‘पापा, मैं ज़िंदा हो गई’: प्रकोप में दम तोड़ने से पहले उसके आखिरी शब्द

मध्यप्रदेश के आदिवासी जिले बालाघाट में हाल ही में जान गंवाने वाले 32 बच्चों में से एक काजल सैय्याम भी थी. उसे गणित से प्यार था, वह एक “बड़े स्कूल” में दाखिला लेना चाहती थी और बड़ी होकर डॉक्टर बनना चाहती थी. ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की टीम बालाघाट का दौरा करती है और पाती है कि एक 10 साल की बच्ची के सपनों के रास्ते में बहुत सी चीज़ें रुकावट बन सकती हैं — सामाजिक पिछड़ापन, कुपोषण और एक ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था जिसकी ठीक से सेवा न की गई हो.

आनंद मोहन जे की इस ग्राउंड रिपोर्ट में कहा है कि काजल सैय्याम में कुछ अलग ही बात थी. कुछ इतना असाधारण कि वह मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले के मोहनपुर गांव में बने सूने आदिवासी घरों को आशा की एक दुर्लभ किरण से भर देती थी. वह लड़की जो अपने बड़े भाई-बहनों को उनकी किताबों के सवाल हल करने में मदद करती थी, वह लड़की जो एक दिन कक्षा में "निडर होकर" खड़ी हुई और बोली कि वह डॉक्टर बनना चाहती है (जबकि उसके आसपास के बाकी बच्चे शर्म से मुस्कुरा रहे थे), और वह लड़की जिसने बिना किसी गलती के अपना स्वतंत्रता दिवस का भाषण लिखा और पढ़कर सुनाया था.

29 अगस्त को, काजल 'मरीज नंबर 32' बन गई — बालाघाट स्वास्थ्य विभाग की उस सूची में अंतिम बच्चा, जिनकी मौत मध्य प्रदेश के पूर्वी हिस्से में छत्तीसगढ़ सीमा के पास हरी-भरी पहाड़ियों के बीच बसे आदिवासी गांवों में घातक बीमारियों के कहर के बाद हुई थी. इन 32 पीड़ितों की उम्र 1 से 13 साल के बीच थी और उन्हें तेज बुखार, चकत्ते, लाल धब्बे, पेट दर्द व छाले होने की शिकायत थी.

इन मौतों से उपजे राजनीतिक जनाक्रोश के बाद, केंद्र की 'नेशनल जॉइंट आउटब्रेक रिस्पॉन्स टीम' द्वारा की गई जांच में पाया गया कि जून से अगस्त के बीच जब कुपोषण के गंभीर स्तर से जूझ रहे इस इलाके में खसरा, मलेरिया, चिकनगुनिया और डेंगू फैल रहा था, तब बालाघाट जिले की बीमारी निगरानी प्रणाली (डिसीज सर्विलांस सिस्टम) पूरी तरह लाचार साबित हुई. जांच में सामने आया कि बालाघाट में कोई पब्लिक हेल्थ लैब (सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रयोगशाला) नहीं थी, और जिला महामारी विशेषज्ञ (एपिडेमोलॉजिस्ट) व माइक्रोबायोलॉजिस्ट जैसे महत्वपूर्ण पद खाली पड़े थे, तथा पूरे निगरानी तंत्र को एक डेटा ऑपरेटर चला रहा था.

बीमारी का यह प्रकोप मुख्य रूप से बालाघाट के बिरसा और बैहर ब्लॉक में फैला, जहाँ गोंड और बैगा समुदाय के लोग रहते हैं. गोंड जनजाति (जिससे काजल का परिवार आता है) राज्य के सबसे बड़े और अपेक्षाकृत संपन्न आदिवासियों में से एक है, जबकि बैगा जनजाति मध्यप्रदेश के तीन 'विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों' (पीवीटीजी) में से एक है.  उनका पिछड़ापन और स्थानीय परंपराओं पर निर्भरता का मतलब यह है कि वे स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच से काफी हद तक बाहर हैं.

"अधिकांश आशा कार्यकर्ता बैगा जनजाति से हैं. उनके लिए मदद की गुहार पर जाना मुश्किल होता है… उदाहरण के लिए, वे किसी गर्भवती महिला या बीमार बच्चे को आधी रात में 40 किमी दूर अस्पताल कैसे ले जा सकती हैं? इन चुनौतियों के कारण उनके पति आमतौर पर उन्हें काम करने से मना करते हैं," आशा सुपरवाइजर विमला यादव कहती हैं.  

अगले कुछ दिनों में, जब स्वास्थ्य अधिकारी घर-घर गए, तो उन्हें लगभग हर घर में बीमार बच्चे मिले. जुलाई के अंत तक, प्रशासन को आशंका हो गई थी कि बीमारी उनकी सोच से कहीं अधिक व्यापक रूप से फैल चुकी है.

बोंडारी, जहाँ 103 घरों में से प्रत्येक में कम से कम एक बच्चा बीमार था, राहत और उपचार अभियानों का केंद्र बन गया. बैहर के कांग्रेस विधायक संजय उइके ने कहा कि बच्चों को बचाया नहीं जा सका "क्योंकि बालाघाट में कोई स्वास्थ्य व्यवस्था ही नहीं है." "सभी स्वास्थ्य केंद्र 40-50 किमी दूर हैं, और आशा व एएनएम के पद खाली पड़े हैं. कई बच्चों को खसरे का टीका तक नहीं दिया गया था. मौतों में कुपोषण एक बड़ा कारण था, और आंगनबाड़ियों से दिया जाने वाला 'टेक-होम राशन' (घर ले जाने वाला सूखा राशन) महीनों से बंद पड़ा है," वे कहते हैं.

केंद्र प्रायोजित एकीकृत बाल विकास सेवा (आईसीडीएस) योजना के तहत, आंगनबाड़ियों को बच्चों, गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को पोषण सामग्री वितरित करनी होती है. हालांकि, इन इलाकों में छह महीने से अधिक समय से सूखा राशन आपूर्ति नहीं किया गया था. कुपोषण का उच्च स्तर और आंगनबाड़ियों से मिलने वाले ‘टेक-होम राशन’ की छह महीने से अधिक समय से बंद सप्लाई ने इस संकट को और गंभीर बना दिया. मतला और बोंडारी जैसे गांवों में आशा और एएनएम कार्यकर्ताओं के पद खाली होने के कारण शुरुआती दौर में इन जानलेवा संक्रमणों की भनक तक नहीं लग पाई, और ग्रामीण अज्ञानता वश झाड़-फूंक (पंडा-पुजारियों) का सहारा लेते रहे.

अगस्त के अंतिम सप्ताह में काजल भी इस प्रकोप की चपेट में आ गई. परिवार ने पहले इसे सामान्य बुखार समझा क्योंकि उसे पहले भी मलेरिया से उबरने का अनुभव था, इसलिए वे उसे स्कूल भेजते रहे — जो उनकी सबसे बड़ी भूल साबित हुई. जब उसकी तबीयत अत्यधिक बिगड़ी और तेज बुखार से उसका सिर फटने लगा, तो दुर्गम इलाके और मोबाइल सिग्नल न होने के कारण समय पर एम्बुलेंस नहीं बुलाई जा सकी.

आसपास के लोगों की मदद से उसे ऑटो-रिक्शा द्वारा 28 किलोमीटर दूर बालाघाट के एक निजी अस्पताल ले जाया गया. वहाँ जाँच में उसे प्लास्मोडियम फाल्सीपेरम मलेरिया, सेप्टिक शॉक और गंभीर रूप से गिरे हुए ब्लड शुगर व ऑक्सीजन स्तर का सामना करना पड़ा. आईसीयू के भारी-भरकम खर्च को उठाने के लिए उसके गरीब मजदूर पिता प्रभुलाल को अपनी पत्नी के गहने और सोने की चूड़ियाँ तक गिरवी रखनी पड़ीं.

इलाज के दौरान एक पल के लिए जब काजल को होश आया, तो उसने अपने पिता के पास पहुँचकर अपने जीवन के आखिरी शब्द कहे —पापा, मैं ज़िंदा हो गई.” इसके तुरंत बाद उसे महाराष्ट्र के गोंदिया रेफर किया गया, जहाँ 29 अगस्त की सुबह उसकी मृत्यु हो गई.

अंतिम संस्कार के समय आदिवासी परंपराओं के अनुसार मृतक की निशानियां मिटाने के लिए जब उसकी यूनिफॉर्म और किताबें अग्नि को समर्पित की जा रही थीं, तब उसकी शिक्षिका सुनीता ने समुदाय के बुजुर्गों से विनती करके उसकी कॉपियों और बेहतरीन नोट्स को बचा लिया, ताकि वे आने वाले छात्रों के लिए प्रेरणा बन सकें. यह कहानी न केवल एक मेधावी बच्ची के सपनों के टूटने की कहानी है, बल्कि यह देश के दूरदराज इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की दयनीय स्थिति पर एक गंभीर सवालिया निशान भी लगाती है.

(यह आनंद मोहन जे की रिपोर्ट का हिंदी में अनूदित सारांश है. पूरी रिपोर्ट यहां पढ़ी जा सकती है.) 

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