मुख्यमंत्री शिवकुमार के विरोध प्रदर्शन के बाद चुनाव आयोग ने 'फॉर्म-7' धोखाधड़ी के आरोपों की जांच के आदेश दिए
ऋषिता खन्ना की रिपोर्ट है कि मुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार और उनके कैबिनेट सहयोगियों द्वारा किए गए पांच घंटे के विरोध प्रदर्शन के बाद, भारत निर्वाचन आयोग ने अंतिम मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए थोक (बड़ी संख्या) में 'फॉर्म-7' दाखिल किए जाने के मामले की जांच के आदेश दिए हैं.
कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी, वी. अनबू कुमार ने सभी निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (ईआरओ) को उन आवेदकों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दिया जो फॉर्म 6, 6A, 7 और 8 में दावे या आपत्तियां दाखिल करते समय "जानबूझकर" झूठे बयान या घोषणाएं करते हैं. इस घोषणा के बाद शिवकुमार ने अपना विरोध प्रदर्शन वापस ले लिया.
सीईओ अनबू कुमार ने ध्यान दिलाया कि निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (ईआरओ) के समक्ष थोक में फॉर्म-7 आवेदन दाखिल करने के उदाहरण सामने आए हैं और इनमें से कुछ फॉर्मों के "असली न होने का आरोप" है. उन्होंने निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों को लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 के तहत "उन आवेदकों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दिया जो जानबूझकर झूठे बयान या घोषणाएं करते पाए जाते हैं."
हालाँकि, उन्होंने कहा, "ऐसी कार्रवाई से पहले निर्वाचक पंजीकरण नियमावली, 1960 के नियम 20 के तहत जांच की जाएगी."
दिन में इससे पहले, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर 'द हिंदू' की उस रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें बताया गया था कि कैसे बेलगावी और अन्य जिलों में मुस्लिम नामों के खिलाफ थोक में फॉर्म-7 आवेदन जमा किए जा रहे थे. उन्होंने इसे "वोट की चोरी" का एक और सबूत करार दिया.
उन्होंने कहा, "कुछ चुनिंदा लोगों को निशाना बनाया जाता है क्योंकि भाजपा और चुनाव आयोग के अधिकारी स्वचालित साधनों (ऑटोमेटेड मीन्स) के माध्यम से थोक में फॉर्म 7 भरने के लिए मिलीभगत करते हैं, और पलक झपकाते ही लाखों लोग मतदाता सूची से गायब हो जाते हैं. और यह सब ऊपर से नियंत्रित होता है."

