सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद 35 संरक्षित क्षेत्रों को सिकोड़ने या खत्म करने की मंजूरी
‘आर्टिकल 14’ में प्रकृति श्रीवास्तव एवं प्रेरणा सिंह की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के वन्यजीवों की रक्षा के लिए जिम्मेदार नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ की स्थायी समिति ने 2012 से अब तक 35 संरक्षित क्षेत्रों को छोटा करने या उनका दर्जा खत्म करने की सिफारिश की है. इनमें खनन, बुनियादी ढांचे, पर्यटन, मंदिर निर्माण और शहरी विस्तार जैसी परियोजनाएं शामिल हैं.
लेखकों द्वारा समिति की 2012 से फरवरी 2026 तक हुई 64 बैठकों के रिकॉर्ड के विश्लेषण में पाया गया कि 13 प्रस्तावों में संरक्षित क्षेत्रों का पूर्ण या आंशिक रूप से दर्जा खत्म करने की बात थी, जबकि 21 में सीमाओं में बदलाव या "तर्कसंगतीकरण" किया गया. रिपोर्ट का दावा है कि इन 35 मामलों में से किसी को भी सुप्रीम कोर्ट की पूर्व मंजूरी के लिए नहीं भेजा गया, जबकि अदालत के बाध्यकारी आदेशों के तहत ऐसी मंजूरी जरूरी है.
अक्टूबर 2025 में समिति ने छत्तीसगढ़ के पामेड वन्यजीव अभयारण्य से 3,485 हेक्टेयर, यानी करीब 35 वर्ग किलोमीटर, क्षेत्र हटाने की मंजूरी दी. इसका इस्तेमाल केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के जंगल युद्ध प्रशिक्षण केंद्र और बटालियन शिविर के लिए होना था. यह क्षेत्र सीआरपीएफ की मूल 283 हेक्टेयर की मांग से 12 गुना से अधिक था. इसे "तर्कसंगतीकरण" बताते हुए पास के वन मंडल से 3,535 हेक्टेयर जमीन जोड़ने का दावा किया गया, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार यह अतिरिक्त जमीन अभी अधिसूचित नहीं हुई है.
पामेड मध्य भारत में जंगली जल भैंसों की बची हुई महत्वपूर्ण आबादी का आवास है. छत्तीसगढ़ में इनकी संख्या करीब 30-35 बताई जाती है. यह क्षेत्र इंद्रावती टाइगर रिजर्व को महाराष्ट्र के ताडोबा और छत्तीसगढ़ के उदंती तथा ओडिशा के सुनाबेड़ा जैसे संरक्षण क्षेत्रों से जोड़ने वाले बड़े वन्यजीव परिदृश्य का हिस्सा भी है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि संरक्षित क्षेत्रों को छोटा करने की घटनाएं तेजी से बढ़ीं. 2012-13 में जहां ऐसा एक मामला था, वहीं 2014-15 में छह और 2016-26 के दौरान 28 मामले सामने आए.
क्षतिपूरक जमीन देने का दावा भी सवालों के घेरे में है. 35 प्रस्तावों में से 24 में अतिरिक्त जमीन देने का वादा किया गया था, लेकिन केवल 10 मामलों में जमीन वास्तव में अधिसूचित हुई. 15 मामलों में प्रस्तावित अतिरिक्त जमीन अधिसूचित नहीं हुई. लेखकों के अनुसार, दूर स्थित दूसरी जमीन किसी विशेष प्रजाति के आवास या पारिस्थितिक तंत्र की वास्तविक भरपाई नहीं कर सकती.
मध्य प्रदेश के सरदारपुर खारमोर अभयारण्य का क्षेत्र 348.12 वर्ग किलोमीटर से घटाकर 132.83 वर्ग किलोमीटर कर दिया गया, यानी करीब 62 प्रतिशत कमी. यह अभयारण्य संकटग्रस्त लेसर फ्लोरिकन यानी खारमोर के संरक्षण के लिए बनाया गया था. इसके बदले दूसरे संरक्षित क्षेत्रों में जमीन जोड़ने का प्रस्ताव दिया गया, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार सैकड़ों किलोमीटर दूर की जमीन उस विशेष घासभूमि का विकल्प नहीं हो सकती.
राजस्थान के बांध बरेठा वन्यजीव अभयारण्य से 2,785 हेक्टेयर क्षेत्र हटाने का फैसला अयोध्या में राम मंदिर के लिए गुलाबी बलुआ पत्थर के खनन का रास्ता साफ करने के लिए किया गया. आसपास के पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र की सीमा भी घटाकर 25 मीटर कर दी गई. ओडिशा के कार्लापाट अभयारण्य में 4.32 वर्ग किलोमीटर महत्वपूर्ण हाथी आवास को बाहर किया गया, जिससे बॉक्साइट खनन के लिए क्षेत्र खुल गया.
बाघ अभयारण्य भी इस प्रक्रिया से प्रभावित हुए. रणथंभौर टाइगर रिजर्व के बफर क्षेत्र से 435.51 हेक्टेयर जमीन चूना पत्थर खनन के लिए हटाने की सिफारिश की गई, जबकि राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण ने चेतावनी दी थी कि यह क्षेत्र महत्वपूर्ण वन्यजीव गलियारे में आता है. रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व के बफर क्षेत्र को भी दो बार कम किया गया, पहले बूंदी शहर के विस्तार और बाद में हवाई अड्डे के लिए.
मध्य प्रदेश के करेरा वन्यजीव अभयारण्य को ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के संरक्षण के लिए बनाया गया था, लेकिन स्थानीय स्तर पर इस पक्षी के खत्म होने के बाद इसे पूरी तरह अधिसूचना से बाहर कर दिया गया. राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में भी 207.05 हेक्टेयर क्षेत्र हटाकर रेत खनन को वैध बनाने की सिफारिश की गई, जबकि चंबल की रेत की पट्टियां घड़ियालों के प्रजनन और धूप सेंकने के लिए महत्वपूर्ण हैं.
2000 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संरक्षित क्षेत्रों की जमीन में बदलाव, दर्जा खत्म करने या सीमाओं में परिवर्तन के लिए अदालत की अंतिम मंजूरी जरूरी है. 2015 में इस सुरक्षा को और मजबूत किया गया. इसके बावजूद, रिपोर्ट के अनुसार 2014 के बाद कम से कम छह संरक्षित क्षेत्रों का दर्जा सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी के बिना खत्म किया गया.
सरिस्का टाइगर रिजर्व मामले में सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित एजेंसियों के फैसले को वापस भेजते हुए उनकी कड़ी आलोचना की. अदालत ने कहा कि उन्होंने "पोस्ट ऑफिस" की तरह काम किया और व्यवस्था का "मजाक" बनाया. अप्रैल 2026 में अदालत ने राजस्थान के राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य से 732 हेक्टेयर क्षेत्र का दर्जा खत्म करने पर रोक लगाते हुए राज्य की कार्रवाई को "अवैध" बताया.
अंडमान और निकोबार के गलाथिया बे वन्यजीव अभयारण्य का मामला भी महत्वपूर्ण है. यह दुनिया के प्रमुख लेदरबैक कछुआ प्रजनन स्थलों में से एक है. इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय कंटेनर बंदरगाह परियोजना के लिए इसका दर्जा खत्म करने की सिफारिश की गई. निकोबार मेगापोड अभयारण्य को भी इसी बैठक में हटाया गया. आरटीआई से सामने आया कि दोनों मामलों में सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी नहीं ली गई थी.
लेखकों का कहना है कि संरक्षित क्षेत्र केवल जमीन के टुकड़े नहीं हैं. वे विशिष्ट प्रजातियों, आवासों, जल प्रणालियों और वन्यजीव गलियारों की रक्षा के लिए बनाए जाते हैं. इसलिए विकास परियोजनाओं के लिए उनकी सीमाओं को बदलना केवल प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि भारत की जैव विविधता और पर्यावरणीय सुरक्षा से जुड़ा गंभीर प्रश्न है.

