फार्म 6 में बदलाव अदालत ने नहीं किए; सीईसी जैसी कानूनी छूट तो न्यायाधीशों को भी नहीं मिली है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (5 अक्टूबर, 2026) को कई राज्यों में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान नए मतदाताओं को पंजीकृत करने के लिए उपयोग किए जाने वाले 'फार्म 6' में किए गए विवादास्पद बदलावों से खुद को अलग कर लिया और इस जांच का रुख भारत निर्वाचन आयोग की ओर मोड़ दिया.

‘द हिंदू’ ब्यूरो के मुताबिक, तीन न्यायाधीशों की पीठ की अध्यक्षता कर रहे भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने कहा, "हम यह स्पष्ट कर रहे हैं कि फार्म 6 में कोई भी संशोधन हमारे द्वारा नहीं किया गया है."

फार्म 6 निर्वाचक पंजीकरण नियमावली, 1960 की अनुसूची में प्रदान किया गया एक वैधानिक दस्तावेज है. फार्म 6 में संशोधन उचित कानून निर्माण प्रक्रिया के माध्यम से किए जाने चाहिए, न कि एकतरफा प्रशासनिक कार्रवाइयों द्वारा.

फार्म 6 में किए गए बदलावों में मतदाता पंजीकरण के लिए अतिरिक्त जुड़ाव (लिंकेज) आवश्यकताओं पर एक पूरक घोषणा पत्र शामिल था.  नए आवेदकों को यह घोषणा करनी होगी कि क्या वे, उनके माता-पिता या उनके दादा-दादी पिछली एसआईआर मतदाता सूचियों में पंजीकृत थे.  इसके अलावा, इन मैपिंग और लिंकेज प्रश्नों का उत्तर देना फार्म 6 आवेदन जमा करने के लिए एक अनिवार्य पूर्व शर्त बना दिया गया था.

यह मौखिक टिप्पणी दो याचिकाओं की सुनवाई के दौरान की गई, जिसमें एसआईआर प्रक्रिया के दौरान पक्षपात, प्रशासनिक एकतरफावाद और प्रक्रियात्मक उल्लंघन के आरोपों पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने की मांग की गई है.

‘कानूनी छूट (इम्युनिटी)’

न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने इस ओर इशारा किया कि कैसे मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त पद छोड़ने के बाद भी कानूनी कार्यवाहियों से छूट का आनंद लेते रहते हैं, यह एक ऐसी सुरक्षा है जो न्यायाधीशों को भी उपलब्ध नहीं है.

मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पद की अवधि) अधिनियम, 2023 की धारा 16 यह प्रावधान करती है कि "कोई भी अदालत ऐसे किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कोई सिविल या आपराधिक कार्यवाही स्वीकार या जारी नहीं रखेगी जो मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्त है या रहा है..."

"पद पर रहते हुए सुरक्षा को हमेशा समझा जाता है. लेकिन इस प्रावधान में शब्द 'रहा है' शायद केवल राष्ट्रपति के संबंध में सुरक्षा है. यह न्यायाधीशों पर भी लागू नहीं होता... न्यायाधीश जांच अधिनियम को देखें," न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की.

याचिकाकर्ता राकेश सिंह की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने कहा कि इस कानून ने "मुख्य चुनाव आयुक्त को इतने उच्च पद पर बैठा दिया है, जो शायद सुप्रीम कोर्ट के जज से भी ऊंचा है." सिंह ने तर्क दिया कि 2023 अधिनियम की धारा 18 और संविधान ने सीईसी को कोई व्यक्तिगत उपाधि नहीं दी है. वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि वह बहु-सदस्यीय आयोग के अध्यक्ष हैं, न कि स्वयं आयोग.

उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि जब तक सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर अंतिम निर्णय नहीं ले लेता, तब तक मुख्य चुनाव आयुक्त को निलंबित किया जाए या उन्हें किसी भी अधिकार से वंचित किया जाए.

"लेकिन फिर, चुनाव कौन कराएगा? आपको संविधान के कामकाज को ध्यान में रखते हुए याचिकाएं दायर करनी होंगी," न्यायमूर्ति बागची ने जवाब दिया.

सिंह ने प्रस्तुत किया कि यह एक गंभीर स्थिति है जो लोकतंत्र के मूल आधार को खतरे में डालती है. उन्होंने अदालत से याचिका पर अंतरिम राहत देने का अनुरोध करते हुए कहा कि "देश जल जाएगा." उन्होंने कहा कि वैकल्पिक रूप से, अदालत को कम से कम अपने आदेश में शामिल करना चाहिए कि मामले के लंबित रहने के दौरान चुनाव निकाय को सर्वसम्मति से निर्णय लेना चाहिए.

नोटिस जारी करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालत आरोपों के संबंध में सत्यापित जानकारी पर कार्रवाई करेगी.

अंतरिम आदेशों की याचिका पर मुख्य न्यायाधीश कांत ने कहा, "हम रिकॉर्ड का परीक्षण करेंगे, विशेष रिकॉर्ड को देखेंगे. हम पहले (चुनाव आयोग से) कुछ जवाब देखना चाहेंगे." न्यायमूर्ति बागची ने आगे कहा कि सुप्रीम कोर्ट से यह नहीं कहा जा सकता कि वह "उलटी गंगा बहाए (गाड़ी को घोड़े के आगे रखे) और यह मान ले कि चुनाव आयोग के सभी आदेश एकतरफा जारी किए गए थे."

याचिकाकर्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने बताया कि एसआईआर प्रक्रिया में दिल्ली के 30% मतदाताओं और पश्चिम बंगाल के 25% मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं. उन्होंने प्रस्तुत किया कि पश्चिम बंगाल में अपीलीय न्यायाधिकरणों के समक्ष लाखों अपीलें लंबित हैं.

वरिष्ठ अधिवक्ता ने प्रस्तुत किया, "आपके लॉर्डशिप ने उस (एसआईआर) की निगरानी की थी... अब, मतदाताओं को एक चुनाव चक्र से पहले ही बाहर रखा जा चुका है. एक और चुनाव चक्र शुरू होने जा रहा है... देखें कि दिल्ली में एसआईआर कैसे आयोजित किया गया था. फार्म 6 में दो नई शर्तें जोड़ी गई हैं. उन्हें प्रसारित किया गया था. अनुसूची के तहत, फार्म 6 को संशोधित नहीं किया जा सकता है."

वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के मताधिकार के अधिकार खतरे में हैं. याचिका में कहा गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त कानून के तहत सीधे जवाबदेह हैं, और उन्हें "सामान्य अभियुक्त" के रूप में पुलिस जांच, साक्ष्य जुटाने और नियमित विचारणीय कार्यवाहियों के अधीन किया जाना चाहिए.

वरिष्ठ वकील ने प्रस्तुत किया, "एसआईआर इस अदालत की देखरेख में सरकार द्वारा थोपा गया है, और सीईसी का कामकाज कम से कम इतना तो कहा ही जा सकता है कि पक्षपातपूर्ण है."

अदालत ने दोनों याचिकाओं को एक साथ जोड़ दिया और संकेत दिया कि आयोग का पक्ष सुनने के लिए वह अगले सप्ताह मामले को सूचीबद्ध कर सकती है.

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