'मैं अब तक 80 फैसले हटा चुका हूं': 'राइट टू बी फॉरगॉटन' आदेश को इंडियन कानून ने क्यों दी चुनौती
‘इंडियन एक्सप्रेस’ के मुताबिक, दिल्ली हाई कोर्ट के 'राइट टू बी फॉरगॉटन' (भूल जाने के अधिकार) से जुड़े एक फैसले के खिलाफ ऑनलाइन कानूनी डेटाबेस इंडियन कानून ने अदालत का दरवाजा खटखटाया है. वेबसाइट का कहना है कि वह देश का इकलौता कानूनी पोर्टल है, जिसे नाम के आधार पर फैसलों की खोज (नेम-बेस्ड सर्च) सीमित करने का निर्देश दिया गया है. वेबसाइट के अनुसार, इस आदेश के बाद उसे अब तक 80 न्यायिक फैसले अपने पोर्टल से हटाने पड़े हैं.
बुधवार को दिल्ली हाई कोर्ट ने इंडियन कानून की अपील पर सुनवाई करते हुए मामले की अगली सुनवाई 13 अगस्त के लिए तय की. यह अपील 29 मई के उस आदेश के खिलाफ दायर की गई है, जिसमें अदालत ने ऐसे लोगों से जुड़े फैसलों को सर्च इंजन से डी-इंडेक्स करने का निर्देश दिया था, जो अपने पुराने मामलों को ऑनलाइन खोज परिणामों से हटाना चाहते थे.
जल्द सुनवाई की मांग
इंडियन कानून की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार और अधिवक्ता अपार गुप्ता ने न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर और न्यायमूर्ति विनोद कुमार की पीठ से जल्द सुनवाई की मांग की. दातार ने अदालत से कहा कि एकल पीठ का फैसला अब दूसरे मामलों में मिसाल के तौर पर पेश किया जा रहा है.
उन्होंने कहा, "मैं ही एकमात्र कानूनी वेबसाइट हूं, जिसे नाम के आधार पर सर्च सुविधा सीमित करने का निर्देश दिया गया है. सभी अन्य कानूनी वेबसाइटों पर यह सुविधा उपलब्ध है. विभिन्न अदालतों के आदेशों के बाद मैं अब तक 80 फैसले हटा चुका हूं. मेरी वेबसाइट पर केवल तीन कर्मचारी हैं और इस आदेश से संचालन मुश्किल हो गया है."
मई का फैसला क्या था?
29 मई को दिल्ली हाई कोर्ट की एकल पीठ ने 36 अलग-अलग याचिकाओं का निपटारा करते हुए निर्देश दिया था कि संबंधित व्यक्तियों से जुड़े फैसलों को सर्च इंजन से डी-इंडेक्स किया जाए. साथ ही इंडियन कानून को नाम के आधार पर फैसले खोजने की सुविधा सीमित करने का आदेश दिया गया था.
हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि संबंधित फैसले पूरी तरह हटाए नहीं जाएंगे. वे केस नंबर, उद्धरण (साइटेशन), अदालत के नाम और फैसले की तारीख के आधार पर वेबसाइट पर उपलब्ध रहेंगे.
'निजता का अधिकार अदालत के रिकॉर्ड पर लागू नहीं होता'
इंडियन कानून ने अपनी अपील में कहा है कि एकल पीठ का आदेश अत्यधिक व्यापक और व्यवहारिक रूप से लागू करना कठिन है. वेबसाइट का तर्क है कि निजता का अधिकार किसी व्यक्ति को ऐतिहासिक या न्यायिक अभिलेखों से पूरी तरह गायब हो जाने का असीमित अधिकार नहीं देता.
अपील में कहा गया है कि सार्वजनिक रिकॉर्ड, विशेषकर अदालत के रिकॉर्ड, सार्वजनिक दस्तावेज होते हैं और उन पर 'राइट टू बी फॉरगॉटन' का दायरा सीमित होना चाहिए.
वेबसाइट ने अदालत द्वारा तय किए गए उस मानदंड पर भी सवाल उठाया है, जिसमें कहा गया था कि यदि कोई जानकारी अब प्रासंगिक नहीं रही या उसका कोई वैध सार्वजनिक उद्देश्य नहीं है, तो उसे नाम आधारित खोज से हटाया जा सकता है.
इंडियन कानून का कहना है कि यदि किसी नाम को हटाना आवश्यक हो, तो इसकी शुरुआत अदालतों की आधिकारिक रजिस्ट्री से होनी चाहिए, क्योंकि मूल रिकॉर्ड वहीं प्रकाशित होते हैं. अदालतें चाहें तो अपने रिकॉर्ड में नामों को छिपाने या संपादित करने का निर्देश दे सकती हैं.
इंडियन कानून की उपयोगिता पर असर
इंडियन कानून ने अपनी अपील में कहा है कि यदि प्रत्येक वादी अपने नाम को हटाने की मांग करने लगे, तो धीरे-धीरे केस के नाम और पहचान से जुड़ी जानकारी समाप्त हो जाएगी. इससे कानूनी शोध और न्यायिक फैसलों तक पहुंच गंभीर रूप से प्रभावित होगी.
वेबसाइट ने यह भी कहा कि निजी कानूनी डेटाबेस इसलिए लोकप्रिय हैं क्योंकि अधिकांश सरकारी अदालतों की वेबसाइटें धीमी, जटिल और सीमित खोज सुविधाओं वाली हैं. अलग-अलग प्रारूप, केस श्रेणियों के भिन्न संक्षेप और प्रभावी सर्च विकल्पों की कमी के कारण शोधकर्ताओं, वकीलों और आम नागरिकों के लिए जानकारी ढूंढना मुश्किल हो जाता है.
इंडियन कानून का कहना है कि यदि नाम आधारित खोज पर व्यापक प्रतिबंध लगाया गया, तो यह न केवल उसके पोर्टल की उपयोगिता कम करेगा, बल्कि न्यायिक रिकॉर्ड तक सार्वजनिक पहुंच और कानूनी शोध को भी प्रभावित करेगा. अब इस महत्वपूर्ण मामले पर दिल्ली हाई कोर्ट 13 अगस्त को विस्तृत सुनवाई करेगा, जहां 'राइट टू बी फॉरगॉटन' और सार्वजनिक न्यायिक रिकॉर्ड के बीच संतुलन का सवाल केंद्र में रहेगा.

