तेल कंपनियों ने 9 माह में ₹1.37 लाख करोड़ का मुनाफा कमाया, लेकिन लोगों को धेला लाभ नहीं मिला 

ईरान-अमेरिका युद्ध के बीच, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गुरुवार को ब्रेंट क्रूड $126 प्रति बैरल तक पहुंच गया, जो 4 साल का उच्चतम स्तर है. हालांकि, बाद में कीमतें गिरकर $116 पर आ गईं. लिहाजा एजेंसियों के हवाले से यह खबर दी जा रही है कि ईरान युद्ध के कारण महंगे कच्चे तेल से देश की तेल कंपनियों को रोजाना ₹2,400 करोड़ का नुकसान हो रहा है. पेट्रोल पर ₹14 प्रति लीटर और डीजल पर ₹18 प्रति लीटर का घाटा उठाना पड़ रहा है. जिससे तेल कंपनियां पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें बढ़ाने का दबाव बना रही हैं. जबकि वास्तविकता यह है कि वित्तीय वर्ष 2025-26 में कच्चे तेल की औसत कीमत महज $71 प्रति बैरल थी, जो कोविड वर्ष 2020-21 के बाद सबसे कम है.

‘भास्कर इंग्लिश’ की रिपोर्ट के मुताबिक, युद्ध 28 फरवरी, 2026 को शुरू हुआ 

और 27 फरवरी तक कीमत $76 प्रति बैरल थी. ऐसे में कच्चे तेल की कीमतें केवल पिछले 2 महीनों में बढ़ी हैं. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2025-26 के पहले 9 महीनों में देश की चार प्रमुख तेल कंपनियों ने कुल ₹1.37 लाख करोड़ का मुनाफा कमाया, यानी हर दिन ₹116 करोड़. मगर, ताज्जुब है कि इसका लाभ आम उपभोक्ताओं को नहीं मिला. पेट्रोल, डीज़ल के दाम कम नहीं हुए. इसके पहले भी जब कच्चे तेल के दाम घटे, तो लोगों को बढ़ी हुई कीमतों पर ही ईंधन लेना पड़ा.  

ईरान-अमेरिका युद्धविराम के बाद कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आई है. भारतीय बास्केट में कच्चे तेल की कीमत, जो $150 तक पहुंच गई थी, अब गिरकर लगभग $100 प्रति बैरल पर आ गई है. सरकार ने 27 मार्च को पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में ₹10-₹10 की कटौती की थी. अनुमान है कि इससे हर महीने लगभग ₹12,000 करोड़ के राजस्व का नुकसान होगा.

सरकार ने डीजल निर्यात पर 'विंडफॉल टैक्स' (अतिरिक्त लाभ कर) लगाने का सहारा लिया है. 11 अप्रैल को सरकार ने डीजल निर्यात पर इस टैक्स को ₹21.50 प्रति लीटर से सीधे बढ़ाकर ₹55.5 प्रति लीटर कर दिया.

भारत से हर महीने औसतन 191 करोड़ लीटर डीजल निर्यात किया जाता है. विंडफॉल टैक्स बढ़ाने के बाद, सरकार केवल डीजल निर्यात से लगभग ₹10,500 करोड़ का मासिक राजस्व कमा रही है, जो काफी हद तक उत्पाद शुल्क से होने वाले नुकसान की भरपाई कर देता है.

कंपनियां घाटे को कम करने के लिए 'राशनिंग' (कोटा निर्धारण) का सहारा ले रही हैं. पंप ऑपरेटरों को निर्देश दिए गए हैं कि वे पिछले साल की बिक्री के बराबर ही स्टॉक बेचें. किसी भी ग्राहक को एक बार में 200 लीटर से ज्यादा डीजल न देने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि उद्योगों को होने वाली थोक आपूर्ति रोकी जा सके.

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