‘अत्यधिक क्रूरता’: मध्यप्रदेश में गो-तस्करी के आरोप में व्यक्ति की लिंचिंग के मामले में 7 को उम्रकैद
मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम जिले की एक सत्र अदालत (सेशंस कोर्ट) ने साल 2022 में गो-तस्करी के संदेह में हुई नज़ीर अहमद की पीट-पीटकर हत्या (मॉब लिंचिंग) के मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश तबस्सुम खान ने इस घटना को "अत्यधिक क्रूरता" का मामला मानते हुए सात आरोपियों को आजीवन कारावास (उम्रकैद) की सजा सुनाई है. अदालत के अनुसार, अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह सफल रहा कि आरोपियों ने घातक हथियारों से लैस होकर इस जघन्य अपराध को अंजाम दिया था.
आनंद मोहन जे की रिपोर्ट के अनुसार, यह घटना 3 अगस्त, 2022 की रात करीब 12:30 बजे सिवनी मालवा के बरखड़ गांव के पास हुई थी. नज़ीर अहमद अपने दो साथियों, शेख लाला और सैयद मुश्ताक के साथ एक ट्रक में यात्रा कर रहा था. इसी दौरान एक हिंसक भीड़ ने गो-तस्करी के संदेह में लाठियों और डंडों से उन पर हमला कर दिया. इस बर्बर हमले में अहमद बेहोश हो गया और अस्पताल लाने पर उसे मृत घोषित कर दिया गया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, अहमद के सिर पर गहरे घाव थे, खोपड़ी फ्रैक्चर हो चुकी थी और पूरे शरीर पर गंभीर चोटों के निशान थे. उसके दोनों साथी भी इस हमले में घायल हुए थे.
इस मामले के ट्रायल (मुकदमे) के दौरान अभियोजन पक्ष को तब बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा, जब कई महत्वपूर्ण गवाह अपने बयानों से मुकर गए. हमले में बाल-बाल बचे शेख लाला और सैयद मुश्ताक ने अदालत में आरोपियों की पहचान करने से इनकार कर दिया. इसके अलावा, एक अन्य मुख्य गवाह, जिसने घटना के तुरंत बाद मजिस्ट्रेट के सामने (सीआरपीसी की धारा 164 के तहत) आरोपियों के नाम उजागर किए थे, वह भी अदालत में प्रत्यक्षदर्शी होने के दावे से पीछे हट गया.
गवाहों के मुकर जाने के बावजूद, अदालत ने अन्य ठोस और संपुष्टिकारक परिस्थितियों के आधार पर आरोपियों को दोषी ठहराया. अदालत ने नोट किया कि मुकरने वाले गवाह का बयान घटना वाले दिन ही मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज कर लिया गया था. कार्यकारी मजिस्ट्रेट (तहसीलदार) ललित सोनी द्वारा कराई गई पहचान कार्यवाही को अदालत ने वैध माना. जिरह के दौरान भी मजिस्ट्रेट की गवाही अडिग रही. अदालत ने माना कि गवाहों को बाद में डरा-धमकाकर या किसी अन्य तरीके से "प्रभावित" किया गया था.
सबूतों की बरामदगी: पुलिस जांच के दौरान आरोपियों के बयानों के आधार पर हमले में इस्तेमाल की गई बांस की लाठियां और घटना के समय पहने गए कपड़े बरामद किए गए थे. बचाव पक्ष ने दलील दी थी कि ट्रक में मवेशी ले जाने वालों पर कार्रवाई नहीं हुई, इसलिए जांच संदेहास्पद है. अदालत ने इसे खारिज करते हुए कहा कि अन्य लोगों पर कार्रवाई न होने से हत्या के वास्तविक सबूतों की अहमियत कम नहीं हो जाती.
अदालत ने 'मॉब लिंचिंग' को एक अत्यंत गंभीर और समाज विरोधी कारक माना. हालांकि, आरोपियों का कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड न होने और जेल में उनके सामान्य व्यवहार को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट के "दुर्लभ से दुर्लभतम" सिद्धांत के तहत उन्हें मृत्युदंड (फांसी) नहीं दिया गया और सुधरने का मौका देते हुए उम्रकैद की सजा तय की गई.
साथ ही, अदालत ने पीड़ित मुआवजा योजना के तहत नज़ीर अहमद की पत्नी, बच्चों और माता-पिता को उचित वित्तीय सहायता देने की सिफारिश की है, तथा जुर्माने की राशि में से हमले में बचे दोनों घायलों को 15-15 हजार रुपये देने का आदेश जारी किया है.

