मध्य प्रदेश के अडानी कोयला प्रोजेक्ट मंजूरी में हस्तक्षेप से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, 6 लाख पेड़ काटे जाएंगे!

सुप्रीम कोर्ट ने उस वन मंजूरी (फॉरेस्ट क्लीयरेंस) में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है, जो केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने पिछले साल मई में मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले में 'धिरौली कोयला खनन परियोजना' के लिए अडानी समूह को दी थी.

इस 2,800 करोड़ रुपये की कोयला परियोजना के लिए लगभग 6 लाख पेड़ काटे जाने की आशंका है. इसी का हवाला देते हुए, कार्यकर्ता अजय दुबे ने शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था, क्योंकि राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने इस साल जनवरी में उनकी उस याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया था, जिसमें मई 2025 में इस परियोजना को दी गई वन मंजूरी को चुनौती दी गई थी. एनजीटी ने एक तकनीकी कारण का हवाला देते हुए उनकी याचिका को खारिज कर दिया था कि याचिका दाखिल करने में 'बहुत देर' हो चुकी थी, और यदि इस पर विचार किया जाना था तो इसे पहले दायर किया जाना चाहिए था. गुरुवार को दुबे की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भी इस बात पर सवाल उठाए कि उनकी याचिका दायर करने में देरी क्यों हुई. हालांकि दुबे ने अदालत से मंजूरी पर पुनर्विचार करने के लिए अपने क्षेत्राधिकार की शक्तियों का उपयोग करने का आग्रह किया, लेकिन अदालत ने इनकार कर दिया.

‘द वायर’ के मुताबिक, एनजीटी में याचिका दायर करने में दुबे की देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट के ये सवाल भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के उस बयान के बमुश्किल एक हफ्ते बाद आए हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि पर्यावरण कार्यकर्ता याचिकाएं दायर कर रहे हैं और 'हर चीज को अदालत में खींच रहे हैं'.

मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले में स्थित धिरौली कोयला खदान परियोजना का स्वामित्व 'महान एनर्जीन लिमिटेड' के पास है, जो अडानी पावर की एक सहायक कंपनी है. इससे सालाना 6.5 मिलियन टन (एमटीपीए) कोयले का उत्पादन होने की उम्मीद है. इस खदान का मतलब लगभग 1,400 हेक्टेयर वन भूमि का डायवर्जन (अन्य कार्यों में उपयोग) होगा. इस रिपोर्ट सहित कई अन्य रिपोर्टों के अनुसार, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने पिछले साल मई में इस परियोजना के लिए अंतिम वन मंजूरी दे दी थी.

याचिकाकर्ता दुबे ने तर्क दिया कि परियोजना स्थल एक पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (इकोलॉजिकली सेंसिटिव ज़ोन) के भीतर आता है, और इसमें मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड के कुछ हिस्सों में फैला एक चिन्हित हाथी गलियारा (एलीफेंट कॉरिडोर) भी शामिल है.  यह परियोजना उन क्षेत्रों के अंतर्गत आती है जिन्हें पहले केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय द्वारा घने जंगलों के कारण खनन के लिए 'नो-गो ज़ोन' (प्रतिबंधित क्षेत्र) के रूप में वर्गीकृत किया गया था.

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