अरुणाचल में सुरक्षा के साथ बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की जरूरत
अरुणाचल प्रदेश के वाचा-दमाई में भारत और चीन के कोर कमांडरों की वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर बैठक के साथ ही इस संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में सड़कों, मजबूत बुनियादी ढांचे और पर्यटन प्रबंधन पर एक शांत लेकिन बेहद जरूरी चर्चा आवश्यक हो गई है.
सुदीप्त भट्टाचार्जी के अनुसार, हर साल सितंबर में ज़ीरो घाटी अपनी शांत अपतानी संस्कृति और 'ज़ीरो फेस्टिवल ऑफ म्यूजिक' के कारण जीवंत हो उठती है. सितंबर 2025 में इस चार दिवसीय आयोजन ने देशभर और विदेशों से 12,000 से अधिक पर्यटकों और कलाकारों को आकर्षित किया. प्लास्टिक प्रतिबंध, बांस के बने मंच, कंपोस्टिंग और 300 से अधिक स्थानीय लोगों को मिलने वाले रोजगार के कारण इसे राष्ट्रीय स्तर पर 'सस्टेनेबिलिटी पुरस्कार' भी मिला.
हालांकि, ज़ीरो की यह अभूतपूर्व सफलता ही उसकी सबसे बड़ी चुनौती बन गई है. इसका सुदूर होना जहाँ एक ओर आकर्षण है, वहीं दूसरी ओर कमजोर बुनियादी ढांचा सबसे बड़ी बाधा. क्षेत्र में सड़कों की खस्ताहाल स्थिति, अनिश्चित मौसम, सार्वजनिक परिवहन की कमी और सीमित आपातकालीन व्यवस्थाएं यात्रा को जोखिम भरा बनाती हैं. हाल ही में नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई हिमनद बाढ़ इस बात की चेतावनी है कि हिमालयी क्षेत्रों में संपर्क मार्ग कितने अनिश्चित हो सकते हैं.
हिमालय में वास्तविक स्थिरता का अर्थ केवल कचरा प्रबंधन नहीं, बल्कि आपदाओं के प्रति सहनशीलता भी है. सड़कें मजबूत हों, संचार प्रणाली ठप न हो और आपातकालीन सुविधाएं आपदा से पहले तैयार रहें.
अरुणाचल की 2025 पर्यटन नीति सार्वजनिक परिवहन की कमी को मानती है, लेकिन केवल कागजी नीतियां पर्याप्त नहीं हैं. यदि अत्यधिक भीड़ से घाटी का पारिस्थितिक तंत्र और अपतानी पहचान खतरे में पड़ती है, तो ज़ीरो का आकर्षण खत्म हो जाएगा. सरकार को यह समझना होगा कि बेहतर सड़कें, परिवहन, संचार और आपातकालीन ढांचा पर्यटकों के लिए कोई एहसान नहीं, बल्कि स्थानीय निवासियों के जीवन में दीर्घकालिक निवेश है. जब महोत्सव को अपनी पहचान मिल चुकी है, तो बुनियादी ढांचे को भी अब कदम से कदम मिलाकर चलना होगा.

