गुजरात में तीन साल में एससी-एसटी अत्याचार के 4,890 मामले, सज़ा की दर बेहद कम
न्यू इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़, गुजरात में 2022 से 2024 के बीच अनुसूचित जातियों और जनजातियों के ख़िलाफ़ अत्याचार के 4,890 मामले दर्ज हुए. राज्यसभा में रखे आँकड़ों के अनुसार 2022 में 1,609, 2023 में 1,680 और 2024 में 1,601 मामले दर्ज हुए, जिनमें क़रीब 81 फ़ीसदी एससी से जुड़े थे.
जाँच के लंबित मामले 2022 के 489 से घटकर 2024 में 449 रह गए, यानी 8.2 फ़ीसदी की गिरावट. एसटी मामलों में यह संख्या 125 से घटकर 90 हुई, जबकि एससी में मामूली फ़र्क़ आया — 364 से 359.
सज़ा की दर का रुझान उलटा रहा. एससी मामलों में यह 2022 के 4.4 फ़ीसदी से बढ़कर 2023 में 7.4 फ़ीसदी हुई, फिर 2024 में गिरकर 5.4 फ़ीसदी. एसटी मामलों में गिरावट और तीखी रही — 8 से 11.7 और फिर 4.5 फ़ीसदी. इसके मुक़ाबले 2024 में राष्ट्रीय दर एससी मामलों में 33.9 और एसटी मामलों में 33.2 फ़ीसदी थी. ये दरें सिर्फ़ उन मामलों पर निकाली जाती हैं जिनमें मुक़दमा पूरा हो चुका है, इसलिए इन्हें कुल दर्ज मामलों का प्रतिशत नहीं समझा जाना चाहिए.
राहत पाने वाले पीड़ितों की संख्या 2022-23 के 1,623 से बढ़कर 2023-24 में 2,195 और 2024-25 में 2,659 हो गई. केंद्रीय मदद भी 4.2 करोड़ रुपये से बढ़कर 29.8 करोड़ और फिर 30 करोड़ रुपये से ऊपर पहुँची. तीन वित्त वर्षों में राज्य को क़रीब 64 करोड़ रुपये मिले और 6,477 पीड़ितों को राहत दी गई.
इन आँकड़ों से असली सवाल यह बनता है कि मामला दर्ज होने के बाद क्या होता है — जाँच कितनी तेज़ी से बढ़ती है, कितने मामले पूरे मुक़दमे तक पहुँचते हैं, और कितनों में सज़ा होती है.

