‘यह अपहरण जैसा था’: भारतीय दस्तावेज होने के बावजूद 87 दिन जेल में रहे बंगाली मुस्लिम जलिल अख्तर

‘आर्टिकल 14’ में अंतरा स्वर्णाकर की रिपोर्ट के मुताबिक, पश्चिम बंगाल के उत्तर दिनाजपुर निवासी 66 वर्षीय जलिल अख्तर को बांग्लादेशी होने के संदेह में 87 दिन तक जेल और हिरासत केंद्रों में रखा गया. उनके पास भारतीय नागरिकता और पहचान से जुड़े दस्तावेज थे, तीन मतदाता सूचियों में उनका नाम दर्ज था और वे हालिया मतदाता सूची पुनरीक्षण की जांच भी पूरी कर चुके थे. इस दौरान पुलिस ने उन्हें दो बार बांग्लादेश भेजने की कोशिश की और एक महीने से अधिक समय तक परिवार से संपर्क नहीं करने दिया.

आधी रात को घर से उठाया

उत्तर दिनाजपुर के बगराइल गांव में जलिल अख्तर अपनी पत्नी तौफा बीबी के साथ मिट्टी और टिन से बने छोटे घर में रहते हैं. उनके दोनों बेटे हैदराबाद में दिहाड़ी मजदूरी करते हैं और परिवार को पैसे भेजते हैं. 19 जून 2026 की रात पुलिस उन्हें बांग्लादेशी होने के संदेह में घर से उठा ले गई.

अख्तर के मुताबिक, रात करीब साढ़े बारह या एक बजे छह-सात पुलिसकर्मी उनके घर पहुंचे. उन्होंने दरवाजा खोला तो एक पुलिसकर्मी ने कंधे से पकड़कर उन्हें बाहर ले गया. परिवार या पड़ोसियों को बताने तक का मौका नहीं दिया गया. अख्तर ने इस अनुभव को अपहरण जैसा बताया.

15 सितंबर को जमानत पर रिहा होने के बाद उन्होंने ‘आर्टिकल 14’ को बताया कि उन्हें 87 दिनों तक जेल और हिरासत केंद्रों के बीच रखा गया. न्यायिक मजिस्ट्रेट जामशेद शेख ने जमानत देते हुए कहा कि अख्तर के दस्तावेज—जिनमें 1995, 2002 और 2026 की मतदाता सूचियां, वोटर कार्ड, राशन कार्ड और आधार कार्ड शामिल थे—जाली या फर्जी नहीं पाए गए. अदालत ने यह भी कहा कि केवल राष्ट्रीयता पर संदेह के आधार पर, ठोस आधार के बिना, विचाराधीन व्यक्ति को अनिश्चितकाल तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता.

अख्तर के पास उनके पिता रौशन अली से जुड़े जमीन के दस्तावेज और ग्राम पंचायत का स्थायी निवासी प्रमाणपत्र भी है. उनका कहना है कि परिवार ने एसआईआर की प्रक्रिया पूरी की और विधानसभा चुनाव में मतदान भी किया.

दो बार सीमा पार भेजने की कोशिश

घर से उठाए जाने के बाद अख्तर को पहले बजारगांव पुलिस कैंप और फिर गांव से 18 किलोमीटर दूर चकुलिया हिरासत केंद्र ले जाया गया. वहां वे छह अन्य लोगों के साथ 15 दिन रहे. अख्तर के अनुसार, दस्तावेजों की जांच के दौरान अधिकारियों ने उनका वोटर कार्ड मंगवाया और कंप्यूटर पर रिकॉर्ड देखने के बाद पुष्टि की कि उन्होंने स्थानीय मतदाता के रूप में मतदान किया था. इसके बावजूद एक वरिष्ठ अधिकारी से बातचीत के बाद उनके खिलाफ मामला दर्ज किया गया और उन्हें बांग्लादेशी घोषित कर दिया गया.

अख्तर का आरोप है कि पुलिस ने उन्हें बांग्लादेशी होने की बात स्वीकार करने के लिए डराया और दो बार सीमा पार भेजने की कोशिश की. पहली बार उन्हें रात में आंखों पर पट्टी बांधकर कादरगंज केंद्र से सीमा पर ले जाया गया. वहां छह अन्य लोगों को कथित तौर पर सीमा पार धकेल दिया गया, लेकिन अख्तर ने पुलिसकर्मियों के पैर पकड़कर कहा कि वे भारतीय हैं और बांग्लादेश में उनका कोई परिचित नहीं है. उनके मुताबिक, सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) ने उनकी पहचान भारतीय के रूप में की और पांच दिन बाद पुलिस उन्हें वापस ले आई.

दूसरी बार उन्हें फिर कादरगंज केंद्र ले जाया गया. अख्तर के अनुसार, बीएसएफ कर्मियों ने उन्हें पहचान लिया और पूछा कि छह दिन पहले वापस भेजे जाने के बाद उन्हें फिर क्यों लाया गया. बाद में पुलिस ने 2025 के आव्रजन और विदेशी अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज की. उसमें दावा किया गया कि अख्तर 24 वर्ष पहले बांग्लादेश से भारत आए थे. अख्तर ने इस विवरण को झूठा बताया.

परिवार से संपर्क और कानूनी प्रक्रिया

अख्तर के मुताबिक, करीब एक महीने तक उन्हें परिवार से संपर्क नहीं करने दिया गया. बाद में इस्लामपुर की अदालत ले जाते समय उन्होंने अपने भाई से बात की. उन्हें बताया गया कि एक सप्ताह जेल में रहना होगा, लेकिन यह अवधि लगभग दो महीने तक खिंच गई. उनके वकील ने आरोप लगाया कि पुलिस ने पहचान दस्तावेजों पर अलग-अलग रिपोर्ट देकर सुनवाई में देरी की.

केंद्र सरकार के 2025 के दिशानिर्देशों के तहत, कथित विदेशी नागरिक को अंग्रेजी और संबंधित क्षेत्रीय भाषा में कारण बताओ नोटिस दिया जाना चाहिए. व्यक्ति को सबूत पेश करने के लिए दस दिन मिलते हैं और वह खुद या वकील के जरिए अपना पक्ष रख सकता है. पश्चिम बंगाल में विदेशी न्यायाधिकरण स्थापित नहीं हैं. 31 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ऐसे न्यायाधिकरणों की अनुपस्थिति में कथित अवैध प्रवासी जमानत के लिए न्यायिक मजिस्ट्रेट से संपर्क कर सकते हैं.

व्यापक हिरासत अभियान का संदर्भ

अख्तर का मामला पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों में बंगाली मुस्लिमों की हिरासत से जुड़ी अन्य घटनाओं के बीच सामने आया है. रिपोर्ट में मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर और मालदा से कम से कम 15 लोगों को बांग्लादेशी होने के संदेह में उठाए जाने का उल्लेख है. कुछ लोगों ने एसआईआर की प्रक्रिया पूरी की थी और विधानसभा चुनाव में मतदान भी किया था. अन्य राज्यों में भी बंगाली भाषी मुस्लिम मजदूरों को हिरासत में लिए जाने और बांग्लादेश भेजे जाने की खबरें आई हैं.

अख्तर की पत्नी और पड़ोसी मोतिउर रहमान ने बताया कि गिरफ्तारी के बाद परिवार उन्हें खोजता रहा. उनके बेटों के पास हैदराबाद से आने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे. अख्तर का आरोप है कि जेल में उनसे मिलने के लिए परिवार को रिश्वत मांगे जाने जैसी स्थिति का सामना करना पड़ा. रिहाई के बाद उन्होंने कहा कि इस घटना ने उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से तोड़ दिया है और वे अपने साथ हुई कार्रवाई के लिए न्याय चाहते हैं.

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