‘खुद को कानून से ऊपर मानकर कर रहे हैं काम’: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यूपी पुलिस को लगाई फटकार
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक व्यक्ति को प्राथमिक सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज होने से कई घंटे पहले और उसकी औपचारिक गिरफ्तारी से लगभग एक दिन पहले अवैध रूप से हिरासत में रखने पर उत्तर प्रदेश पुलिस की कड़ी निंदा की है और उसकी तत्काल रिहाई का आदेश दिया है.
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ ने 7 अक्टूबर के अपने आदेश में याचिकाकर्ता दीपक की हिरासत को गैर-कानूनी घोषित किया और टिप्पणी की कि ऐसा प्रतीत होता है कि यूपी पुलिस "खुद को कानून से ऊपर मानकर" काम कर रही है.
पुलिस प्रशिक्षण में सुधार का आह्वान करते हुए, पीठ ने यूपी के पुलिस महानिदेशक से ऐसे मॉड्यूल तैयार करने को कहा जिससे अधिकारियों को उचित गिरफ्तारी प्रक्रियाओं और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों से अवगत कराया जा सके.
यह मामला 23 अगस्त को नोएडा में दो गुटों के बीच हुई झड़प से जुड़ा है, जिसके बाद दीपक को हिरासत में लिया गया था. हालांकि औपचारिक रिकॉर्ड में कहा गया था कि एफआईआर दर्ज होने के तुरंत बाद उसे गिरफ्तार किया गया था, लेकिन अदालत ने पाया कि औपचारिक शिकायत से पहले ही उसे हिरासत में ले लिया गया था.
‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के अनुसार पीठ ने कहा, "दस्तावेज़ केवल एक औपचारिकता के रूप में तैयार किए गए और निष्पादित किए गए प्रतीत होते हैं, जिनमें ऐसी त्रुटियाँ भरी पड़ी हैं जो याचिकाकर्ता और अन्य लोगों की हिरासत व गिरफ्तारी की वैधता पर गंभीर संदेह पैदा करती हैं. ऐसा प्रतीत होता है कि पुलिस खुद को कानून से ऊपर मानती है."
अदालत ने आगे जोड़ा, "यह मामला उत्तर प्रदेश पुलिस में व्याप्त दयनीय स्थिति को दर्शाता है. इस अदालत के सामने बार-बार ऐसे मामले आए हैं जिनमें प्रक्रियात्मक और सारभूत, दोनों तरह की कानून की सख्त आवश्यकताओं का अक्षरशः पालन नहीं किया गया है."
अदालत द्वारा विचार किए गए घटनाओं के क्रम के अनुसार, नोएडा पुलिस ने 23 अगस्त को शाम 7:34 बजे दीपक और चार अन्य पुरुषों को गिरफ्तार किया. इसके बाद लिखित शिकायत के आधार पर रात 9:39 बजे एक एफआईआर दर्ज की गई — यानी दीपक को हिरासत में लिए जाने के दो घंटे बाद.
अदालत ने गिरफ्तारी दस्तावेजों को तैयार करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाया और यह संदेह करने के लिए पर्याप्त प्रारंभिक आधार पाए कि घटना के बाद एक दस्तावेज़ तैयार किया गया था, जिसमें दीपक से कथित तौर पर एक सादे कागज़ पर हस्ताक्षर कराए गए थे जिस पर बाद में जांच अधिकारी अनुज कुमार द्वारा प्रति-हस्ताक्षर (काउंटर-साइन) किए गए थे.
पीठ ने कहा कि इन चिंताओं से इस बात पर संदेह पैदा होता है कि जब दीपक को हिरासत में लिया गया था तब पुलिस ने अनिवार्य प्रक्रियाओं का पालन किया था या नहीं.
मजिस्ट्रेट और पुलिस जांच के दायरे में
न्यायमूर्ति श्रीधरन और सचदेव ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत कानूनी प्रक्रियाओं की समझ को लेकर नोएडा के सहायक पुलिस आयुक्त और जांच अधिकारी की आलोचना की. राज्य (सरकार) ने पुलिस की कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि झड़प के बाद के तनाव और स्थिति को और बिगड़ने से रोकने की आवश्यकता के कारण व्यक्ति के पहले से हिरासत में होने के बाद कागजी कार्रवाई पूरी की गई. हालाँकि, अदालत ने इस स्पष्टीकरण को खारिज कर दिया और कहा कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना कानून का पालन न करने का बहाना नहीं हो सकता.
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि आपराधिक और कानूनी प्रक्रियाओं के दौरान नागरिकों के संरक्षण को संविधान के अनुच्छेद 22(1) में निहित किया गया है, जो मनमानी गिरफ्तारी के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करता है.

