बढ़ता पानी घरों और मंदिरों को डुबो रहा है, ग्रामीणों ने 87 अरब डॉलर की नदी-जोड़ो परियोजना का विरोध किया

‘रॉयटर्स’ में अमित दवे और सौरभ शर्मा की अजयगढ़ (पन्ना, मध्यप्रदेश) से रिपोर्ट है कि केन नदी में घुटने तक पानी में खड़े होकर और अपने चेहरे पर कीचड़ पोतकर—जो उस ज़मीन से अपने जुड़ाव का प्रतीक है जिस पर उनके परिवार ने एक सदी से अधिक समय तक खेती की है—बिट्टी बाई कोंडर उन सैकड़ों आदिवासी निवासियों में शामिल हैं जो भारत की नदियों को जोड़ने की 87 अरब डॉलर की सरकारी परियोजना पर अपना गुस्सा जाहिर कर रहे हैं.

चार वयस्क बेटों की माँ बिट्टी बाई, जो अपने बेटों के साथ मिलकर विरोध प्रदर्शन कर रही हैं, अपनी आँखों से देख चुकी हैं कि इस परियोजना के काम के कारण बढ़ते पानी ने उनके पूरे गांव को डुबो दिया है. लेकिन प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे बेहतर मुआवजे के बिना अपनी पुश्तैनी ज़मीन छोड़ने से बेहतर मरना पसंद करेंगे.

प्रदर्शन में शामिल महिलाओं में से एक कोंडर ने कहा, "सरकार हमें रहने के लिए दूसरी जगह दिए बिना हमारी ज़मीन और पानी छीन रही है." प्रतीकात्मक रूप से अपनी अर्थी (मुर्दे की चिता) पर लेटकर अपना विरोध जताने वाली महिलाओं में वे भी शामिल हैं.

उन्होंने कहा, "वे अपना बांध बनाने के लिए हमारी मिट्टी खोद रहे हैं, लेकिन वे हमें अपनी ज़िंदगी फिर से बसाने के लिए पर्याप्त मुआवजा नहीं दे रहे हैं."

यह विवाद भारत की उस महत्वाकांक्षी योजना के लिए एक शुरुआती परीक्षा है, जिसके तहत देश भर की करीब 30 नदियों को जोड़ा जाना है.  इस योजना का उद्देश्य सूखे की मार झेल रहे क्षेत्रों में पानी का पुनर्वितरण करना है, जिससे एक ऐसे देश में जहाँ कृषि अभी भी रोजगार का एक प्रमुख साधन है, करोड़ों किसानों की मदद करके खाद्य सुरक्षा को बढ़ावा दिया जा सके. हालांकि, आलोचकों का कहना है कि इस कार्यक्रम से समुदायों के उजड़ने और नाज़ुक पारिस्थितिक तंत्र (इकोसिस्टम) को नुकसान पहुँचने का जोखिम है.

मध्य प्रदेश की केन नदी को उत्तर प्रदेश की बेतवा नदी से जोड़ना इस परियोजना का पहला चरण है, जिसकी लागत लगभग 4.6 अरब डॉलर है.

सरकार ने पन्ना जिले में केन नदी के किनारे रहने वाले निवासियों को प्रति हेक्टेयर कम से कम 12.5 लाख भारतीय रुपये (13,000 अमेरिकी डॉलर) की पेशकश की है, जो शुरुआती 500,000 रुपये की पेशकश से दोगुने से भी अधिक है.

जिला प्रशासक उषा परमार ने कहा कि 90% से अधिक लोगों को मुआवजा पहले ही दिया जा चुका है. हालांकि, कुछ निवासियों का तर्क है कि यह भुगतान उनके सभी नुकसानों की भरपाई नहीं करता है.

क्षेत्र के एक स्थानीय पुजारी धनीराम भटनागर ने कहा कि जिस मंदिर में वे काम करते थे, वह पूरी तरह से जलमग्न हो चुका है. उन्होंने कहा, "वह मंदिर ही मेरी आय का एकमात्र स्रोत था और अब वह जा चुका है." "सरकार द्वारा जो मुआवजा दिया जा रहा है, वह केवल मेरे घर के लिए है और वह नाकाफी है."

पर्यावरण संबंधी चिंताएं

पर्यावरणविद् लंबे समय से इस परियोजना का विरोध करते रहे हैं.  उनका कहना है कि केन नदी पर प्रस्तावित 2 किलोमीटर लंबा दौधन बांध लगभग 9,000 हेक्टेयर (22,200 एकड़) भूमि को जलमग्न कर देगा, जिसमें भारत के सबसे सफल बाघ संरक्षण कार्यक्रमों में से एक, पन्ना टाइगर रिजर्व का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी शामिल है.

सरकार का कहना है कि पर्यावरणीय प्रभाव "अपरिहार्य" है, लेकिन पेड़ लगाकर, वन्यजीव संरक्षण और अन्य उपायों के जरिए इसकी भरपाई की जा सकती है.

कुछ आलोचक इस बहु-अरब डॉलर की योजना के वैज्ञानिक आधार पर भी सवाल उठाते हैं. 'साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपुल' के समन्वयक हिमांशु ठक्कर ने कहा, "इस परियोजना की व्यावहारिकता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है क्योंकि यह एक जलवैज्ञानिक अनुमान पर टिकी हुई है: केन बेसिन में पानी की अधिकता और बेतवा बेसिन में इसकी कमी."

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