भारत में हर 8 मिनट में एक परिवार हार्ट फेलियर के इलाज के लिए बेच रहा है अपनी संपत्ति

भारत के किसी कोने में इस वक्त कोई परिवार अपने जीवन का सबसे मुश्किल फैसला ले रहा होगा. शायद वह पुश्तैनी जमीन बेचने की तैयारी कर रहे होंगे, या शायद वह सोना जो बेटी की शादी के लिए बरसों से सहेज कर रखा था. इसका कारण कोई व्यापारिक घाटा नहीं, बल्कि घर के किसी सदस्य का इलाज है. ‘साउथ फर्स्ट’ में सुमित झा की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर 8 मिनट में एक परिवार को हार्ट फेलियर के इलाज का खर्च उठाने के लिए अपनी संपत्ति बेचनी पड़ती है.

यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि मार्च 2026 में ‘ग्लोबल हार्ट’ में प्रकाशित एक विस्तृत अध्ययन की हकीकत है. श्री चित्रा तिरुनल इंस्टीट्यूट फॉर मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन ने देश के 21 अस्पतालों के 1,859 मरीजों के आर्थिक हालातों का जायजा लिया.

वह बिल, जिसे चुकाना नामुमकिन है

हार्ट फेलियर कोई ऐसी बीमारी नहीं है जो एक ऑपरेशन के बाद खत्म हो जाए. यह एक लंबी और खर्चीली प्रक्रिया है. जिसमें जीवनभर दवाएं, बार-बार इकोकार्डियोग्राम, ब्लड टेस्ट और बार-बार अस्पताल में भर्ती होना शामिल होता है.

सुमित झा अपनी रिपोर्ट में बताते हैं कि भारत में एक हार्ट फेलियर मरीज का औसत वार्षिक खर्च ₹1,06,566 है. इसके विपरीत, बीमारी के बाद इन मरीजों की औसत व्यक्तिगत वार्षिक आय केवल ₹94,392 रह जाती है. यानी इलाज का बिल मरीज की कुल कमाई से भी ज्यादा है. अध्ययन के अनुसार, कुल स्वास्थ्य खर्च का 92.6% हिस्सा आउट-ऑफ-पॉकेट होता है, यानी वह पैसा जो मरीज को सीधे अपनी जेब से देना पड़ता है.

संपत्ति और सपनों की नीलामी

जब बचत खत्म हो जाती है, तो परिवार ‘डिस्ट्रेस फाइनेंसिंग’ (संकटकालीन वित्त पोषण) का सहारा लेते हैं. अध्ययन के आंकड़े बताते हैं कि 67.7% लोग अपनी पूरी जमा-पूंजी इलाज में लगा देते हैं और 54.4% मामलों में परिवार के सभी सदस्य मिलकर पैसा जुटाने का काम करते हैं. जबकि 3.8% मरीजों को अपना घर, जमीन या मवेशी बेचने पड़ते हैं.

यदि हम भारत में हर साल होने वाले 1.8 मिलियन हार्ट फेलियर दाखिलों पर इस 3.8% के आंकड़े को लागू करें, तो साल भर में 68,400 परिवार अपनी संपत्ति बेचते हैं. गणित आसान है: हर दिन 187 परिवार, और हर 8 मिनट में एक परिवार अपनी संपत्ति बेचते हैं.

आय का स्थायी नुकसान

हार्ट फेलियर सिर्फ बैंक बैलेंस पर हमला नहीं करता, बल्कि भविष्य की कमाई के रास्ते भी बंद कर देता है. रिपोर्ट बताती है कि डायग्नोसिस से पहले मरीजों की औसत मासिक आय ₹12,595 थी, जो बीमारी के बाद घटकर ₹7,866 रह गई. यह आय में लगभग 37% की गिरावट है.

इसका कारण यह है कि मरीज या तो काम करने के लायक नहीं रहता, या घर के किसी अन्य सदस्य को उसकी देखभाल के लिए अपनी नौकरी छोड़नी पड़ती है. यह एक ऐसा दुष्चक्र है जिसमें स्वास्थ्य की हानि, आय की हानि और बढ़ता कर्ज एक साथ मिलकर परिवार को गरीबी की रेखा के नीचे धकेल देते हैं.

बीमा का अधूरा कवच

भारत सरकार ने 'आयुष्मान भारत' जैसी योजनाओं के जरिए स्वास्थ्य सुरक्षा प्रदान करने की कोशिश की है, लेकिन हार्ट फेलियर जैसे दीर्घकालिक रोगों के मामले में ये नाकाफी साबित हो रही हैं. मौजूदा अधिकांश बीमा योजनाएं केवल अस्पताल में भर्ती होने  के खर्च को कवर करती हैं. लेकिन हार्ट फेलियर में असली खर्च अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद शुरू होता है, जैसे महंगी दवाएं और नियमित जांच, जो कवर नहीं होतीं."

अध्ययन में पाया गया कि बीमा होने के बावजूद 30.8% मरीजों को 'विनाशकारी स्वास्थ्य खर्च' का सामना करना पड़ा. बिना बीमा वाले मरीजों के लिए यह आंकड़ा 40.3% था.

ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और बदतर

इस संकट का सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि यह ग्रामीण भारत और गरीब तबके को सबसे ज्यादा चोट पहुँचाता है. ग्रामीण क्षेत्रों में 45.6% मरीजों को विनाशकारी खर्च झेलना पड़ा. दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले मरीजों को इलाज के लिए लंबा सफर तय करना पड़ता है, उनकी बचत कम होती है और निजी अस्पतालों के बिल शहरों जैसे ही भारी होते हैं.

इसके अलावा, भारत में हार्ट फेलियर के मरीजों की औसत आयु 55.9 वर्ष है, जो पश्चिमी देशों की तुलना में 10-15 साल कम है. यह वह उम्र है जब इंसान अपने परिवार का मुख्य स्तंभ होता है. जब इस उम्र में कोई बीमार पड़ता है, तो बच्चों की शिक्षा और शादियां रुक जाती हैं और आर्थिक कमज़ोरी पूरी एक पीढ़ी को प्रभावित करता है.

भारत को अपनी स्वास्थ्य नीतियों में बदलाव की जरूरत है. केवल अस्पताल में भर्ती होने का खर्च उठाना काफी नहीं है. बीमा योजनाओं में ओपीडी परामर्श और दवाओं के खर्च को शामिल करना अनिवार्य होना चाहिए. हार्ट फेलियर की जीवन रक्षक दवाओं को ‘आवश्यक दवा सूची’ में शामिल कर उनकी कीमत कम की जानी चाहिए. तेलंगाना और तमिलनाडु जैसे राज्यों के उदाहरण बताते हैं कि निजी अस्पतालों में खर्च बहुत अधिक है. सरकारी अस्पतालों की सुविधाओं को इस स्तर तक बढ़ाना होगा कि आम आदमी को ₹95,000 के निजी बिल से न जूझना पड़े.

 

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