भारत के 58 में से 22 टाइगर रिजर्व में रेस्क्यू सेंटर नहीं; पशु चिकित्सा केंद्र, क्वारंटाइन और पुनर्वास सहायता की कमी
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) ने कहा है कि भारत के 58 बाघ अभयारण्यों (टाइगर रिजर्व) में से 22 में वन्यजीव बचाव केंद्र (रेस्क्यू सेंटर) नहीं हैं, जो पशु चिकित्सा, क्वारंटाइन (पृथकवास) और पुनर्वास सहायता जैसी सुविधाएं प्रदान करने के लिए होते हैं.
‘द टेलीग्राफ’ में अमिय कुमार कुशवाहा की रिपोर्ट के अनुसार, बचाव केंद्रों की कमी वाले 22 टाइगर रिजर्व में शामिल हैं: अरुणाचल प्रदेश का कमलांग, असम के ओरंग और नामेरी, उत्तर प्रदेश का दुधवा, छत्तीसगढ़ का इंद्रावती, मध्य प्रदेश के माधव, रातापानी और वीरांगना दुर्गावती, महाराष्ट्र का बोर, ओडिशा का सिमलीपाल, राजस्थान के मुकुंदरा हिल्स, धौलपुर-करौली और रामगढ़ विषधारी, कर्नाटक के काली और भद्रा, केरल के पेरियार और परम्बिकुलम, तमिलनाडु के श्रीविल्लीपुथुर-मेगामलाई और तेलंगाना के कवल और अमराबाद टाइगर रिजर्व.
आवश्यकता पड़ने पर, बाघों को रिजर्व के बाहर नजदीकी पशु चिकित्सा केंद्रों में ले जाना पड़ता है. "क्षेत्र (फील्ड) से मिली जानकारी के आधार पर, भारत के 58 टाइगर रिजर्व में से 36 रिजर्व में वर्तमान में 40 वन्यजीव बचाव सुविधाएं मौजूद हैं, जबकि कई क्षेत्रों में अभी भी भौगोलिक और कार्यात्मक स्तर पर बड़ी कमियां बनी हुई हैं."
इनमें से कई रिजर्व में बाघों की आबादी का घनत्व कम है, जबकि कुछ जैसे धौलपुर-करौली, कमलांग और कवल में तो एक भी बाघ नहीं है. वहीं काली, भद्रा, पेरियार, परम्बिकुलम और श्रीविल्लीपुथुर में प्रत्येक में 10 से अधिक बाघ हैं.
भविष्य की योजनाएं
बाघ प्राधिकरण ने देश के टाइगर रिजर्व में 38 अतिरिक्त अस्थायी या पारगमन (ट्रांजिट) बचाव-पुनर्वास-रिलीज़ सुविधाओं का एक नेटवर्क स्थापित करने का प्रस्ताव दिया है. इसने मौजूदा वन्यजीव बचाव सुविधाओं के आधुनिकीकरण की भी सिफारिश की है.
भारत में अनुमानित 3,682 जंगली बाघ हैं, जो 18 राज्यों के 58 रिजर्व में फैले हुए हैं. यह वैश्विक जंगली बाघों की आबादी का लगभग 70 प्रतिशत है. सरकार का दावा है कि 2006 में देश में बाघों की संख्या 1,411 थी, जिसमें लगातार बढ़ोतरी हुई है.
चुनौतियां और पुनर्वास के प्रयास
सभी 58 रिजर्व में बाघों की आबादी का घनत्व अधिक नहीं है. पिछले महीने आई एक रिपोर्ट में देश भर के ऐसे लगभग 25 टाइगर रिजर्व की पहचान की गई थी जहाँ बाघों की आबादी या तो अनुपस्थित है, गंभीर रूप से कम है, या घट रही है, जिन्हें वैज्ञानिक पुनर्प्राप्ति (रिकवरी) विधियों की आवश्यकता है.
अधिक बाघों की आबादी वाले प्रमुख रिजर्व (2022 के आंकड़े): उत्तराखंड: कॉर्बेट (260 बाघ), कर्नाटक: बांदीपुर (150) और नागरहोल (141), मध्य प्रदेश: बांधवगढ़ (135) और कान्हा (105), असम: काजीरंगा (104) और तमिलनाडु: मुदुमलाई (114).
साल 2008 में, सरकार ने 12 ऐसे रिजर्व में बाघों को फिर से बसाने की योजना अपनाई थी जो उस समय बाघ विहीन थे. मध्य प्रदेश के पन्ना और राजस्थान के सरिस्का जैसे कुछ रिजर्व में इसके परिणाम बेहतर रहे. हालांकि, ओडिशा के सतकोसिया में बचाव सुविधा होने के बावजूद यह प्रयास विफल रहा.
पर्याप्त बचाव केंद्रों की कमी के अलावा, सरकार के बाघ संरक्षण प्रयासों को अन्य चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है.
कभी-कभी, बाघ संरक्षित क्षेत्रों से बाहर निकल जाते हैं, जिससे उन्हें दुर्घटनाओं में घायल होने, अवैध शिकार, बीमारियों और इंसानों के साथ संघर्ष (मानव-पशु संघर्ष) का खतरा बना रहता है.
बाघ प्राधिकरण ने कहा कि इन परिस्थितियों के कारण वन्यजीवों की विभिन्न प्रजातियों के लिए त्वरित बचाव प्रतिक्रिया (रैपिड रेस्क्यू रिस्पॉन्स), आपातकालीन पशु चिकित्सा देखभाल, पुनर्वास और वैज्ञानिक रूप से प्रबंधित रिलीज़ प्रोटोकॉल (प्रकृति में वापस छोड़ने के नियम) की मांग लगातार बढ़ रही है.

