‘द क्विंट’ में राखी बोस की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के खिलाफ हुए प्रदर्शनों के दौरान कई मुस्लिम प्रदर्शनकारियों, छात्रों, कार्यकर्ताओं और पत्रकारों ने पुलिसकर्मियों तथा कथित दक्षिणपंथी समूहों पर धार्मिक पहचान के आधार पर निशाना बनाने, दुर्व्यवहार करने और हिंसा करने के आरोप लगाए हैं. कुछ प्रदर्शनकारियों का कहना है कि हिजाब या टोपी जैसे धार्मिक प्रतीकों के कारण उन्हें विशेष रूप से निशाना बनाया गया. हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र जांच और संबंधित पक्षों की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण है.
दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा और फ्रैटर्निटी मूवमेंट से जुड़ी हाइफा शफीक ने बताया कि 10 अक्टूबर को प्रदर्शन के दौरान जब उन्होंने अपनी एक साथी को हिरासत में लेने से रोकने की कोशिश की, तो महिला पुलिसकर्मियों ने उनका हिजाब खींचकर हटा दिया. शफीक के मुताबिक, इस घटना से उन्हें शारीरिक रूप से अपमानित महसूस हुआ.
उन्होंने बताया कि अगले दिन, 11 अक्टूबर को प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों ने उनके समूह को मीडिया से अलग कर दिया. उनके अनुसार, समूह में कई मुस्लिम प्रदर्शनकारी थे. पुलिसकर्मियों ने उनके नाम पूछे और फिर पुरुष प्रदर्शनकारियों की पिटाई की. शफीक ने इसे धार्मिक पहचान के आधार पर की गई लक्षित कार्रवाई बताया. द क्विंट ने इन घटनाओं पर स्पष्टीकरण के लिए कनॉट प्लेस पुलिस थाने से संपर्क किया, लेकिन एक अधिकारी ने फोन पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.
16 अक्टूबर को शफीक सहित छात्र संगठनों से जुड़ी आठ महिलाओं को कनॉट प्लेस पुलिस थाने में कथित तौर पर घसीटकर ले जाया गया और कई घंटों तक हिरासत में रखा गया. बाद में कार्यकर्ताओं के हस्तक्षेप से उन्हें रिहा कराया गया.
मुस्लिम महिलाओं और पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार के आरोप
स्वतंत्र डिजिटल समाचार मंच ‘मकतूब’ की पत्रकार फिदा फातिमा ने आरोप लगाया कि 11 अक्टूबर को कुछ कथित दक्षिणपंथी प्रदर्शनकारियों ने उन्हें ‘टोपी मीडिया’ कहकर संबोधित किया और पूछा कि क्या वह ‘बुरहान के खेमे’ से हैं. फातिमा के अनुसार, वह अन्य पत्रकारों के साथ प्रदर्शन की रिपोर्टिंग कर रही थीं, तभी कुछ लोग उनका पीछा करने लगे. उनके मुताबिक, उनमें से कई लोगों के गले में प्रेस कार्ड जैसे पहचान-पत्र लटके थे, लेकिन पूछने पर उन्होंने अपनी पहचान स्पष्ट नहीं की.
फातिमा ने बताया कि उन्होंने एक अन्य महिला को भी भीड़ द्वारा परेशान किए जाते देखा. वह महिला हिंदू थी और एसआईआर विरोधी प्रदर्शन का समर्थन कर रही थी. जब फातिमा ने उसकी मदद करने की कोशिश की, तो लोगों ने उन्हें ‘टोपी मीडिया’ कहना शुरू कर दिया. उनके अनुसार, यह शब्द उनकी मुस्लिम पहचान के संदर्भ में इस्तेमाल किया गया था.
फातिमा ने आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान मौजूद कुछ कथित दक्षिणपंथी पत्रकार मुस्लिम विरोधी प्रचार भी कर रहे थे. वे प्रदर्शनकारियों से पूछ रहे थे कि वे एसआईआर का विरोध क्यों कर रहे हैं और क्या वे कथित अवैध बांग्लादेशी तथा रोहिंग्या प्रवासियों को बचाना चाहते हैं.
गीतकार और कार्यकर्ता फरनाज (बदला हुआ नाम) ने बताया कि 12 अक्टूबर को कनॉट प्लेस में प्रदर्शन के दौरान एक व्यक्ति ने उनके साथ यौन दुर्व्यवहार किया. उनके मुताबिक, शोर मचाने पर एक अन्य प्रदर्शनकारी ने आरोपी को थप्पड़ मारा, जिसके बाद वह भाग गया. फरनाज ने आरोप लगाया कि आरोपी ने भीड़ का फायदा उठाकर उनके साथ दुर्व्यवहार किया. उन्होंने यह भी कहा कि मुस्लिम महिलाओं को उनकी धार्मिक पहचान के कारण निशाना बनाया जाता है.
वरिष्ठ पत्रकार और लेखिका राणा अय्यूब ने भी आरोप लगाया कि 10 अक्टूबर के प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में एक दक्षिणपंथी भीड़ ने उन्हें परेशान किया और ‘जिहादी मीडिया’ कहा. अय्यूब के मुताबिक, जब उन्होंने पास खड़े पुलिसकर्मियों से शिकायत की, तो उन्होंने उलटे उन पर ही पुरुषों को उकसाने का आरोप लगाया.
मुस्लिम महिला अधिकार मंच की कार्यकर्ता जकिया सोमन ने कहा कि मुस्लिमों के खिलाफ इस्तेमाल की जाने वाली सांप्रदायिक भाषा का असर पुलिस और प्रशासन जैसी संस्थाओं तक भी पहुंच सकता है. उन्होंने 2019 में झारखंड के दुमका में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक चुनावी भाषण का उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि हिंसा करने वालों की पहचान उनके कपड़ों से की जा सकती है.
‘टोपी वालों को पकड़ो’ का आरोप
फ्रैटर्निटी मूवमेंट के राष्ट्रीय महासचिव लुबैब बशीर ने आरोप लगाया कि 16 अक्टूबर को मध्य दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान उन्होंने वर्दी पहने एक पुलिस अधिकारी को ‘टोपी वालों को पकड़ो’ कहते सुना. उनके मुताबिक, प्रदर्शनकारियों को पुलिस और कुछ अज्ञात लोगों ने घेर रखा था. इसी दौरान किसी ने उनके सिर पर वार किया और उनकी टोपी उतार दी. बशीर ने कहा कि वह मुस्लिमों की सार्वजनिक उपस्थिति और अपनी पहचान को लेकर मुखर रहना जरूरी मानते हैं.
जामिया और शाहीन बाग में प्रदर्शन को लेकर आशंका
जामिया मिल्लिया इस्लामिया के पीएचडी शोधार्थी और कार्यकर्ता मोहम्मद अलफौज आजमी ने कहा कि ओखला, जामिया नगर और शाहीन बाग जैसे मुस्लिम आबादी वाले इलाकों में एसआईआर के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने की बात सामने आई है. इसके बावजूद, इन इलाकों के आम निवासी प्रदर्शन में शामिल होने से हिचक रहे हैं. उनके अनुसार, शाहीन बाग और जामिया के पुराने प्रदर्शनों के बाद हुई कार्रवाई की यादें अब भी लोगों के मन में हैं.
बशीर ने आरोप लगाया कि पुलिस कार्यकर्ताओं के घरों और कार्यालयों पर छापे मारकर लोगों को डराने की कोशिश कर रही है. उन्होंने कहा कि फ्रैटर्निटी मूवमेंट के कार्यालय पर भी छापा मारा गया. उनके मुताबिक, पुलिस की बार-बार मौजूदगी के कारण कुछ मकान मालिक और किरायेदार भी चिंतित हैं.
आजमी ने बताया कि 9 अक्टूबर को उन्हें जामिया नगर पुलिस ने एहतियातन हिरासत में लिया था और करीब 22 घंटे तक थाने में रखा था. उन्होंने कहा कि उनके अनुभव में धार्मिक पहचान के आधार पर लोगों को निशाना बनाया जा रहा है. हालांकि, उनके मुताबिक यह तय करना मुश्किल है कि मुस्लिमों को अन्य प्रदर्शनकारियों की तुलना में अधिक हिरासत में लिया गया या नहीं.
जकिया सोमन और राणा अय्यूब ने माना कि मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों में धार्मिक पहचान के आधार पर निशाना बनाए जाने को लेकर वास्तविक चिंताएं हैं. सोमन ने कहा कि इसके बावजूद बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाएं और युवा प्रदर्शन में हिस्सा ले रहे हैं. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व बहुसंख्यक समुदाय या गैर-मुस्लिमों के हाथ में रहना चाहिए, क्योंकि मुस्लिम प्रदर्शनकारियों को उनकी धार्मिक पहचान के कारण लंबे कानूनी संघर्षों का सामना करना पड़ सकता है.
द क्विंट के मुताबिक, दिल्ली पुलिस के जनसंपर्क विभाग से कथित सांप्रदायिक टिप्पणियों, कार्यकर्ताओं के ठिकानों पर छापों और रातभर हिरासत में रखे जाने के आरोपों पर प्रतिक्रिया मांगी गई है. रिपोर्ट प्रकाशित होने तक पुलिस का जवाब नहीं मिला था.

