‘मेड इन इंडिया’ संकट: बंगाल चुनाव में ‘एसआईआर’ ने महानगरों में बढ़ाई घरेलू सहायकों की किल्लत
पश्चिम बंगाल में आज मंगलवार (29 अप्रैल 2026) को दूसरे चरण की 142 विधानसभा सीटों के लिए वोट डाले गए. इसके पहले 23 अप्रैल को पहले दौर में 152 सीटों के लिए मतदान हुआ था. लेकिन, इस बार राज्य के चुनाव के दौरान एक सवाल पैदा हुआ कि क्या यह हाल के समय में शहरी भारतीय घरों पर आया सबसे बड़ा संकट है? या यह केवल उन परेशान घर-मालिकों को ऐसा महसूस हो रहा है, जिन्हें अब समझ आ रहा है कि वे सहायकों की उस विशाल फौज पर कितने निर्भर हैं जो उनके घरों और शहरों की रफ्तार बनाए रखते हैं, और जो अचानक गायब हो गए हैं?
‘द टेलीग्राफ’ में परन बालकृष्णन की रिपोर्ट के अनुसार, जैसे-जैसे पश्चिम बंगाल चुनाव एक भीषण और हाई-प्रोफाइल मुकाबले में तब्दील हुए—जहाँ भाजपा, टीएमसी को सत्ता से बेदखल करने की कोशिश में है—इन "लापता सहायिकाओं" का असर राज्य की सीमाओं से कहीं दूर तक महसूस किया जा रहा है. मुंबई, बेंगलुरु और चेन्नई से लेकर हैदराबाद, गुरुग्राम, नोएडा और लुटियंस दिल्ली तक, इसका प्रभाव तत्काल और व्यक्तिगत रहा है.
"मुझे खाना बनाने से नफरत नहीं है, नफरत तो बर्तन धोने से है," गुरुग्राम की एक महिला ने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया, जिनकी मेड (सहायिका) छुट्टी पर गई है. दूसरी महिला ने जवाब दिया, "मैं भी उसी नाव में सवार हूँ."
अगर यह कोई किताब होती, तो इसका शीर्षक होता: 'कहाँ चले गए सारे रसोइये और सहायक?' और इसके उप-शीर्षक में सफाईकर्मी, ड्राइवर, रेस्तरां के वेटर और कई अन्य लोग शामिल होते.
इसका जवाब ज़ाहिर तौर पर यही है कि वे वोट डालने अपने घर गए हैं. लेकिन इस पलायन के पैमाने और इसकी अवधि ने नियोक्ताओं (मालिकों) को हैरान कर दिया है.
"पूरा नोएडा अब एक खाली घोंसले जैसा महसूस होने लगा है"
नोएडा की संचार विशेषज्ञ अंजलि प्रसाद शर्मा कहती हैं: "ऐसा लगता है जैसे भारी संख्या में लोग चुनावों के लिए निकल गए हैं और वे लंबी अवधि के लिए गए हैं. इस वजह से नोएडा अब एक 'एम्प्टी-नेस्टर' (जहाँ बच्चे घर छोड़कर चले गए हों) स्पेस जैसा महसूस होने लगा है."
पश्चिम बंगाल के प्रवासी श्रमिकों की इस अचानक अनुपस्थिति को सोशल मीडिया पर चटकारे लेकर परोसा जा रहा है. मीम्स की भरमार है; पूर्व चुनाव आयुक्त डॉ. एस.वाई. कुरैशी द्वारा साझा की गई एक पोस्ट में मज़ाक किया गया: "गुरुग्राम पश्चिम बंगाल में शांतिपूर्ण चुनाव की कामना करता है. हमें अपनी मेड्स सुरक्षित और जल्द वापस चाहिए."
लेकिन यह हास्य कई लोगों को रास नहीं आया, खासकर इसलिए क्योंकि यह उजागर करता है कि देश के कई हिस्सों में पश्चिम बंगाल को किस नज़रिए से देखा जाता है. वरिष्ठ वकील महेश जेठमलानी कहते हैं, "एक राज्य जिसने कभी भारत की बौद्धिकता, उद्योग और नैतिक कल्पना को आकार दिया था, उसे अब आर्थिक गिरावट के ऐसे दौर में धकेल दिया गया है जहाँ अस्तित्व के लिए पलायन करना सामान्य माना जाता है."
सोशल मीडिया पर एक अन्य उपयोगकर्ता ने लिखा: "एक समय था जब पश्चिम बंगाल अपनी बौद्धिक हस्तियों और व्यावसायिक घरानों के लिए जाना जाता था. आज इसका एकमात्र निर्यात 'मेड्स' हैं." एक अन्य ने घोषणा की: "ममता बनर्जी ने बंगाल को भारत की 'मेड्स कैपिटल' बना दिया है. "
पहचान और अस्तित्व की लड़ाई
लेकिन भारत के समृद्ध वर्गों के बीच बंगाल की छवि को लेकर चल रही यह बहस निम्न-आय वाले बंगालियों के लिए बेमानी है. उनके लिए कहीं अधिक एक तात्कालिक चिंता है “मतदाता सूची में अपना नाम सुनिश्चित करना.” इसी चिंता ने उन्हें घर लौटने पर मजबूर कर दिया.
वर्तमान 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (एसआईआर) अभियान ने कई लोगों के लिए घर लौटकर वोटर लिस्ट में अपना नाम चेक करना अनिवार्य बना दिया. जो लोग सक्षम हैं, उन्होंने अपनी हवाई टिकटें तक बुक कर लीं. कई लोगों को डर है कि उनके नाम हटा दिए गए होंगे, इसलिए उन्हें व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर अपना नाम सूची में बनाए रखना पड़ा है.
टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी ने कहा, "उचित दस्तावेज़ होने के बावजूद मतदाताओं को गलत तरीके से लिस्ट से हटाया गया है." विपक्ष ने आरोप लगाया है कि बड़ी संख्या में नाम काटे गए हैं, जिसे चुनाव अधिकारियों और भाजपा ने खारिज कर दिया है.
नियोक्ता अंजलि शर्मा बताती हैं कि उनकी मेड कोई जोखिम नहीं लेना चाहती थी और 12 तारीख को ही निकल गई. वह उम्मीद कर रही हैं कि महीने के अंत तक वापस आ जाएगी. बेंगलुरु में अखिला श्रीनिवासन एक बड़ा घर संभालती हैं और परेशान हैं क्योंकि उनकी मेड और ड्राइवर बिना यह बताए बंगाल चले गए कि वे कब लौटेंगे. नोएडा के गेझा और भंगेल जैसे मोहल्ले, जहाँ बंगाली श्रमिक रहते हैं, वहाँ की सड़कें अब पहले जैसी गुलज़ार नहीं हैं.
इसमें कोई शक नहीं कि राजनीतिक दल भी कम आय वाले मतदाताओं की लंबी यात्रा को संभव बनाने के लिए धन खर्च कर रहे हैं. तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा पर ट्रेनों में भरकर मतदाताओं को वापस लाने का आरोप लगाया है, जबकि भाजपा ने टीएमसी पर भी यही आरोप लगाए हैं. बहरहाल, भारत के शहरी मध्यम वर्ग के लिए यह सब कुछ हफ्तों की असुविधा हो सकती है, लेकिन बंगाल के कई लोगों के लिए यह अपनी पहचान बचाए रखने की जद्दोजहद है.

