बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौतों के पीछे खराब टीकाकरण और व्यापक कुपोषण

‘स्क्रोल’ की रिपोर्ट के मुताबिक, मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में मई से अब तक बैगा और गोंड समुदाय के कम से कम 25 बच्चों की मौत हुई है. रिपोर्ट के अनुसार, इनमें कई मौतें खसरा और मलेरिया के प्रकोप के बीच हुईं. दूरदराज के आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य व्यवस्था की अनुपस्थिति के कारण करीब दो महीने तक इस प्रकोप का पता ही नहीं चल सका.

खसरा टीकाकरण से रोकी जा सकने वाली बीमारी है और भारत ने 1985 में इसे सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल किया था. लेकिन बालाघाट के प्रभावित गांवों में टीकाकरण अभियान काफी हद तक कागजों तक सीमित दिखाई दिया.

एक वर्षीय साहिल और उसकी 12 वर्षीय बहन लामिन को बुखार और शरीर पर चकत्ते हुए और दोनों की मौत हो गई. उनके पिता समारू धुरवेय ने बताया कि उनके सातों बच्चों को कभी किसी बीमारी का टीका नहीं लगा. हालांकि आंगनवाड़ी के रिकॉर्ड में साहिल को 21 अप्रैल 2026 को खसरे की एक खुराक मिलने की जानकारी दर्ज थी. स्थानीय आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ने कहा कि उन्होंने मई में काम शुरू किया और तब से स्वास्थ्य विभाग ने कोई नियमित टीकाकरण अभियान नहीं चलाया.

कुंडेकासा गांव में तीन वर्षीय प्रीति की भी इसी तरह के लक्षणों के बाद मौत हुई. वहां 15 बच्चों के टीकाकरण रिकॉर्ड में 11 बच्चों को खसरे की पहली खुराक तक नहीं मिली थी. प्रीति को पहली खुराक मिली थी, लेकिन दूसरी खुराक नहीं मिली. उसकी मौत 22 जुलाई को हुई और आधिकारिक रिकॉर्ड में कारण "अज्ञात" दर्ज है.

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, 2025 तक देश में 92.2 प्रतिशत बच्चों को खसरे के टीके की दोनों खुराक मिल चुकी थीं. इसके मुकाबले बालाघाट में यह आंकड़ा 81.3 प्रतिशत था. बिरसा विकासखंड में विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक टीम ने अगस्त में 177 बच्चों का सर्वे किया, जिसमें 80 प्रतिशत बच्चों को पहली और केवल 70 प्रतिशत को दूसरी खुराक मिली थी. जमीनी जांच में स्थिति इससे भी खराब मिली. सात मृत बच्चों के परिवारों से बात करने पर छह माता-पिता ने बताया कि उनके बच्चों को किसी बीमारी का टीका नहीं लगा था.

प्रकोप सामने आने के बाद प्रशासन ने टीकाकरण अभियान तेज किया और 28 अगस्त तक 10,481 खुराकें दी गईं. इस दौरान टीकाकरण अधिकारी डॉ. परेश उपलाप को पद से हटा दिया गया. उन्होंने माना कि बिरसा में खसरा टीकाकरण बेहतर हो सकता था, लेकिन उनका कहना था कि इतनी बड़ी संख्या में मौतों के लिए केवल खसरा जिम्मेदार नहीं था.

बालाघाट मलेरिया प्रभावित क्षेत्र भी है. 2024 में प्रभावित 40 गांवों में 697 मलेरिया मामले दर्ज हुए थे, जबकि 2025 में यह संख्या 492 थी. लेकिन जुलाई के अंत से अगस्त के अंत तक केवल एक महीने में 404 मामले सामने आए. स्वास्थ्य विभाग के दो वरिष्ठ अधिकारियों ने माना कि पिछले वर्षों में मलेरिया के मामलों की बड़े पैमाने पर कम रिपोर्टिंग हुई हो सकती है. उनके अनुसार, इसी वजह से रोकथाम के जरूरी कदम नहीं उठाए गए.

प्रभावित कई गांवों में इस वर्ष मच्छरदानी नहीं बांटी गई और कीटनाशक छिड़काव तथा फॉगिंग भी देर से शुरू हुई. कुंडेकासा में चार वर्षीय अरविंद धुरवेय की मलेरिया से मौत के बाद ही नियमित फॉगिंग शुरू हुई.

इन बीमारियों के बीच कुपोषण ने बच्चों की हालत और गंभीर कर दी. बालाघाट के एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में जुलाई से भर्ती 150 बच्चों में 50 से अधिक कम वजन के थे. डॉक्टरों के अनुसार, कुपोषण से बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है और सामान्य संक्रमण भी जानलेवा हो सकता है.

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 के आंकड़ों के मुताबिक बालाघाट में पांच वर्ष से कम उम्र का हर तीसरा बच्चा कम वजन का है. लेकिन आंगनवाड़ी रिकॉर्ड में कुपोषण की वास्तविक स्थिति काफी कम दर्ज होती दिखाई दी. तीन आंगनवाड़ियों में 127 बच्चों में केवल पांच को गंभीर तीव्र कुपोषण की श्रेणी में दर्ज किया गया था.

तीन वर्षीय प्रियंका धुरवेय को खसरे का टीका लगा था, लेकिन बीमारी के बाद अस्पताल में भर्ती होने के दो दिन के भीतर उसकी मौत हो गई. सरकारी रिकॉर्ड में उसकी मौत का कारण गंभीर तीव्र कुपोषण, गंभीर सांस संबंधी परेशानी, गंभीर एनीमिया, सदमा और श्वसन विफलता बताया गया. 13 अगस्त को मौत के समय उसका वजन केवल चार किलो था, जबकि उसकी उम्र के बच्चे का आदर्श वजन करीब 11 से 15 किलो होना चाहिए था. हैरानी की बात यह है कि आंगनवाड़ी रिकॉर्ड में उसे कुपोषित बच्चे के रूप में दर्ज ही नहीं किया गया था.

संकट को बढ़ाने वाला एक और कारण बच्चों को मिलने वाला पोषण आहार बंद होना है. आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के अनुसार, मार्च के बाद छह वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए मिलने वाला घर ले जाने वाला राशन बंद हो गया. इसमें चावल, दाल और सोयाबीन जैसी खाद्य सामग्री शामिल थी. आपूर्तिकर्ता एजेंसियों को भुगतान नहीं होने के कारण यह व्यवस्था बंद हुई.

प्रियंका के पिता के अनुसार, राशन बंद होने के बाद पिछले कुछ महीनों में वह बेहद कमजोर हो गई थी. आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने भी कहा कि गरीब परिवारों के लिए यह भोजन बेहद महत्वपूर्ण था.

स्थानीय लोगों का कहना है कि कुपोषण केवल महिला एवं बाल विकास विभाग की विफलता नहीं है. बैगा समुदाय पारंपरिक रूप से जंगल से कंद-मूल, मशरूम और अन्य खाद्य सामग्री जुटाकर अपनी पोषण जरूरतें पूरी करता रहा है. लेकिन स्थानीय लोगों के अनुसार, वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत अधिकारों और जंगल से संसाधन जुटाने में कठिनाइयों के कारण उनकी पारंपरिक खाद्य सुरक्षा भी प्रभावित हुई है.

बालाघाट की घटनाएं दिखाती हैं कि टीकाकरण की कमी, मलेरिया नियंत्रण में लापरवाही, कुपोषण और पोषण योजना के रुकने जैसी कई सरकारी विफलताएं मिलकर उन बीमारियों को भी जानलेवा बना सकती हैं जिन्हें प्रभावी सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के जरिए रोका जा सकता है.

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