कहा कि इस प्रथा पर अंकुश लगाने के लिए चेतावनी जारी की गई है कि बिना सबूत के फॉर्म-7 आवेदन जमा करने वालों को कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है.
नामों को थोक में हटाने के ऐसे कई प्रयासों का दावा करते हुए कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बी के हरिप्रसाद ने कहा कि विजयपुरा जिले में एक व्यक्ति ने 18,000 फॉर्म-7 ले लिए थे. उन्होंने कहा, "अधिकारियों ने उन्हें चेतावनी दी कि फॉर्म-7 के कारण होने वाली किसी भी गड़बड़ी के लिए दंडात्मक कार्रवाई होगी." उन्होंने कहा कि बाद में शिकायतें वापस ले ली गईं और सतर्क अधिकारियों ने अन्य स्थानों पर भी ऐसी "धोखाधड़ी" को रोका है.
भाजपा के वरिष्ठ विधायक सुनील कुमार ने कहा कि इसे धोखाधड़ी कहना गलत है. "सत्यापन अंततः चुनाव आयोग द्वारा ही किया जाना है. नाम शामिल करने और हटाने के लिए फॉर्म कोई भी जमा कर सकता है."

