फैक्ट्री कर्मचारी से पत्रकार तक: नोएडा के ‘साजिश’ मामले में पुलिस ने 8 लोगों को कैसे फंसाया

‘आर्टिकल 14’ में प्रकाशित सबा गुरमत की रिपोर्ट के मुताबिक, नोएडा में मजदूरों के वेतन और काम की बेहतर परिस्थितियों को लेकर हुए प्रदर्शनों के मामले में गिरफ्तार आठ लोग अप्रैल 2026 से जेल में हैं. इनमें सॉफ्टवेयर इंजीनियर, फैक्ट्री कर्मचारी, ऑटो चालक, कलाकार, कानून के छात्र, पीएचडी अभ्यर्थी और पत्रकार शामिल हैं.

25 वर्षीय थिएटर कलाकार और इतिहास की छात्रा आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2 सितंबर को रद्द कर दिया. अदालत ने पुलिस के दावे को ‘गढ़ी हुई कहानी’ बताया. हालांकि, आकृति अभी भी 11 प्राथमिकी के मामलों में जेल में हैं.

नोएडा के औद्योगिक क्षेत्र में अप्रैल 2026 में हजारों फैक्ट्री कर्मचारियों ने अधिक वेतन और बेहतर कामकाजी परिस्थितियों की मांग को लेकर काम बंद कर दिया था. नोएडा में करीब 12,000 औद्योगिक इकाइयां हैं, जिनमें अनुमानित 13 लाख लोग काम करते हैं. यहां कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक सामान और ऑटोमोबाइल के पुर्जे बनाए जाते हैं.

श्रम शोधकर्ता राखी सहगल के अनुसार, प्रदर्शन अचानक शुरू हुए थे. इसकी शुरुआत हरियाणा के मानेसर और पानीपत में हुए प्रदर्शनों से हुई, जहां मजदूरों ने वेतन बढ़ाने की मांग की थी. इसके बाद नोएडा में भी प्रदर्शन फैल गए और करीब 80 स्थानों के कर्मचारी इसमें शामिल हो गए.

मजदूरों को 11,000 से 14,000 रुपये मासिक वेतन मिल रहा था. 40,000 से अधिक कर्मचारियों ने 20,000 रुपये न्यूनतम वेतन की मांग की. इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने 1 अप्रैल से प्रभावी न्यूनतम वेतन में अंतरिम बढ़ोतरी की. इससे असंगठित श्रमिकों का वेतन 11,313 रुपये से बढ़कर 13,690 रुपये हुआ, जबकि अर्ध-कुशल और कुशल श्रमिकों के लिए वेतन क्रमशः 15,059 और 16,868 रुपये तय किया गया.

वेतन बढ़ोतरी के बाद प्रदर्शन शांत हो गए, लेकिन इसके बाद पुलिस कार्रवाई शुरू हुई. 150 से अधिक लोगों को गिरफ्तार और 1,200 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदर्शनों को उत्तर प्रदेश की ‘विकास और समृद्धि’ के खिलाफ नक्सलवाद को फिर से बढ़ावा देने की ‘बड़ी साजिश’ बताया.

20 अगस्त को इंडियन एक्सप्रेस ने 222 जमानत आदेशों का विश्लेषण किया. इसमें सामने आया कि 188 लोगों यानी करीब 84 प्रतिशत आरोपियों को जमानत मिल चुकी है. लेकिन कथित साजिश को आगे बढ़ाने के आरोपी आठ लोग अब भी जेल में हैं.

विरोधाभास और पुलिस रिकॉर्ड पर सवाल

आकृति चौधरी और 65 वर्षीय पत्रकार एवं अनुवादक सत्यम वर्मा को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत भी हिरासत में रखा गया था. यह कानून बिना मुकदमे के 12 महीने तक निवारक हिरासत की अनुमति देता है.

आकृति को 11 अप्रैल को दिल्ली के बॉटनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन से गिरफ्तार किया गया था. पुलिस का आरोप है कि उन्होंने 13 अप्रैल की हिंसा के लिए लोगों को उकसाया. उनके वकील का कहना है कि 11 अप्रैल को गिरफ्तार होने के बाद वह दो दिन बाद हुई हिंसा के लिए जिम्मेदार कैसे हो सकती हैं. पुलिस के अलग-अलग रिकॉर्ड में भी उनकी गिरफ्तारी की तारीख 11 और 12 अप्रैल दर्ज है.

तीन महिलाओं—आकृति, कलाकार सृष्टि गुप्ता और फैक्ट्री कर्मचारी मनीषा चौहान—को गिरफ्तार करते समय महिला पुलिसकर्मियों की मौजूदगी नहीं थी. उनके वकीलों के अनुसार, उन्हें गिरफ्तारी वारंट, गिरफ्तारी के आधार या हिरासत की जानकारी नहीं दी गई. परिवारों को भी उनके बारे में तब पता चला, जब उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया.

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 43(5) के अनुसार, किसी महिला को सामान्य परिस्थितियों में सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले गिरफ्तार नहीं किया जा सकता. विशेष परिस्थितियों में भी महिला पुलिस अधिकारी को प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट से लिखित अनुमति लेनी होती है.

पुलिस की चार आरोपपत्रों में गिरफ्तारी की तारीखों और स्थानों को लेकर भी अंतर सामने आया है. सत्यम वर्मा को लखनऊ की जनचेतना बुकस्टोर से गिरफ्तार किया गया था, लेकिन पुलिस रिकॉर्ड में उनकी गिरफ्तारी नोएडा से दिखाई गई. उनके मित्रों के अनुसार, उन्होंने 12 वर्षों से अधिक समय से नोएडा का दौरा नहीं किया था.

वकील कबीर अली जिया चौधरी ने यह भी कहा कि सूरजपुर अदालत के आदेशों में आरोपियों की ओर से पेश हुए वकीलों की मौजूदगी और उनकी दलीलों का उल्लेख नहीं किया गया. पांच वकीलों ने अदालत से अपनी उपस्थिति दर्ज करने का अनुरोध किया था.

आठ आरोपियों की भूमिका

सॉफ्टवेयर इंजीनियर आदित्य आनंद मजदूर अधिकारों पर लिखते थे और गरीब बच्चों के लिए पुस्तकालय तथा कक्षाएं चलाते थे. उनके भाई केशव आनंद के अनुसार, आदित्य ने 10 और 11 अप्रैल को नोएडा जाकर प्रदर्शन को दर्ज किया था. वीडियो में वह मजदूरों से शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अपील करते और अहिंसा की शपथ दिलाते दिखाई देते हैं.

इसके बावजूद आदित्य पर हत्या के प्रयास, सरकारी कर्मचारी को गंभीर चोट पहुंचाने, दंगा, गैरकानूनी जमावड़ा और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसे आरोप लगाए गए. उन्हें 17 अप्रैल को तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार किया गया. उनके परिवार ने हिरासत में यातना का आरोप लगाया है.

ऑटो चालक और मजदूर कार्यकर्ता रूपेश रॉय मजदूरों के व्हाट्सऐप समूह का संचालन करते थे. उन्हें 11 अप्रैल को गिरफ्तार किया गया, जबकि पुलिस जिस हिंसा की साजिश का आरोप लगा रही है, वह 13 अप्रैल को हुई थी. अदालत के रिकॉर्ड में यह भी सामने आया कि पुलिस उपनिरीक्षक बीना कौर उसी व्हाट्सऐप समूह की सदस्य थीं, जिसे पुलिस साजिश का हिस्सा बता रही है.

फैक्ट्री कर्मचारी मनीषा चौहान पर मजदूरों को प्रदर्शन के लिए संगठित करने का आरोप लगाया गया है. उनके परिवार के अनुसार, वह हर महीने करीब 22,000 रुपये कमाती थीं और परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी संभालती थीं. वह आठ आरोपियों में अकेली ऐसी व्यक्ति हैं, जिनका काम सीधे फैक्ट्री मजदूरों के बीच था.

पीएचडी अभ्यर्थी हिमांशु ठाकुर को 18 अप्रैल को दिल्ली के शालीमार बाग स्थित उनके कमरे से उठाया गया. परिवार का आरोप है कि उन्हें 36 घंटे से अधिक समय बाद अदालत में पेश किया गया और हिरासत में उनके साथ मारपीट की गई.

कानून के छात्र योगेश मीणा को 30 मई को रामजस कॉलेज के पास से गिरफ्तार किया गया. पुलिस ने उनके खिलाफ व्हाट्सऐप समूहों में भड़काऊ संदेश भेजने का आरोप लगाया है. हालांकि, आरोपपत्र में उनके वॉयस मैसेज का कोई प्रतिलेख नहीं है. समर्थकों के अनुसार, योगेश मजदूरों से शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने और पुलिस के उकसावे से बचने की अपील कर रहे थे.

पत्रकार सत्यम वर्मा पर भी नोएडा प्रदर्शनों में शामिल होने का आरोप लगाया गया. पुलिस ने उनके खिलाफ विदेशी मुद्रा में एक करोड़ रुपये मिलने का दावा किया, लेकिन उनके वकील के अनुसार, अदालत में इसका कोई प्रमाण पेश नहीं किया गया. उनकी राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत में एक दक्षिणपंथी सोशल मीडिया खाते से ली गई सामग्री को भी आधार बनाया गया, जिसमें फिलिस्तीन समर्थक प्रदर्शन में उनकी मौजूदगी की तस्वीरें शामिल थीं.

अदालत ने आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत रद्द कर दी है, लेकिन बाकी आरोपियों की तरह वह भी 11 प्राथमिकी में जेल में हैं. इन मामलों में गिरफ्तारी की तारीखों, स्थानों, पुलिस कार्रवाई और आरोपियों की भूमिका को लेकर सामने आए विरोधाभासों ने पूरे मामले की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

Previous
Previous

अमेरिकी जज ने गौतम अडानी के सह-आरोपियों के खिलाफ रिश्वतखोरी के आरोप हटाने की याचिका खारिज की

Next
Next

मणिपुर: 2023 की हिंसा के बाद 300 से अधिक लोगों की मौत, 49 लापता