दुनिया में वन्यजीवों की आबादी में 73% की गिरावट, जबकि कई जानवरों की गिनती ही नहीं हो रही

हन्ना सारा वॉचोप, गैरी डेविड पॉनी और निक इसाक की ‘द कन्वर्सेशन’ में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर में वन्यजीवों की आबादी में 1970 के बाद से औसतन 73% की गिरावट आई है. वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) के 2026 के ‘लिविंग प्लैनेट इंडेक्स’ में यह आकलन सामने आया है. हर दो साल में अपडेट होने वाला यह सूचकांक दुनिया में प्रकृति और जैव विविधता की स्थिति में हो रहे बदलावों को मापता है.

हालांकि, 73% की गिरावट का अर्थ यह नहीं है कि दुनिया के 73% जानवर विलुप्त हो चुके हैं. यह उन वन्यजीव आबादियों के आकार में औसत कमी को दर्शाता है, जिनकी निगरानी की गई है. यह सूचकांक संयुक्त राष्ट्र के जैव विविधता लक्ष्यों की दिशा में प्रगति का आकलन करने के लिए इस्तेमाल होने वाले प्रमुख मानकों में से एक है. लेकिन इसके पीछे मौजूद आंकड़े अभी भी अधूरे हैं.

जिन वन्यजीवों की गिनती होती है, वे पूरी तस्वीर नहीं दिखाते

जलवायु परिवर्तन की निगरानी के लिए दुनिया भर में हजारों मौसम केंद्र और वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड के स्तर जैसे माप उपलब्ध हैं. इसके विपरीत, वन्यजीवों की आबादी का आकलन करना अधिक कठिन और खर्चीला है. इसे व्यवस्थित रूप से मापने के लिए व्यापक संसाधनों की जरूरत होती है और निगरानी का दायरा भी सीमित है.

इसका नतीजा यह है कि जिन वन्यजीव आबादियों के आंकड़े उपलब्ध हैं, उनकी तुलना में बहुत बड़ी संख्या में ऐसी आबादियां हैं, जिनकी नियमित गिनती नहीं की जाती. वैज्ञानिकों को पुराने आंकड़ों की कमी की समस्या का भी सामना करना पड़ता है, क्योंकि अतीत में वन्यजीवों की कितनी आबादी थी, इसका पता लगाने के लिए समय में पीछे जाकर गणना करना संभव नहीं है.

लिविंग प्लैनेट इंडेक्स को अकादमिक अध्ययनों, सीमित निगरानी कार्यक्रमों और उन प्रजातियों से जुड़े आंकड़ों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिनका मनुष्य शिकार या उपयोग करते हैं. कुछ आलोचनात्मक अध्ययनों में कहा गया है कि उपलब्ध रिकॉर्ड में बढ़ने और घटने वाली आबादियों की संख्या लगभग बराबर दिखाई देती है. बायोटाइम नामक एक अन्य बड़े डेटाबेस में भी ऐसा ही रुझान दिखता है. इसके बावजूद समग्र सूचकांक में इतनी बड़ी गिरावट सामने आती है, क्योंकि उपलब्ध आंकड़े वन्यजीवों की पूरी आबादी का प्रतिनिधित्व नहीं करते.

वन्यजीवों की गिनती में मौजूद पक्षपात

लिविंग प्लैनेट इंडेक्स में संरक्षित क्षेत्रों के आंकड़ों का अनुपात अधिक है. शोधकर्ताओं के शुरुआती विश्लेषण के मुताबिक, इस सूचकांक और बायोटाइम में ऐसे क्षेत्रों से प्राप्त आंकड़े भी अधिक हैं, जहां प्राकृतिक आवास अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं. इनमें दूरदराज के जंगल और राष्ट्रीय उद्यान शामिल हैं.

इसका अर्थ है कि वन्यजीवों की स्थिति के बारे में उपलब्ध जानकारी का बड़ा हिस्सा उन इलाकों से आ सकता है, जहां जैव विविधता के बेहतर बने रहने की उम्मीद होती है. इससे वास्तविक गिरावट कम दिखाई देने का जोखिम है. जंगलों को कृषि भूमि में बदलने से कुछ प्रजातियों को फायदा हो सकता है, लेकिन उष्णकटिबंधीय जंगलों को एकल फसल वाले बागानों में बदलने या घास के मैदानों पर शहर बसाने से अक्सर कई वन्यजीव आबादियां घटती हैं.

हालांकि, आंकड़ों में पक्षपात दूसरी दिशा में भी हो सकता है. संकटग्रस्त प्रजातियों या मनुष्यों द्वारा बड़े पैमाने पर इस्तेमाल की जाने वाली प्रजातियों, जैसे मछलियों, पर अधिक अध्ययन होने से गिरावट का अनुपात बढ़ा हुआ दिख सकता है. वैज्ञानिक अभी यह पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं कि ये सीमाएं वैश्विक आकलन को किस हद तक प्रभावित करती हैं.

वैज्ञानिक आंकड़ों की कमी कैसे दूर कर रहे हैं

लिविंग प्लैनेट इंडेक्स अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका जैसे कम अध्ययन वाले क्षेत्रों के आंकड़ों को अधिक महत्व देकर कुछ असंतुलन दूर करने की कोशिश करता है. इन क्षेत्रों में प्राकृतिक आवास का नुकसान अधिक है और प्रजातियों की विविधता भी व्यापक है. हालांकि, कुछ आंकड़े बहुत कम समय के दौरान जुटाए गए हैं और उनमें केवल दो समय बिंदुओं के बीच तुलना उपलब्ध है. इससे आबादी में बदलाव के आकलन को लेकर अनिश्चितता बनी रहती है. ऐसे आंकड़ों को पूरी तरह हटा देने से उपलब्ध जानकारी और कम हो जाएगी तथा मौजूदा पक्षपात बढ़ सकता है.

वैज्ञानिक जैव विविधता के आंकड़ों में मौजूद असंतुलन को समझने और सूचकांकों को अधिक सटीक बनाने के लिए नए तरीके विकसित कर रहे हैं. चुनौती केवल उपलब्ध आंकड़ों का विश्लेषण करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि वे वास्तविक दुनिया की स्थिति का यथासंभव सही प्रतिनिधित्व करें.

वैश्विक स्तर पर वन्यजीवों में बदलाव की विविधता को एक सूचकांक में समेटना बेहद कठिन काम है. इसलिए 73% की गिरावट को समझते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह निगरानी में शामिल आबादियों के औसत बदलाव का संकेत है, न कि दुनिया के कुल जानवरों के विलुप्त होने का आंकड़ा. बेहतर निगरानी और अधिक प्रतिनिधित्व वाले आंकड़ों के बिना जैव विविधता के संकट की पूरी तस्वीर सामने लाना मुश्किल रहेगा.

Previous
Previous

अमित शाह और चुनाव आयोग ने एसआईआर को घुसपैठियों की पहचान का अभियान बताया, लेकिन आयोग के पास उनका रिकॉर्ड नहीं

Next
Next

‘पापा, मैं ज़िंदा हो गई’: प्रकोप में दम तोड़ने से पहले उसके आखिरी शब्द