बिद्युत चक्रवर्ती | सनातनी बनाम हिंदुत्व

‘द टेलीग्राफ’ में बिद्युत चक्रवर्ती ने लिखा है कि समकालीन भारतीय राजनीति और सामाजिक विमर्श में 'सनातनी' और 'हिंदुत्व' शब्द अक्सर एक-दूसरे के पर्याय के रूप में प्रयोग किए जाते हैं.  हालाँकि, जनमानस और राजनीतिक बहसों में इन दोनों अवधारणाओं को भले ही एक समान मान लिया गया हो, लेकिन ऐतिहासिक, बौद्धिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से ये दोनों बिल्कुल अलग पृष्ठभूमियों से आते हैं.  सनातन धर्म जहाँ एक अत्यंत प्राचीन, व्यापक, आंतरिक रूप से विविध और शाश्वत सभ्यतागत परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है; वहीं हिंदुत्व बीसवीं सदी में उभरा एक आधुनिक राजनीतिक आंदोलन है जो मुख्यतः जातीय-राष्ट्रवाद पर आधारित है.

वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में सबसे मुख्य मुद्दा यह है कि हिंदुत्व ने, एक संगठित आधुनिक राजनीतिक शक्ति के रूप में, सनातन धर्म की विशाल, विविधतापूर्ण और बहुलवादी परंपरा को एक एकरूप और बहुसंख्यकवादी पहचान में समाहित करने का प्रयास किया है. यह विलय कोई प्राकृतिक या सहज सांस्कृतिक विकास नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी रणनीतिक राजनीतिक प्रक्रिया है. इसके तहत एक अत्यंत जटिल दार्शनिक और सामाजिक विरासत को चुनावी लाभ और सांस्कृतिक वर्चस्व के औजार के रूप में बदल दिया गया है, जो कई बार सनातन धर्म के मूल मानवीय और दार्शनिक सिद्धांतों के विपरीत खड़ा दिखता है.

'सनातनी' शब्द उस व्यक्ति या परंपरा के लिए प्रयुक्त होता है जो सनातन धर्म का अनुसरण करता है. 'सनातन' का शाब्दिक अर्थ है — 'जो शाश्वत है', 'नित्य है' या 'जिसका न कोई प्रारंभ है और न अंत'. यह शब्द अक्सर भारतीय उपमहाद्वीप में 'हिंदू धर्म' के लिए एक स्वदेशी, आभ्यंतरिक और प्राचीन संज्ञा के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है, ताकि इसे औपनिवेशिक या बाहरी शब्दावली से अलग पहचाना जा सके.

इतिहास के विभिन्न कालखंडों में इस शब्द के अर्थ और अनुप्रयोग बदलते रहे हैं. उदाहरण के लिए, डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने सनातन धर्म का विश्लेषण करते हुए इसे मुख्य रूप से वैदिक और ब्राह्मणवादी परंपराओं से जोड़ा. उन्होंने वेदों के 'अपरुषेय' और 'शाश्वत' होने के दावे पर जोर देते हुए इसे उन उच्च-जातीय और रूढ़िवादी वर्गों का प्रतिनिधित्व करने वाला माना, जो समाज सुधार आंदोलनों का कड़ा विरोध करते थे. यह रूढ़िवादी व्याख्या अत्यंत महत्वपूर्ण है; क्योंकि सनातनी वर्ग अक्सर अपनी रीति-रिवाजों और परंपराओं को पूर्ण, कालजयी और अपरिवर्तनीय मानता रहा है.औपनिवेशिक दौर में राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर और स्वामी दयानंद सरस्वती जैसे समाज सुधारकों द्वारा उठाए गए कुरीति-विरोधी कदमों का विरोध अक्सर सनातनी रूढ़िवादिता के नाम पर ही किया गया था.

इसके विपरीत, 'हिंदुत्व' एक आधुनिक और समकालीन राजनीतिक विचार के रूप में सामने आता है. इस अवधारणा को वर्ष 1923 में विनायक दामोदर सावरकर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'हिंदुत्व: हू इज अ हिंदू?' में पहली बार स्पष्ट रूप से रेखांकित किया था. सावरकर के अनुसार, हिंदुत्व केवल एक धार्मिक आस्था या पूजा-पद्धति नहीं है, बल्कि यह एक सांस्कृतिक और राजनीतिक इतिहास है. यह सामूहिक पहचान तीन मुख्य स्तंभों पर टिकी है: एक साझा राष्ट्र (भौगोलिक सीमाएं), एक समान जाति या नस्ल (रक्त संबंध) और एक एकीकृत संस्कृति (संस्कृति).

नास्तिक दृष्टिकोण रखने वाले सावरकर ने स्पष्ट किया था कि धर्म (आध्यात्मिक आस्था) हिंदुत्व का केवल एक छोटा सा हिस्सा है, उसका मुख्य आधार नहीं. उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण मानदंड यह था कि भारत ही व्यक्ति की 'पितृभूमि' और 'पुण्यभूमि' दोनों होनी चाहिए. इस राजनीतिक परिभाषा ने स्वाभाविक रूप से एक बहिष्करणकारी रेखा खींच दी, जिसके तहत मुसलमानों और ईसाइयों को "विदेशी" या "आंतरिक चुनौती" के रूप में देखा गया, क्योंकि उनकी पवित्र भूमियां (मक्का, यरूशलेम आदि) भारत की भौगोलिक सीमाओं से बाहर स्थित हैं.

सावरकर ने हिंदुत्व, हिंदू धर्म और सनातन धर्म के बीच बहुत सावधानी से अंतर स्पष्ट किया था. उनका मानना था कि हिंदुत्व कोई अस्पष्ट धार्मिक शब्द नहीं है और न ही यह केवल सनातन धर्म तक सीमित है.  वे सनातन धर्म के साथ "हिंदू धर्म" के अनुचित घालमेल के विरोधी थे. उनका मुख्य उद्देश्य आर्यों, सनातनियों, सिखों, जैनियों और बौद्धों को एक बड़े राजनीतिक और नस्लीय मंच पर एकजुट करना था.

हालांकि, व्यावहारिक राजनीति के धरातल पर सावरकर का सनातनी रूढ़िवादिता के साथ संबंध सहयोगात्मक और रणनीतिक था. 1941 में सनातन धर्म सभा के साथ हुई एक बैठक में सावरकर ने स्वीकार किया कि हिंदू महासभा और सनातन संगठनों के बीच 95% मुद्दों पर सहमति है. उन्होंने सामाजिक सुधारों और दलितों के मंदिर प्रवेश पर कानून न बनाने का आश्वासन देकर रूढ़िवादियों के साथ समझौता किया. यद्यपि सावरकर व्यक्तिगत रूप से जातिगत भेदभाव के विरोधी थे और इसे हिंदू समाज की प्रगति में बाधा मानते थे, फिर भी एक व्यापक राजनीतिक गठबंधन बनाने के लिए उन्होंने सनातनी रूढ़िवादिता के आगे नतमस्तक होना स्वीकार किया.

आज की समकालीन भारतीय राजनीति में सावरकर द्वारा दर्शाया गया यह सूक्ष्म अंतर पूरी तरह से धुंधला हो चुका है. भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) जैसे संगठन अब हिंदुत्व और सनातन धर्म को एक-दूसरे के पूरक और अभिन्न अंग के रूप में प्रस्तुत करते हैं. आरएसएस के नेतृत्व द्वारा यह कहा जाना कि 'सनातन धर्म का पुनरुत्थान केवल हिंदू राष्ट्र की स्थापना से संभव है', इसी वैचारिक विलय को दर्शाता है.

इस समावेशन के पीछे एक स्पष्ट राजनीतिक रणनीति है. जब हिंदुत्व जैसी आधुनिक राजनीतिक विचारधारा को सनातन धर्म जैसी प्राचीन सभ्यतागत परंपरा के साथ जोड़ दिया जाता है, तो उस राजनीतिक विचारधारा को एक स्वतः सिद्ध प्राचीन वैधता, पवित्रता और जन-स्वीकार्यता प्राप्त हो जाती है. इसके परिणामस्वरूप, सनातन धर्म की वह समृद्ध विरासत — जो विभिन्न दर्शनों, शास्त्रार्थों, भक्ति आंदोलनों और बहुलवाद के लिए जानी जाती थी — घटकर केवल एक चुनावी हथियार और वोट बैंक की राजनीति का साधन बनकर रह जाती है.

सनातन धर्म और हिंदुत्व का यह विलय एक गहरे सामाजिक अंतर्विरोध को भी छुपाता है. भारत के इतिहास में जाति-विरोधी आंदोलनों ने हमेशा सनातनी व्यवस्था की जन्म-आधारित असमानता और अस्पृश्यता की आलोचना की है. अंबेडकर का तर्क था कि सनातन धर्म ने जातिगत पदानुक्रम को मजबूत किया. जब हिंदुत्व राजनीति में सनातन धर्म को बिना किसी सामाजिक सुधार के पुनर्स्थापित करने का प्रयास करता है, तो यह अनजाने में उन्हीं सामाजिक असमानताओं और पदानुक्रमों को संरक्षण देने का काम करता है जिन्हें आधुनिक लोकतंत्र समाप्त करना चाहता है.

अंततः, सनातनी पहचान और हिंदुत्व का वर्तमान एकीकरण एक प्राकृतिक आध्यात्मिक जुड़ाव न होकर मुख्यतः एक राजनीतिक रचना है. हिंदुत्व, सनातन धर्म के प्रतीकात्मक और भावनात्मक प्रभाव का उपयोग अपनी बहुसंख्यकवादी राजनीतिक यात्रा के लिए कर रहा है. आज आवश्यकता इस बात को समझने की है कि सदियों पुरानी विविधतापूर्ण सभ्यतागत विरासत को एक संकीर्ण राजनीतिक नारे में सीमित न होने दिया जाए. समस्या सनातन धर्म की दार्शनिक चेतना के साथ नहीं, बल्कि उस राजनीति के साथ है जो अपने स्वार्थ के लिए इसका प्रतिनिधित्व करने का दावा करती है.

(बिद्युत चक्रवर्ती, विश्व-भारती, शांतिनिकेतन के पूर्व उप-कुलपति हैं. यह अंग्रेजी में प्रकाशित उनके लेख का हिंदी में अनूदित और संपादित अंश है)

Previous
Previous

फार्म 6 में बदलाव अदालत ने नहीं किए; सीईसी जैसी कानूनी छूट तो न्यायाधीशों को भी नहीं मिली है: सुप्रीम कोर्ट

Next
Next

लाखों लोगों को मनमाने ढंग से मताधिकार से वंचित करना, कोई भी तर्क इसे सही नहीं ठहरा सकता: सुप्रीम कोर्ट के जज भुइयां