पीएमकेवीवाई के तहत प्रशिक्षण और मांग के बीच विसंगति; सिर्फ 41% को मिला प्लेसमेंट, संसदीय समिति ने फटकारा
वरिष्ठ कांग्रेस नेता के.सी. वेणुगोपाल की अध्यक्षता वाली संसद की लोक लेखा समिति (पीएसी) ने सरकार के प्रमुख कौशल विकास कार्यक्रम—'प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना' (पीएमकेवीवाई)—को लेकर सरकार को फटकार लगाई है. भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) द्वारा पेश की गई ऑडिट रिपोर्ट का हवाला देते हुए समिति ने कहा कि इस योजना में खुदरा (रिटेल) जैसे कम मांग वाले रोजगारों के लिए कौशल प्रदान करने पर अत्यधिक ध्यान केंद्रित किया गया.
‘द हिंदू ब्यूरो’ के अनुसार, पीएमकेवीवाई कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय (एमएसडीई) की एक प्रमुख योजना है, जिसे जुलाई 2015 में इस उद्देश्य के साथ शुरू किया गया था, ताकि बड़ी संख्या में युवाओं को उद्योग-प्रासंगिक कौशल प्रशिक्षण लेने में सक्षम बनाया जा सके. साल 2015 और 2022 के बीच, लगभग ₹14,450 करोड़ के परिव्यय के साथ पीएमकेवीवाई के तीन चरण शुरू किए गए थे. इसमें से ₹10,194 करोड़ जारी किए गए, जिसमें से ₹9,261 करोड़ का उपयोग किया गया. कुल 1.32 करोड़ उम्मीदवारों के लक्ष्य के मुकाबले 1.10 करोड़ उम्मीदवारों को प्रमाणित किया गया.
रिपोर्ट के निष्कर्षों का हवाला देते हुए, समिति के सदस्यों ने विचार-विमर्श के दौरान नोट किया कि प्रशिक्षण और (बाजार की) मांग के बीच एक विसंगति थी. उन्होंने कहा कि कौशल विकास के प्रयास काफी हद तक कम मांग वाले क्षेत्रों जैसे परिधान, इलेक्ट्रॉनिक्स और खुदरा (रिटेल) पर केंद्रित थे, जो कुल मिलाकर कुल प्रशिक्षुओं का 40% हिस्सा थे. इसके विपरीत, खाद्य प्रसंस्करण जैसे क्षेत्र, जिन्हें अधिक प्रशिक्षित कर्मियों की आवश्यकता होती है, वहां कुल प्रशिक्षुओं का केवल 0.48% हिस्सा ही था. इसी तरह, पर्यटन क्षेत्र के लिए केवल 3.8% प्रशिक्षुओं को ही कुशल बनाया गया था.
योजना की कमी (योजनाबद्ध तरीके से काम न होना)
विपक्ष और सत्ताधारी भाजपा दोनों के समिति सदस्यों ने इस बात पर सवाल उठाया कि साल 2015 से कार्यक्रम के संचालन में होने के बावजूद इसमें योजना (प्लानिंग) की कमी क्यों रही? सूत्रों के अनुसार, कई सदस्यों ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार ने इस योजना की कमियों से कोई सबक नहीं सीखा है. यह भी रेखांकित किया गया कि केवल 41% प्रशिक्षुओं को ही प्लेसमेंट (रोजगार) मिल सका. इसके अलावा, यह कार्यक्रम फर्जी नियुक्ति पत्रों के बार-बार सामने आने वाले मामलों से भी प्रभावित रहा है.
सीएजी की रिपोर्ट में कई उदाहरणों का हवाला दिया गया. एक मामले में, 'नीलिमा मूविंग पिक्चर्स' को जनवरी और नवंबर 2020 के बीच आठ राज्यों में 21 नौकरी भूमिकाओं के लिए 33,493 प्रतिभागियों को कौशल प्रमाणन (सर्टिफिकेट) जारी करने का काम सौंपा गया था. हालांकि, बाद में पाया गया कि यह कंपनी अस्तित्व में ही नहीं थी. ऑडिट रिपोर्ट में इस बात को रेखांकित किया गया कि इस तरह के फर्जी दावों के लिए किसी की भी जवाबदेही तय नहीं की गई थी.
इस योजना और इसके कार्यान्वयन का बचाव करते हुए, सरकार ने राज्य सरकारों पर दोष मढ़ा और कहा कि वे ही इसकी कार्यान्वयन एजेंसियां थीं. लोक लेखा समिति के अध्यक्ष वेणुगोपाल ने अपने समापन भाषण में कहा कि बेरोजगारी देश के सामने सबसे बड़ा खतरा बनी हुई है. उन्होंने कहा कि बेरोजगार युवा सड़कों पर उतर रहे हैं, और यह योजना, जो उनकी जरूरतों को पूरा करने के लिए बनाई गई थी, अपने लक्ष्यों को हासिल करने में विफल रही है. यही वजह है कि मौजूदा स्थिति मजबूरन होने वाले पलायन को भी बढ़ावा दे रही है. उन्होंने केरल का उदाहरण दिया, जहाँ से बड़ी संख्या में युवाओं का राज्य और देश से पलायन हुआ है, जिससे उनके बुजुर्ग माता-पिता पीछे अकेले छूट गए हैं.

