भवानी शंकर नायक | भारत में छात्र आत्महत्या का संकट, सपनों की मौत और उदारवादी पलायनवाद

सीखना एक पीड़ादायक और चुनौतीपूर्ण अनुभव है. सीखने की प्रक्रिया अक्सर अप्रिय और उबाऊ होती है, लेकिन धीरे-धीरे यही आनंददायक बन सकती है. आत्म-संदेह, निराशा, भ्रम और विचारों की दुनिया में भटकने के कई वर्षों बाद ही स्पष्टता आती है. इसके लिए निरंतर सीखने, प्रतिबद्धता, समर्पण, आत्म-अनुशासन और प्रतिस्पर्धा-मुक्त वातावरण में सहयोग की आवश्यकता होती है.

शिक्षकों का दायित्व है कि वे सह-शिक्षार्थी के रूप में सीखने की कठिनाइयों को आनंददायक यात्रा में बदलें. पढ़ने, शोध करने, स्वयं को समझने और आसपास की दुनिया को जानने में रुचि पैदा करें. स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की जिम्मेदारी है कि वे ऐसा पाठ्यक्रम और वातावरण तैयार करें, जो विद्यार्थियों के रोजमर्रा के जीवन और अनुभवों से जुड़ा हो. इसके साथ ही अच्छे कक्षाओं, पुस्तकालयों, प्रयोगशालाओं, खेल और आवास जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराना भी संस्थानों का दायित्व है, ताकि सीखने की कठिनाइयां कम हों.

आनंददायक शिक्षण और सीखना शिक्षक तथा विद्यार्थी के सहयोग से संभव होता है. ऐसा वातावरण समानता और लोकतंत्र पर आधारित होना चाहिए, जहां आलोचनात्मक चिंतन विकसित हो और ज्ञान का निर्माण सुरक्षित माहौल में हो सके. यहां गलतियों को कमजोरी नहीं, बल्कि सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा माना जाए. इन परिस्थितियों के अभाव में शिक्षण संस्थानों में विषाक्त संस्कृति विकसित होती है, जिससे शिक्षक और विद्यार्थी दोनों तनाव में रहते हैं.

वर्ग, लिंग, जाति, नस्ल, यौनिकता, क्षेत्र, धर्म और अन्य सामाजिक वंचनाओं पर आधारित असमानताएं इस तनाव को और बढ़ाती हैं. शोषणकारी, सामंती और पितृसत्तात्मक व्यवस्थाएं कक्षाओं और परिसरों में भी दोहराई जाती हैं. इन विचारों को चुनौती देने के बजाय पाठ्यक्रम और संस्थान कई बार इन्हें बनाए रखते हैं. इससे वैज्ञानिक चेतना विकसित करने के लिए आवश्यक ज्ञान, शिक्षण और सीखने की मूल भावना प्रभावित होती है.

इसका सबसे अधिक असर वंचित पृष्ठभूमि से आने वाले विद्यार्थियों और शिक्षकों पर पड़ता है. दूसरी ओर, प्रभावशाली सामाजिक समूहों के कुछ विद्यार्थी और शिक्षक असमानता को बनाए रखने वाली धारणाओं और ज्ञान-परंपराओं को आगे बढ़ाते रहते हैं. हाशियाकरण से अलगाव और मानसिक तनाव पैदा होता है. लेखक के अनुसार, आत्महत्या संरचनात्मक हिंसा का परिणाम है, जिसमें अत्यधिक दबाव, वंचना और अलगाव एक साथ काम करते हैं.

शिक्षा का निजीकरण, संस्थानों की रैंकिंग, वित्तीय संसाधनों की कमी, संस्थानों की भौगोलिक स्थिति, रोजगार-केंद्रित शिक्षा और सफलता को पैसे तथा ऊंची तनख्वाह वाली नौकरी से मापने की प्रवृत्ति आनंददायक सीखने की बुनियाद को कमजोर करती है. अंक, ग्रेड और स्कोर को सफलता का पैमाना बनाने से भी सीखने की प्रक्रिया सीमित होती है.

लेखक के अनुसार, शिक्षा का उद्देश्य विज्ञान, धर्मनिरपेक्षता और तर्क पर आधारित आलोचनात्मक सोच विकसित करना होना चाहिए. सीखना आत्म-खोज की निरंतर प्रक्रिया है, जिसके जरिए व्यक्ति दुनिया को समझता है और असमानता तथा शोषण से मुक्ति के रास्ते तलाशता है. शिक्षा का बाजारीकरण और उसे वस्तु में बदलना विद्यार्थियों को और हाशिये पर धकेलता है तथा उनके अलगाव को गहरा करता है.

ऐसी असुरक्षित और शोषणकारी परिस्थितियों में विद्यार्थी आत्महत्या की ओर धकेले जा सकते हैं. इसलिए छात्र आत्महत्या को केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं माना जा सकता. आत्महत्या करने वाले व्यक्ति को दोष देना भी उन संस्थागत परिस्थितियों को छिपाने का तरीका बन सकता है, जो संकट पैदा करती हैं. काउंसलिंग और मानसिक स्वास्थ्य सहायता अस्थायी राहत दे सकती हैं, लेकिन लेखक का तर्क है कि समस्या का स्थायी समाधान उन परिस्थितियों को बदलने में है, जो आत्महत्या की जमीन तैयार करती हैं.

भारत के स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालयों तक शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थियों की आत्महत्या गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही है. लेखक के अनुसार, जिन युवाओं की क्षमता परिवार और समाज के विकास में योगदान दे सकती थी, उनकी असमय मौतें देश के लिए भी नुकसान हैं.

भारत में छात्र आत्महत्या क्यों करते हैं?

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की भारत में आकस्मिक मृत्यु और आत्महत्या 2024 रिपोर्ट, जो 2026 में प्रकाशित हुई, के अनुसार भारत में आत्महत्या से होने वाली कुल मौतों में विद्यार्थियों की हिस्सेदारी 8.5 प्रतिशत थी. एक वर्ष में 14,778 विद्यार्थियों की आत्महत्या दर्ज की गई. इसका अर्थ है कि देश में प्रतिदिन 40 से अधिक विद्यार्थी आत्महत्या करते हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में शहरी, शिक्षित और पुरुष आबादी में आत्महत्या की दर अधिक है.

लेखक आर्थिक संकट, कृषि संकट, बेरोजगारी, गरीबी, पितृसत्ता और सामाजिक-भावनात्मक अलगाव को आत्महत्या से जुड़ी व्यापक परिस्थितियों के रूप में देखते हैं.

लेख में चेतन भगत जैसे लोकप्रिय लेखकों के उस तर्क की आलोचना की गई है, जिसके अनुसार आरक्षित वर्गों के विद्यार्थी आईआईटी में सामान्य वर्ग के उन विद्यार्थियों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाते, जो राष्ट्रीय या ओलंपियाड स्तर की गणितीय प्रतिभा रखते हैं. लेखक इस तर्क को जातिवादी और अनुभवजन्य आधार से रहित बताते हैं. उनका कहना है कि असमान सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक परिस्थितियां प्रतिस्पर्धा के लिए असमान आधार तैयार करती हैं. विशेषाधिकार प्राप्त लोगों और हाशिये पर रहने वालों के बीच वास्तविक समान प्रतिस्पर्धा संभव नहीं है. लेखक के अनुसार, भेदभाव और अपमान के बावजूद वंचित जातियों के विद्यार्थी शिक्षा और उपयुक्त सीखने की परिस्थितियां मिलने पर बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं.

लेखक का आरोप है कि चेतन भगत जैसे तथाकथित उदारवादी, ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था में मौजूद सामंती और जाति-आधारित भेदभाव को छिपाने के लिए ऐसे तर्क प्रस्तुत करते हैं. उनके अनुसार, यह व्यवस्था पदानुक्रम, असमानता और शोषण पर आधारित है. अंक, रैंक और स्कोर पर केंद्रित प्रतिस्पर्धा को गुणवत्ता, रचनात्मकता या नवाचार का प्रमाण मान लेना भी उचित नहीं है.

लेख में कहा गया है कि सफलता, सामाजिक प्रतिष्ठा और करियर के नाम पर विद्यार्थियों को कठोर प्रतिस्पर्धा में धकेला जाता है. व्यक्तिवाद और प्रदर्शन पर आधारित शिक्षा व्यवस्था मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को बढ़ा सकती है और शिक्षण परिसरों में आत्महत्या के लिए अनुकूल परिस्थितियां पैदा कर सकती है. इसका असर आईआईटी, एनआईटी, आईआईएम, आईआईआईटी और केंद्रीय तथा राज्य विश्वविद्यालयों जैसे संस्थानों में भी दिखाई देता है.

लेखक के अनुसार, सीखना प्रतिस्पर्धा नहीं, सहयोग की प्रक्रिया है. ऊंची तनख्वाह वाली नौकरी और परीक्षा में प्रदर्शन को केंद्र में रखने वाली शिक्षा विद्यार्थियों पर अलगाव और दबाव बढ़ाती है. केवल रोजगार पाने के लिए तैयार करने वाला पाठ्यक्रम उन्हें पेशेवर जीवन से आगे की दुनिया के बारे में आलोचनात्मक चेतना विकसित करने का अवसर नहीं देता. लेख में यह भी उल्लेख है कि भारत में वेतनभोगी पेशेवर कुल आत्महत्या मामलों का 9.9 प्रतिशत हैं.

अंत में लेखक का तर्क है कि विद्यार्थियों की मौतों के पीछे सामंती, जाति-आधारित, वर्गीय और लैंगिक असमानताओं से निर्मित सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक परिस्थितियां जिम्मेदार हैं. काउंसलिंग और मानसिक स्वास्थ्य सहायता राहत दे सकती हैं, लेकिन स्थायी बदलाव के लिए सामंतवाद, पितृसत्ता और क्रोनी पूंजीवाद से पोषित अलगावकारी परिस्थितियों को समाप्त करना होगा. छात्र आत्महत्या रोकने के लिए सहयोग, समानता, मित्रता और आनंद पर आधारित शिक्षण वातावरण विकसित करना आवश्यक है, जहां ज्ञान मनुष्य को मुक्ति की ओर ले जाए.

भवानी शंकर नायक राजनीतिक टिप्पणीकार हैं. यह काउंटरकरंट्स में प्रकाशित उनके मूल अंग्रेजी लेख का हिंदी अनुवाद है.

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