लोक व्यवस्था से ऊपर नहीं है ‘धर्म’: पटना हाईकोर्ट ने 300 श्रद्धालुओं के जुलूस की याचिका खारिज की
पटना हाईकोर्ट ने बिहार के सीवान जिले (हथौड़ा गांव) के ‘अखाड़ा नंबर-1’ के एक श्रद्धालु द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया है. याचिका में वार्षिक ‘महावीरी जुलूस’ में कम से कम 300 श्रद्धालुओं के शामिल होने और पारंपरिक मार्ग से जुलूस निकालने की अनुमति मांगी गई थी.
सौम्या पंवार की रिपोर्ट के अनुसार, न्यायमूर्ति आलोक कुमार की पीठ ने माना कि संविधान के अनुच्छेद 19(1) (बी) और 25 के तहत धार्मिक आचरण व जुलूस निकालने की स्वतंत्रता निरपेक्ष नहीं है. संवैधानिक संरक्षण केवल धार्मिक प्रथाओं के "आवश्यक और अभिन्न" हिस्सों को मिलता है, न कि उसे निभाने के हर तरीके या माध्यम को.
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य, नैतिकता और सामाजिक शांति बनाए रखने के लिए राज्य व्यक्तिगत अधिकारों पर वाजिब प्रतिबंध लगा सकता है. अनियंत्रित स्वतंत्रता समाज को बड़ा नुकसान पहुँचा सकती है.
याचिकाकर्ता का तर्क था कि 1958 से हर साल लाइसेंस दिया जा रहा था. 2012-13 में 200 श्रद्धालुओं की अनुमति को पुलिस ने बिना स्पष्ट कारण घटाकर 2023 में मात्र 5 कर दिया. याचिकाकर्ता ने इसे मनमाना और भेदभावपूर्ण बताया.
राज्य ने अदालत को अवगत कराया कि अनुमति केवल 5 लोगों की होने के बावजूद 2015-2022 के दौरान 1,700 से 2,000 लोग एकत्र हुए, जिससे कानून-व्यवस्था की गंभीर स्थिति पैदा हुई. 2024 में भीड़ द्वारा पुलिस पर पथराव और सरकारी वाहन में आग लगाने की घटनाएं भी हुईं.
हाईकोर्ट ने माना कि भविष्य के जुलूस में केवल 5 लोगों की अनुमति का दावा "समय से पहले और अनुचित" है. जुलूस की अनुमति और शर्तें उस समय की वास्तविक कानून-व्यवस्था की स्थिति पर निर्भर करेंगी. अदालत ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के साथ-साथ लोक शांति और जन-कल्याण सुनिश्चित करना राज्य का प्राथमिक कर्तव्य है.
महावीरी जुलूस उत्तर प्रदेश और बिहार में सदियों पुराना धार्मिक जुलूस है, जिसमें भगवान हनुमान के सम्मान में झंडों, युद्ध कलाओं (मार्शल आर्ट) और हथियारों का प्रदर्शन किया जाता है. इस वर्ष, इसके सितंबर में आयोजित होने की उम्मीद है.

