वन्या वैदेही भार्गव | कांग्रेस को क्यों सीजेपी को बदनाम नहीं करना चाहिए

देश में कुछ अभूतपूर्व घट रहा है. भारत के विपक्षी दल और हज़ारों आम नागरिक आखिरकार मोदी सरकार के खिलाफ एकजुट हो गए हैं. वे मतदाता दमन के खिलाफ और भारत के भविष्य के लिए एक ही आवाज़ में बात कर रहे हैं. पुलिस की ज़बरदस्त जवाबी गोलबंदी यह संकेत देती है कि कभी अजेय मानी जाने वाली सरकार अब खुद को खतरे में महसूस कर रही है. फिर भी, विपक्षी दल इस अवसर को गंवा सकते हैं. इसके संकेत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर मिल रहे हैं, जहां कुछ कांग्रेस समर्थक कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) पर हमले कर रहे हैं.

वन्या वैदेही भार्गव के अनुसार, यह षड्यंत्रकारी सिद्धांत गढ़ा जा रहा है कि सीजेपी का गठन भारतीय जनता पार्टी-राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उनकी तथाकथित 'बी-टीम' आम आदमी पार्टी द्वारा राहुल गांधी से युवाओं का समर्थन दूर ले जाने के लिए किया गया है. यह इस तथ्य को पूरी तरह नजरअंदाज करता है कि सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने अमित शाह पर दिल्ली पुलिस को 'अपराधियों का झुंड' में बदलने का आरोप लगाया है, और प्रधानमंत्री मोदी को एक "मनोरोगी तानाशाह" कहा है, जिनकी नेहरू से महान बनने की कोई औकात नहीं है और जो वोटों की चोरी के कारण प्रधानमंत्री बने. 10 अक्टूबर को सीजेपी के विरोध प्रदर्शन पर अभूतपूर्व पुलिस दमन भी इस सिद्धांत का खंडन करता है.

हालांकि, सीजेपी को बदनाम करने का कांग्रेस के कुछ समर्थकों का यह प्रयास महत्वपूर्ण है; यह उनकी असुरक्षा को उजागर करता है कि सीजेपी के नेता, जिनमें से कुछ पूर्व में 'आप' से जुड़े रहे हैं, दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस के समर्थन आधार को कमजोर करने के 'आप' के इतिहास को दोहराएंगे. वे मिस्टर गांधी के लिए युवाओं के समर्थन को सुरक्षित रखने के लिए सीजेपी को बदनाम करना चाहते हैं. इसके बजाय, यह इस समर्थन को और कम कर देगा.

युवा भारत की शिक्षा व्यवस्था, अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचे से त्रस्त हो चुके थे. लोगों की वास्तविकताओं को झुठलाने वाले लगातार दुष्प्रचार, डर के दम घोंटू माहौल और लोकतांत्रिक असंतोष के सभी रास्तों के बंद होने से यह स्थिति और बदतर हो गई थी. जंतर-मंतर पर एकत्र होने का सीजेपी का आह्वान मरती हुई लोकतंत्र को एक नई जिंदगी की तरह लगा. युवाओं ने वर्षों के उस दमनकारी सन्नाटे के बाद, जिससे कई लोग समझौता कर चुके थे, एक लोकतांत्रिक स्थान के खुलने पर राहत महसूस की. बोलने, असहमत होने और आलोचना करने की बढ़ी हुई स्वतंत्रता स्पष्ट रूप से महसूस हो रही थी और वह संक्रामक भी थी. सीजेपी ने असंतुष्टों के एक विविध गठबंधन को एकजुट होने और एक झंडे के नीचे व्यक्तिगत व रचनात्मक तरीकों से अपना असंतोष व्यक्त करने के लिए एक साझा मंच प्रदान किया.

एक साथ खड़े होने की जरूरत

इसका मतलब यह नहीं है कि पेपर लीक, संस्थागत कब्जे और मतदाता दमन पर राहुल गांधी के काम को नकारा जा रहा है. फिर भी, यदि कांग्रेस यह मानती है कि उसने 2022 की भारत जोड़ो यात्रा के बाद से—आम नागरिकों के एक वर्ग को लगातार अपने बैनर तले सड़कों पर उतरने के लिए प्रेरित किया है और भारत के विभिन्न असंतोषियों को एक जन गठबंधन में संगठित किया है—तो वह खुद को धोखा दे रही है.

सीजेपी ने ऐसा करके भाजपा के अजेय होने के आवरण को भेद दिया है, जिससे विपक्ष के लिए अवसरों से भरपूर एक मोड़ पैदा हुआ है. यदि सीजेपी राहुल गांधी को कमजोर करने की कोई साजिश है, तो वर्तमान में यह इसका उल्टा हासिल कर रही है. उनकी शालीनता, निडरता और वैचारिक प्रतिबद्धता का प्रभाव पड़ा है, इस बात का प्रमाण यह है कि कई जेन जी युवाओं ने सीजेपी के जुलाई के विरोध प्रदर्शन के दौरान मिस्टर गांधी के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया. उनकी 'छात्रों की गूंज' रैलियों को सीजेपी द्वारा युवाओं को गोलबंद करने से बढ़ावा मिला है.

लेकिन सीजेपी पर कांग्रेस के कुछ समर्थकों के अंधाधुंध हमले इस अवसर को बर्बाद करने की धमकी देते हैं. सीजेपी लोकप्रिय है क्योंकि इसे लोगों के हितों को प्राथमिकता देने वाले संगठन के रूप में देखा जाता है. आपसी आलोचना लोकतांत्रिक है, लेकिन बदनाम करने वाले अभियान कांग्रेसियों की छोटी सोच वाली असुरक्षा को दर्शाने वाले और असंतुष्टों की उस एजेंसी तथा बुद्धिमत्ता की उपेक्षा करने वाले माने जाएंगे जो यह तय करते हैं कि कौन उन्हें प्रामाणिक रूप से प्रेरित और प्रतिनिधित्व करता है. यह उस सद्भावना को खतरे में डालता है जो मिस्टर गांधी ने लोगों के मुद्दों को प्राथमिकता देकर और सीजेपी द्वारा गोलबंद नागरिकों को मंच प्रदान करके अर्जित की है.

हालांकि उन्होंने सीजेपी को बदनाम नहीं किया है, लेकिन इस तरह की धारणाएं मिस्टर गांधी से जुड़ सकती हैं. प्रदर्शनकारियों की स्वतंत्र सोच यह स्पष्ट करती है कि वे किसी भी ऐसे व्यक्ति को खारिज कर देंगे जिस पर भारत के असंतुष्ट लोगों की प्रामाणिक चिंता की तुलना में व्यक्ति पूजा या दलीय राजनीति को प्राथमिकता देने का संदेह होगा.  अपने और अपनी पार्टी के हित में, राहुल गांधी को अपने सोशल मीडिया समर्थकों पर लगाम लगानी चाहिए.

राहुल गांधी को युवाओं का समर्थन छिनने की चुनौती को स्वीकार करना चाहिए. भारत के असंतोषी नागरिकों के समर्थन का हकदार कोई भी दल नहीं है. इसे अर्जित करना पड़ता है. यदि कांग्रेस युवाओं का प्रतिनिधित्व करने का दावा करती है, तो उसे उन्हें यह विश्वास दिलाना होगा कि वह सबसे बेहतर तरीके से ऐसा करती है. सीजेपी इसलिए गूंज पैदा करती है क्योंकि यह एक खुला, सुलभ स्थान प्रदान करती है जो आम नागरिकों की आवाज़ को छोटा करने के बजाय उसे बढ़ाता है.

मिस्टर गांधी इसी प्रकार असंतुष्ट नागरिकों और गैर-दलीय विपक्षी समूहों को अपने असंतोष को रचनात्मक रूप से व्यक्त करने के लिए कांग्रेस को एक छतरी मंच के रूप में मानने के वास्ते प्रेरित करके सद्भावना जीतेंगे. वह अन्य विपक्षी दलों के साथ आत्मविश्वास से जगह साझा करके भी ऐसा करेंगे, जिससे यह संकेत मिलेगा कि वह खुद और पार्टी से ऊपर भारत को प्राथमिकता देते हैं.

(वन्या वैदेही भार्गव नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया, बेंगलुरु में इतिहासकार हैं, और 'बीइंग हिंदू, बीइंग इंडियन: लाला लाजपत रायज आइडियाज ऑफ नेशनहुड' की लेखिका हैं.)

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