बीते सालों के दौरान AN-32 विमान हादसे: वायुसेना के परिवहन विमान से जुड़ी 12 बड़ी दुर्घटनाएं
असम के जोरहाट एयरबेस पर भारतीय वायुसेना के AN-32 परिवहन विमान दुर्घटना ने सोवियत काल के इस पुराने और भरोसेमंद विमान के सुरक्षा रिकॉर्ड पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
‘टेलीग्राफ वेब डेस्क’ के अनुसार, AN-32 विमान ने 1976 में अपनी पहली उड़ान भरी थी और तब से यह भारतीय वायुसेना के सामरिक परिवहन बेड़े (टैक्टिकल ट्रांसपोर्ट फ्लीट) की रीढ़ बना हुआ है. दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों और चुनौतीपूर्ण मौसम में इसके बेहतरीन प्रदर्शन के कारण इसे वायुसेना का "वर्कहॉर्स" भी कहा जाता है. हालांकि, अपने पांच दशकों के सेवा इतिहास में यह विमान कई घातक हादसों का शिकार हुआ है, जिसमें अब तक दर्जनों जांबाज सैनिकों और चालक दल के सदस्यों ने अपनी जान गंवाई है.
हाल के वर्षों में हुए हादसों ने इस बेड़े के आधुनिकीकरण की आवश्यकता को और तेज कर दिया है:
जून 2026 (जोरहाट, असम): एक नियमित उड़ान के दौरान रोवरिया इलाके में लैंडिंग करते समय विमान क्रैश हो गया. इस हादसे में पांच कर्मियों की मौत हो गई, जिसके बाद वायुसेना ने 'कोर्ट ऑफ इंक्वायरी' के आदेश दिए हैं.
मार्च 2025 (बागडोगरा, पश्चिम बंगाल): लैंडिंग के प्रयास के दौरान 'K2752' विमान हवाई अड्डे से 10 किमी पहले नष्ट हो गया. हालांकि, चमत्कारिक रूप से चालक दल सहित सभी सवार सुरक्षित बच गए.
जून 2019 (अरुणाचल प्रदेश): जोरहाट से मेचुका जा रहा विमान उड़ान भरने के 33 मिनट बाद लापता हो गया. बाद में पहाड़ी इलाके में इसका मलबा मिला और विमान में सवार सभी 13 लोग शहीद हो गए.
जुलाई 2016 (बंगाल की खाड़ी): चेन्नई से पोर्ट ब्लेयर जा रहा विमान 29 सैन्य कर्मियों के साथ समुद्र के ऊपर लापता हो गया. बड़े पैमाने पर चले खोज अभियान के बावजूद कोई जीवित नहीं मिला और सालों बाद समुद्र की तलहटी में इसका मलबा खोजा जा सका.
विगत दशकों (1986-2014) के बड़े विमान हादसे
इतिहास गवाह है कि तकनीकी खराबी, खराब दृश्यता और मानवीय त्रुटियों के कारण अतीत में भी कई भयानक हादसे हुए हैं:
चंडीगढ़ लैंडिंग (2014): भटिंडा से आ रहा विमान लैंडिंग के समय असंतुलित होकर पलट गया और उसमें आग लग गई. विमान पूरी तरह नष्ट हो गया, लेकिन सभी 9 लोग मामूली चोटों के साथ बच गए.
मेचुका क्रैश (2009): अरुणाचल प्रदेश के एडवांस्ड लैंडिंग ग्राउंड से उड़ान भरते ही विमान क्रैश हुआ, जिसमें 13 कर्मियों की मौत हुई.
बेंगलुरु हादसा (2000): हवाई अड्डे से 13 किमी पहले विजयनगर के घनी आबादी वाले इलाके में विमान गिरा, लेकिन अच्छी बात यह रही कि इसमें कोई हताहत नहीं हुआ.
दिल्ली कोहरा दुर्घटना (1999): पालम हवाई अड्डे के पास घने कोहरे के कारण विमान विजिबिलिटी खो बैठा और पानी की टंकी से टकराकर पप्पनकलां इलाके में क्रैश हो गया. इस हादसे में विमान के 18 लोगों और जमीन पर मौजूद 3 नागरिकों सहित कुल 21 लोगों की मौत हुई.
हवा में टक्कर (1992): पंजाब के बूथगढ़ में रात के अभ्यास के दौरान दो AN-32 विमान आपस में टकरा गए, जिससे दोनों विमानों के कुल 8 चालक दल के सदस्य मारे गए.
केरल और उत्तर प्रदेश के हादसे (1988-1990): 1990 में केरल के माउंट पोंमुडी के पास पेड़ों से टकराकर विमान क्रैश हुआ (5 मौतें) और 1988 में उत्तर प्रदेश के शिवराजपुर की घाटी में विमान गिरा (10 मौतें).
किश्तवाड़ दुर्घटना (1986): यह इस विमान के शुरुआती बड़े हादसों में से एक था, जब जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ में पहाड़ की ढलान से टकराने के कारण 17 कर्मियों की मौत हो गई थी.
AN-32 विमान के हादसों का यह इतिहास दर्शाता है कि जहाँ एक तरफ इस विमान ने देश के सुदूर और पहाड़ी क्षेत्रों में रसद और सैनिकों को पहुँचाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, वहीं दूसरी तरफ खराब मौसम (जैसे कोहरा) और कठिन पहाड़ी रास्ते इसके लिए हमेशा से बड़ी चुनौती रहे हैं. इन लगातार हादसों ने समय-समय पर वायुसेना को चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में अपने परिचालन नियमों की समीक्षा करने और पुराने पड़ रहे विमानों के बेड़े को आधुनिक तकनीक से बदलने के लिए प्रेरित किया है.

