बोफोर्स के बाद, लोकसभा का सबसे लंबा अनिश्चितकालीन स्थगन: 46 दिन और गिनती अभी जारी है

संसदीय अभिलेखों के अनुसार 18वीं लोकसभा का आठवां सत्र बिना सत्रावसान के 46 दिनों से अधिक समय से अनिश्चित काल के लिए स्थगित है. और गिनती अभी जारी है. भारतीय संसदीय इतिहास में यह तीसरा सबसे लंबा अनिश्चितकालीन स्थगन है. वर्ष 2014 में एनडीए सरकार के सत्ता में आने के बाद से यह संसद का सबसे लंबा स्थगन बन गया है. इससे पहले एनडीए कार्यकाल में वर्ष 2015 में 28 दिन और 2021 में 20 दिन का स्थगन देखा गया था.

जतिन आनंद की रिपोर्ट के अनुसार, संसद का यह मानसून सत्र 20 जुलाई को शुरू होकर 13 अगस्त को स्थगित हुआ था. नीट पेपर लीक, अयोध्या राम मंदिर में चोरी के आरोपों और विरोध प्रदर्शनों पर गृह मंत्री से जवाब की मांग जैसे मुद्दों पर विपक्ष के हंगामे के कारण यह सत्र बाधित रहा. सत्र के बाद आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसदों के पाला बदलने और टीएमसी में अंदरूनी कलह जैसे राजनीतिक घटनाक्रम भी सामने आए. सदन का लगातार सत्रावसान न होना अक्टूबर में एक नई बैठक की संभावना के बारे में अटकलों को भी हवा दे रहा है. राजनीतिक बहस परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े संवैधानिक संशोधन के लिए आवश्यक संख्या बल पर केंद्रित रही है. हालांकि, सरकार की योजनाओं के बारे में दावे स्थापित संसदीय निर्णयों के बजाय केवल कयासों पर आधारित हैं.

स्थगन और सत्रावसान में अंतर

एम.एन. कौल और एस.एल. शकधर की पुस्तक 'प्रैक्टिस एंड प्रोसीजर ऑफ पार्लियामेंट' के अनुसार, 'स्थगन' और 'सत्रवसान' दो भिन्न प्रक्रियाएं हैं: अनिश्चितकालीन स्थगन: इसके तहत अध्यक्ष (स्पीकर) अगली बैठक की तिथि तय किए बिना सदन की कार्यवाही को समाप्त करते हैं. इससे उस दिन की बैठक तो खत्म हो जाती है, लेकिन संपूर्ण सत्र समाप्त नहीं होता. अध्यक्ष के पास नियम 15 के तहत सदन को पुनः समवेत करने का अधिकार होता है. सत्रावसान: संविधान के अनुच्छेद 85(2) के तहत राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री की सलाह पर औपचारिक आदेश जारी कर सत्र को समाप्त करते हैं.

सबसे लंबे अनिश्चितकालीन स्थगन का इतिहास

लोकसभा के इतिहास में दो सबसे लंबे अनिश्चितकालीन स्थगन आठवीं लोकसभा (1985–1989) के दौरान कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में हुए थे:

1987 का स्थगन (76 दिन): बोफोर्स सौदे में दलाली के आरोपों के बीच आठवां सत्र 12 मई 1987 को स्थगित हुआ. अध्यक्ष ने विशेष शक्तियों का प्रयोग कर 27 जुलाई को सदन पुनः बुलाया. बोफोर्स जांच के लिए 30-सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति के गठन का प्रस्ताव पारित होने के बाद 3 सितंबर 1987 को अंततः सत्रावसान हुआ.

1989 का स्थगन (61 दिन): बोफोर्स मामले पर कैग (सीएजी) की रिपोर्ट के बाद विपक्ष के करीब 100 सांसदों ने इस्तीफा दे दिया. 18 अगस्त को स्थगित सदन को अध्यक्ष ने 11 अक्टूबर को पुनः बुलाया और 20 अक्टूबर को सत्रावसान हुआ. इसके कुछ ही हफ्तों बाद राजीव गांधी सरकार सत्ता से बाहर हो गई.

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