डॉ. सुरेश खैरनार | तब घोषित आपातकाल, अब अघोषित आपातकाल  

घोषित आपातकाल को 51 वर्ष पूरे होने पर मैंने कल घोषित आपातकाल और पिछले 12 वर्षों से जारी कथित अघोषित आपातकाल पर एक लेख लिखा था. मुझे लगा था कि वही पर्याप्त होगा. लेकिन जब मैंने देखा कि जिन साथियों के परिवार के सदस्य जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के दौरान गिरफ्तार हुए थे और जिन परिवारों की नई पीढ़ी आपातकाल का विरोध करने वालों की विरासत से जुड़ी रही है, उनमें से कुछ आज पिछले 12 वर्षों से आरएसएस और भाजपा की नीतियों का समर्थन कर रहे हैं, तो मुझे इस विषय पर एक बार फिर तथ्यात्मक रूप से अपनी बात रखना जरूरी लगा.

जिस तरह 15 अगस्त 1975 को पड़ोसी बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख मुजीबुर रहमान और उनके परिवार की उनके सरकारी आवास में हत्या कर दी गई थी, उसी तरह उस समय यह आरोप लगाया गया कि जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से जुड़े कुछ लोग इंदिरा गांधी की हत्या की साजिश रच रहे हैं. इंदिरा गांधी को जब इस कथित साजिश की जानकारी मिली तो उन्होंने देश में आपातकाल लागू कर दिया.

मैं स्वयं मुंबई में हुई बड़ौदा डायनामाइट मामले से जुड़ी उस बैठक में मौजूद था. वहां इंदिरा गांधी की हत्या जैसी कोई बात एजेंडे में नहीं थी. बैठक में चर्चा 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की तर्ज पर सरकारी तंत्र को चुनौती देने की थी. समाजवादी नेताओं ने रेलवे लाइन काटने, टेलीफोन और टेलीग्राफ व्यवस्था बाधित करने तथा सेंसरशिप के बीच वैकल्पिक रेडियो नेटवर्क चलाने जैसे उपायों का जिक्र किया था. उद्देश्य किसी व्यक्ति की हत्या नहीं, बल्कि सरकारी ढांचे को चुनौती देना और वैकल्पिक सूचना तंत्र खड़ा करना था.

मैं स्वयं भी 25 जून 1975 से 5 अक्टूबर 1976 तक लगभग पंद्रह महीने भूमिगत रहकर आपातकाल का विरोध करता रहा. यही कारण है कि मुझे लगा कि इस पूरे प्रसंग पर फिर से तथ्य रखने चाहिए. आज जिन युवाओं की बात हो रही है, उनमें से अधिकांश उस दौर में पैदा भी नहीं हुए थे. इसके बावजूद उन्हें अपने ही परिवारों के इतिहास से अलग खड़ा देखकर आश्चर्य होता है. विशेष रूप से गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में मेरा सीधा अनुभव रहा है.

उस समय देश भीषण सूखे, खाद्यान्न संकट, महंगाई और बेरोजगारी से गुजर रहा था. 1972 के अकाल के दौरान कई जगहों पर सरकारी और निजी गोदामों की लूट हुई. अमेरिका से पीएल-480 योजना के तहत अनाज आया, जबकि देश में कालाबाजारी और मिलावट ने आम लोगों का जीवन और कठिन बना दिया. आदिवासी क्षेत्रों में लोग पेड़ों की पत्तियां खाने को मजबूर थे और महाराष्ट्र के विदर्भ में जहरीली घास खाने से मौतें तक हुईं. महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ छात्रों और युवाओं का गुस्सा बढ़ता गया. कॉलेजों में फीस भरना मुश्किल हो गया था. छात्र प्रतिनिधि के रूप में मैं स्वयं महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री वसंतराव नाईक से मिला और फीस माफ करने की मांग की, जिसे बाद में स्वीकार किया गया. यही कारण था कि गुजरात और बिहार के आंदोलन मूल रूप से छात्र आंदोलनों के रूप में उभरे.

दूसरा आरोप हमेशा यह लगाया जाता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जनसंघ ने पहले से योजना बनाकर गुजरात और बिहार आंदोलन का समर्थन किया. लेकिन मैं स्वयं उस आंदोलन में शामिल था और प्रत्यक्षदर्शी हूं. मेरी समझ में गुजरात आंदोलन पूरी तरह छात्रों का आंदोलन था और 1973-74 के दौरान उसमें जयप्रकाश नारायण की कोई भूमिका नहीं थी. बाद में महाराष्ट्र जनसंघर्ष समिति की एक बैठक में उनसे आंदोलन का नेतृत्व संभालने का आग्रह किया गया. उन्होंने स्पष्ट कहा कि गुजरात में पहले से सक्षम नेतृत्व मौजूद है और वे केवल बिहार तक अपनी भूमिका सीमित रखेंगे, क्योंकि उनका नैतिक दायित्व अपने राज्य के प्रति अधिक है.

हां, 25 जून 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान में उन्होंने "सिंहासन खाली करो, जनता आती है" का नारा दिया और सरकारी कर्मचारियों, पुलिस तथा प्रशासन से केवल संविधान के अनुरूप आदेशों का पालन करने की अपील की. मेरा मानना है कि इसी भाषण ने इंदिरा गांधी और उनके सहयोगियों को असहज कर दिया. उसी रात देश में आपातकाल लागू कर दिया गया.

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद इंदिरा गांधी लोकसभा सदस्यता खो चुकी थीं और चुनाव लड़ने से भी अयोग्य घोषित की गई थीं. मेरे अनुसार वह कुछ समय के लिए इस्तीफा देने पर विचार कर रही थीं, लेकिन संजय गांधी और उनके करीबी सहयोगियों ने उन्हें ऐसा न करने की सलाह दी. इसके बाद आपातकाल लागू हुआ और प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई. मेरी नजर में यह फैसला राष्ट्रीय सुरक्षा की जरूरत से ज्यादा राजनीतिक सत्ता बचाने के लिए था.

संविधान सभा में भी अनुच्छेद 352 को लेकर गंभीर आपत्तियां दर्ज की गई थीं. एच.वी. कामथ ने इसे लोकतंत्र के लिए खतरनाक बताया था. प्रोफेसर के.टी. शाह ने कहा था कि सबसे कठिन परिस्थितियों में भी नागरिक स्वतंत्रताओं का हनन नहीं होना चाहिए. महावीर त्यागी ने भी आपातकाल के दौरान न्यायिक अधिकारों को खत्म करने का विरोध किया था. उनके अनुसार लोकतंत्र की असली कसौटी संकट के समय ही होती है.

आज भी सत्ता में बैठे लोग दावा करते हैं कि वे संविधान के अनुसार शासन चला रहे हैं. लेकिन मेरा मानना है कि पिछले 12 वर्षों में कई ऐसे फैसले हुए हैं जिन्होंने लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े किए हैं. चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव, कुछ कानूनी प्रावधान और मीडिया की चुप्पी मुझे एक ऐसे दौर की याद दिलाते हैं, जिसे मैं अघोषित आपातकाल मानता हूं. मेरा मानना है कि यदि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव ही कमजोर पड़ जाएं तो लोकतंत्र की आत्मा भी कमजोर हो जाती है.

मैं 51 वर्ष पहले लगाए गए आपातकाल का भी विरोधी था और आज जिस स्थिति को अघोषित आपातकाल मानता हूं, उसका भी विरोधी हूं. मेरे लिए सवाल किसी एक दल या नेता का नहीं, बल्कि लोकतंत्र, संविधान और नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा का है.

डॉ. सुरेश खैरनार वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता  हैं. मूल लेख अंग्रेजी में Countercurrents.org पर पढ़ा जा सकता है.

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