अमित शाह और चुनाव आयोग ने एसआईआर को घुसपैठियों की पहचान का अभियान बताया, लेकिन आयोग के पास उनका रिकॉर्ड नहीं
‘द रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ में आयुषी कर की पड़ताल के मुताबिक, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का एक उद्देश्य घुसपैठियों की पहचान करना बताया था. हालांकि, आयोग के सॉफ्टवेयर और सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत मिले जवाबों की पड़ताल में सामने आया कि हटाए गए 13.39 करोड़ मतदाताओं में से किसी को विदेशी नागरिक के रूप में चिह्नित करने की कोई व्यवस्था नहीं थी. बिहार में 100 से अधिक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों (ईआरओ) के जवाबों में भी किसी गैर-भारतीय नागरिक का रिकॉर्ड नहीं मिला.
घुसपैठियों की पहचान के दावे पर सवाल
दिल्ली में एसआईआर के विरोध के बीच अमित शाह ने लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी पर घुसपैठियों को बचाने का आरोप लगाया था. उन्होंने दावा किया कि मतदाता सूची से हटाए गए 13.39 करोड़ नामों में घुसपैठिए भी शामिल थे. लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक, आयोग के सॉफ्टवेयर में अधिकारियों के पास किसी मतदाता को विदेशी नागरिक के रूप में चिह्नित करने का विकल्प ही नहीं था.
बिहार में जून 2025 में एसआईआर शुरू हुआ था. उस समय आयोग ने घुसपैठियों की पहचान को अभियान का प्रमुख उद्देश्य बताया था. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो आयोग ने अदालत में भी यही तर्क दिया. अदालत ने एसआईआर को संवैधानिक ठहराते हुए निर्देश दिया था कि गैर-नागरिक होने के आधार पर हटाए गए लोगों के मामलों को नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत सक्षम प्राधिकारी के पास भेजा जाए. यह प्राधिकारी केंद्रीय गृह मंत्रालय है. रिपोर्ट के मुताबिक, सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट नहीं है कि आयोग ने ऐसे मामलों की सूची मंत्रालय को सौंपी या नहीं.
आरटीआई में नहीं मिला विदेशी नागरिकों का रिकॉर्ड
अदालत की तय समय-सीमा बीतने के बाद ‘द रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ ने आरटीआई के जरिए आयोग से पूछा कि क्या उसने संबंधित मामलों को गृह मंत्रालय के पास भेजा है. बिहार और पश्चिम बंगाल से जुड़े संदिग्ध विदेशी नागरिकों की जानकारी भी मांगी गई. आयोग ने सवाल बिहार के निर्वाचन अधिकारियों को भेज दिए. वहां से मिले जवाबों में अनुपस्थित, स्थानांतरित और मृत मतदाताओं के आंकड़े तो दिए गए, लेकिन किसी गैर-भारतीय नागरिक का उल्लेख नहीं था.
बिहार में घर-घर सत्यापन के दौरान विदेशी नागरिकों की पहचान किए जाने के दावे किए गए थे, लेकिन सितंबर 2025 में हटाए गए मतदाताओं के आधिकारिक आंकड़ों में विदेशियों की अलग श्रेणी नहीं थी. बिहार के विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों के अधिकारियों ने भी आरटीआई के जवाब में ऐसे लोगों का कोई रिकॉर्ड नहीं होने की बात कही.
एसआईआर के नियमों में विदेशी नागरिकों का उल्लेख नहीं
दूसरे चरण में 12 राज्यों में एसआईआर के दौरान बूथ स्तर के अधिकारियों को गैर-भारतीय नागरिकों की पहचान या रिपोर्ट करने की जिम्मेदारी नहीं दी गई थी. आयोग के निर्देशों में मतदाताओं के नाम हटाने के लिए चार आधार बताए गए थे—अनुपस्थित होना, स्थानांतरित होना, दोहरी प्रविष्टि और मृत्यु.
इसके साथ ही आयोग ने ऐसे मतदाताओं की पहचान के लिए एक प्रक्रिया अपनाई, जो 2002–2004 की पुरानी मतदाता सूचियों से अपना या अपने परिवार का संबंध नहीं जोड़ पाए थे. ऐसे मतदाताओं को सुनवाई के लिए बुलाया जाता था और निर्धारित दस्तावेज प्रस्तुत न कर पाने पर उनका नाम हटाया जा सकता था. लेकिन रिपोर्ट की पड़ताल में चुनावी सॉफ्टवेयर ईआरओनेट में भी मतदाताओं को गैर-भारतीय चिह्नित करने का विकल्प नहीं मिला.
उत्तर प्रदेश में पड़ताल के दौरान यह भी सामने आया कि एसआईआर सुनवाई के बाद नाम हटाने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-7 स्वतः तैयार किए गए थे और उन पर अधिकारी के हस्ताक्षर पहले से मौजूद थे. रिपोर्ट के अनुसार, सुनवाई के दौरान हटाए गए लगभग 86,000 मतदाताओं के फॉर्म में नाम हटाने का कारण दर्ज नहीं था.
मतदाता सूची से नाम हटने के परिणाम
एसआईआर में गैर-नागरिकों की पहचान कर उन्हें हटाने की स्पष्ट प्रक्रिया नहीं थी, लेकिन मतदाता सूची से नाम हटने के गंभीर परिणाम सामने आए. पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत के बाद एसआईआर से हटाए गए लोगों के कल्याणकारी लाभों में कटौती किए जाने की बात रिपोर्ट में कही गई है. मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने इससे पहले कहा था कि मृत व्यक्तियों, अवैध घुसपैठियों और गैर-भारतीय नागरिकों को राज्य के नागरिकों के लिए निर्धारित लाभ नहीं मिलने चाहिए.
इस बीच विपक्षी दल आयोग से उन कथित घुसपैठियों की जानकारी सार्वजनिक करने की मांग करते रहे, जिन्हें एसआईआर का एक प्रमुख कारण बताया गया था. रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि आयोग की उपलब्ध प्रक्रियाओं और सॉफ्टवेयर में ऐसे लोगों को विदेशी नागरिक के रूप में चिह्नित करने की व्यवस्था नहीं थी. इसलिए हटाए गए नामों की संख्या को विदेशी नागरिकों की पहचान का प्रमाण नहीं माना जा सकता.

