राजस्थान में 5 दलितों की हत्या के 11 साल बाद भी एक भी दोषी क्यों नहीं ठहरा

‘आर्टिकल 14’ के मुताबिक, राजस्थान के नागौर जिले के डांगावास गांव में 14 मई 2015 को हुई सामूहिक हिंसा में पांच दलित पुरुषों की हत्या कर दी गई थी. कई लोग घायल हुए और घरों व संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया. लेकिन 11 साल से अधिक समय बाद भी इस मामले में किसी को सजा नहीं मिली. 5 अगस्त 2026 को विशेष अदालत ने मामले में आरोपी सभी 40 लोगों को बरी कर दिया.

अदालत ने अपने फैसले में साफ कहा कि हिंसा होने में कोई संदेह नहीं है, लेकिन यह साबित नहीं हो सका कि हिंसा करने वाले लोग कौन थे. न्यायाधीश श्री आशीष बिजारनिया ने फैसले का सार एक पंक्ति में रखा: "घटना साबित है, लेकिन अपराधी साबित नहीं हैं."

मामले की जांच पहले राजस्थान पुलिस ने की और 19 दिन बाद केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई ने जांच अपने हाथ में ले ली. लेकिन अदालत के फैसले से सामने आया कि दोनों एजेंसियों की जांच में कई गंभीर कमियां रहीं. न तो आरोपियों की पहचान परेड कराई गई, न डीएनए जांच हुई, न बैलिस्टिक परीक्षण. जिस ट्रैक्टर को अभियोजन पक्ष के सबसे मजबूत आरोप से जोड़ा गया, उसे भी किसी आरोपी से ठोस वैज्ञानिक या दस्तावेजी साक्ष्य के जरिए नहीं जोड़ा जा सका.

हिंसा की जड़ करीब 23 बीघा जमीन का पुराना विवाद था. शिकायतकर्ता पक्ष के अनुसार, बड़ी संख्या में लोग ट्रैक्टरों और मोटरसाइकिलों से खेत पर पहुंचे, जातिसूचक गालियां दीं और हमला किया. इस हिंसा में मेघवाल समुदाय के पांच लोगों की मौत हुई. हालांकि इसी टकराव में दूसरे पक्ष के रामपाल गोस्वामी की गोली लगने से मौत हुई और एक आरोपी रामदेव घायल हुआ. इस संबंध में अलग मामला दर्ज किया गया.

पहचान परेड न होना बना बड़ी कमजोरी

मामले में सबसे गंभीर कमी आरोपियों की पहचान से जुड़ी थी. हिंसा में सैकड़ों लोगों की भीड़ शामिल होने का आरोप था और कई गवाह आरोपियों को पहले से नहीं जानते थे. इसके बावजूद राजस्थान पुलिस और सीबीआई, दोनों ने एक भी टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड नहीं कराई.

अदालत में कई गवाहों ने स्वीकार किया कि वे आरोपियों को घटना से पहले नहीं जानते थे. कुछ ने कहा कि उन्हें बाद में आरोपियों के नाम पता चले. एक गवाह ने माना कि एक आरोपी को गलत तरीके से मामले में शामिल किया गया था.

समय बीतने के साथ गवाहों के बयानों में आरोपियों के नाम भी बढ़ते और बदलते गए. अदालत ने टिप्पणी की कि सामान्य तौर पर समय के साथ याददाश्त कमजोर होती है, मजबूत नहीं. इसलिए केवल वर्षों बाद की पहचान के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता.

12 नामों से बढ़कर 40 आरोपी

घटना के शुरुआती चरण में जांच के लिए सीमित नाम सामने आए थे. बाद में सीबीआई की पहली चार्जशीट में छह लोगों को आरोपी बनाया गया और पूरक चार्जशीट में 34 और नाम जोड़ दिए गए. कुल 40 लोगों पर मुकदमा चला.

अदालत ने कहा कि जांच के दौरान नए आरोपियों का सामने आना अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन उनके खिलाफ विश्वसनीय सबूत होना जरूरी है. इस मामले में कई गवाहों के बयानों में समय के साथ नए नाम जुड़ते गए और कुछ पुराने नाम गायब होते गए.

सबसे मजबूत आरोप, लेकिन ट्रैक्टर का कोई ठोस सबूत नहीं

अभियोजन पक्ष का सबसे मजबूत आरोप यह था कि एक आरोपी ने ट्रैक्टर से दलित परिवार के कमरे और झोपड़ी को गिरा दिया. कई गवाहों ने इस आरोप का समर्थन किया.

लेकिन अदालत को उस ट्रैक्टर और आरोपी के बीच कोई ठोस संबंध नहीं मिला. न ट्रैक्टर जब्त किया गया, न उसके रजिस्ट्रेशन, इंजन या चेसिस नंबर से कोई संबंध साबित हुआ. न घटनास्थल पर टायरों के निशान दर्ज किए गए और न वैज्ञानिक जांच हुई.

अदालत ने माना कि यह ऐसा सबूत नहीं था जिसे जुटाना असंभव था. दो जांच एजेंसियों के पास वर्षों तक जांच का समय था, फिर भी जरूरी साक्ष्य नहीं जुटाए गए.

सबूत मौजूद थे, लेकिन अदालत में साबित नहीं हो सके

मामले में बरामदगी से जुड़े महत्वपूर्ण अधिकारी की गवाही से पहले ही मौत हो गई. बाद में गवाही देने वाले अधिकारी ने न तो आरोपियों के कथित बयान सुने थे और न बरामदगी अपनी आंखों से देखी थी.

इस वजह से कई बरामदगी और कथित खुलासे कानूनी रूप से साबित नहीं हो सके. कुछ सीबीआई अधिकारियों को भी अदालत में गवाह के रूप में पेश नहीं किया गया, जिससे पुराने बयानों की पुष्टि और विरोधाभासों की जांच मुश्किल हो गई.

न डीएनए, न बैलिस्टिक जांच

फॉरेंसिक जांच में कुछ वस्तुओं पर मानव रक्त मिला, लेकिन उसका ब्लड ग्रुप स्पष्ट नहीं हो सका. किसी हथियार को किसी मृतक या घायल व्यक्ति से वैज्ञानिक रूप से नहीं जोड़ा जा सका.

अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, डीएनए परीक्षण नहीं कराया गया. घटनास्थल से हथियारों से जुड़ी सामग्री मिलने के बावजूद बैलिस्टिक जांच भी नहीं हुई. मोबाइल कॉल डिटेल जैसे संभावित तकनीकी साक्ष्य भी पेश नहीं किए गए.

इसका नतीजा यह हुआ कि जब प्रत्यक्षदर्शियों की पहचान कमजोर पड़ी तो अभियोजन पक्ष के पास आरोपियों को अपराध से जोड़ने के लिए स्वतंत्र वैज्ञानिक साक्ष्य नहीं थे.

जाति साबित हुई, लेकिन जातीय अपराध नहीं

अदालत ने माना कि मृतक और घायल पक्ष मेघवाल समुदाय से थे, जो अनुसूचित जाति में शामिल है. यह भी स्वीकार किया गया कि आरोपी अनुसूचित जाति से नहीं थे.

लेकिन एससी-एसटी अत्याचार निवारण कानून के तहत अपराध साबित करने के लिए केवल पीड़ित का दलित होना पर्याप्त नहीं था. अभियोजन पक्ष को यह भी साबित करना था कि अपराध का आवश्यक जातिगत संबंध था और किस आरोपी ने जातिसूचक गालियां दीं.

अदालत ने कहा कि जमीन विवाद तो साबित हुआ, लेकिन कानून के तहत आवश्यक जातिगत संबंध और विशिष्ट आरोप संदेह से परे साबित नहीं किए जा सके.

अदालत ने क्या कहा?

अदालत ने यह नहीं कहा कि हिंसा नहीं हुई. उसने यह भी नहीं कहा कि आरोपियों का पक्ष सही था या हिंसा आत्मरक्षा में हुई थी.

अदालत का निष्कर्ष सीमित लेकिन बेहद महत्वपूर्ण था: पांच लोगों की हत्या और सामूहिक हिंसा हुई, लेकिन अभियोजन पक्ष कानूनी रूप से यह साबित नहीं कर सका कि इन 40 आरोपियों में से किसने कौन सा अपराध किया.

सभी 40 आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया.

अदालत ने पीड़ित परिवारों को मुआवजे के लिए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के पास भेजने और एससी-एसटी अत्याचार निवारण नियमों के तहत बकाया राहत राशि की जांच कर भुगतान करने के निर्देश भी दिए.

लेकिन इस मामले की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि राज्य और अदालत दोनों मानते हैं कि पांच दलितों की हत्या हुई. अदालत ने हिंसा को जघन्य और हृदयविदारक बताया. पीड़ितों को मुआवजा मिल सकता है.

फिर भी 11 साल बाद किसी एक व्यक्ति को भी हत्या के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सका.

यही इस मामले में जांच और न्याय व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलता है: अपराध साबित हुआ, पीड़ित साबित हुए, लेकिन अपराधी नहीं.

Previous
Previous

मणिपुर में यात्रियों पर घात लगाकर हमला, चार नागा नागरिकों की मौत

Next
Next

 मीडिया की ओर से कोई सवाल नहीं, मित्र सुभाष को बहुत-बहुत बधाई; भगोड़े विजय माल्या का तंज़