अयोध्या में राम मंदिर ट्रस्ट के विवादों के केंद्र में आरएसएस का शख्स
‘स्क्रोल’ के मुताबिक, अयोध्या के राम मंदिर से करीब चार किलोमीटर दूर फैजाबाद के अमानीगंज इलाके में एक सफेद तीन मंजिला मकान पिछले छह वर्षों से चर्चा का विषय बना हुआ है. इस मकान के सामने बना अधूरा लिफ्ट शाफ्ट आज भी वैसा ही खड़ा है, जैसा 2021 में था, जब राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की जमीन खरीद को लेकर विवाद सामने आया था. यह घर ट्रस्ट के ट्रस्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के वरिष्ठ नेता अनिल कुमार मिश्रा का है. अब एक बार फिर उनका नाम सुर्खियों में है. इस बार आरोप राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाई गई नकदी और आभूषणों में कथित गड़बड़ी से जुड़े हैं. विपक्षी दलों और एक व्हिसलब्लोअर ने ट्रस्ट की निगरानी में चढ़ावे में हेराफेरी का आरोप लगाया है. इसी मामले में उत्तर प्रदेश सरकार की विशेष जांच टीम (एसआईटी) ने हाल ही में अनिल मिश्रा और ट्रस्ट के अन्य पदाधिकारियों से लंबी पूछताछ की. हालांकि दर्ज एफआईआर में उनका नाम शामिल नहीं है और उनका परिवार सभी आरोपों को सिरे से खारिज करता है.
शुरुआत
68 वर्षीय अनिल कुमार मिश्रा का जन्म उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर जिले के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ. उनका परिवार 1975 में फैजाबाद आकर बस गया. परिवार के करीबी लोगों के मुताबिक घर में पहले किसी का आरएसएस से संबंध नहीं था. 1980 के दशक में ठेकेदारी से जुड़े एक पारिवारिक विवाद के बाद सुरक्षा की चिंता बढ़ी तो उन्होंने आरएसएस की शाखा से जुड़ने का फैसला किया. उसी दौर में राम जन्मभूमि आंदोलन भी तेजी पकड़ रहा था और धीरे-धीरे मिश्रा संघ के सक्रिय कार्यकर्ता बन गए. परिचितों के मुताबिक उन्होंने वैचारिक बहस से ज्यादा संगठनात्मक अनुशासन और समर्पण के जरिए अपनी पहचान बनाई.
मंदिर आंदोलन के वर्ष
राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान अनिल मिश्रा संघ के भरोसेमंद कार्यकर्ताओं में गिने जाने लगे. उस समय उनके पास मारुति 800 कार थी, जिससे वे संघ और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं को अयोध्या में लाने-ले जाने का काम करते थे. पड़ोसियों का कहना है कि बाबरी मस्जिद के आसपास डेरा डाले आंदोलनकारी नेताओं के लिए उनके घर से बड़े स्टील के डिब्बों में भोजन भी भेजा जाता था. यही दौर था जब संगठन में उनकी पहचान लगातार मजबूत होती गई. आदेशों का पालन करना, समय पर हर जिम्मेदारी निभाना और वरिष्ठ नेताओं का विश्वास जीतना उनकी सबसे बड़ी ताकत माना गया.
सुर्खियों में
2019 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जब राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन हुआ तो अनिल मिश्रा को 15 ट्रस्टियों में शामिल किया गया. जनवरी 2021 में मंदिर निर्माण के लिए देशव्यापी निधि समर्पण अभियान चलाया गया और ट्रस्ट के पास हजारों करोड़ रुपये पहुंचे. लेकिन कुछ ही महीनों बाद जमीन खरीद के दो सौदों को लेकर विवाद खड़ा हो गया. आरोप लगे कि कुछ जमीनें पहले बेहद कम कीमत पर खरीदी गईं और फिर कुछ ही मिनटों या घंटों के भीतर कई गुना अधिक कीमत पर ट्रस्ट को बेच दी गईं. इन सौदों में अनिल मिश्रा गवाह के रूप में शामिल थे. ट्रस्ट के कुछ सदस्यों ने यह भी आरोप लगाया कि जमीन खरीद संबंधी फैसले सभी ट्रस्टियों की जानकारी के बिना लिए गए.
अब विवाद का केंद्र मंदिर का चढ़ावा है. बताया गया कि जनवरी 2024 से मंदिर में नकद चढ़ावे की गिनती और उससे जुड़ी व्यवस्था की जिम्मेदारी अनिल मिश्रा के पास थी. प्रतिदिन लाखों रुपये और विशेष अवसरों पर करोड़ों रुपये तक का चढ़ावा आने की बात कही जाती है. हाल ही में एसआईटी ने नकदी की गिनती, रिकॉर्ड और उसके रखरखाव को लेकर उनसे कई घंटे पूछताछ की. हालांकि अब तक दर्ज एफआईआर में उनका नाम शामिल नहीं किया गया है.
'एक विशुद्ध 'यस मैन''
2019 में उत्तर प्रदेश के होम्योपैथी विभाग से रजिस्ट्रार पद से सेवानिवृत्त हुए अनिल मिश्रा को जानने वाले लोग उन्हें अलग-अलग नजरिए से देखते हैं. कुछ उन्हें बेहद ईमानदार, सादगीपूर्ण और संगठन के लिए समर्पित व्यक्ति बताते हैं. वहीं कुछ का कहना है कि उनकी सबसे बड़ी विशेषता हमेशा वरिष्ठों के निर्देशों का पालन करना रही. परिवार के करीबी लोगों का दावा है कि उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी के दौरान मिलने वाले वेतन का बड़ा हिस्सा संघ के कामों में लगाया. इसी वजह से संगठन में उनका कद लगातार बढ़ता गया और वे अवध क्षेत्र में आरएसएस के सबसे प्रभावशाली चेहरों में शामिल हो गए.
ब्राह्मण बिरादरी
अयोध्या में भाजपा, आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद के शीर्ष नेतृत्व में बड़ी संख्या में ब्राह्मण और अन्य सवर्ण नेताओं की मौजूदगी लंबे समय से चर्चा का विषय रही है. अनिल मिश्रा भी ब्राह्मण समुदाय से आते हैं. संगठन के कुछ पूर्व पदाधिकारियों का आरोप है कि शीर्ष पदों पर ब्राह्मण नेतृत्व का प्रभाव अधिक होने से ऐसे नेताओं को आगे बढ़ने में आसानी मिली. हालांकि इस पर संघ की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है.
परिवार और राम मंदिर
अनिल मिश्रा का परिवार भी अयोध्या की मंदिर अर्थव्यवस्था से जुड़ा हुआ है. उनका बड़ा बेटा राम मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार के पास 'श्री राम भोग' नाम से रेस्तरां चलाता है. छोटा बेटा डॉक्टर है और फैजाबाद में होम्योपैथी क्लीनिक संचालित करता है, जबकि परिवार के अन्य सदस्य भी अपने-अपने पेशों में सक्रिय हैं. परिवार का कहना है कि उनकी संपत्ति सरकारी नौकरी की आय से अर्जित हुई है और उसका मंदिर ट्रस्ट से कोई संबंध नहीं है. उनका दावा है कि यदि जांच एजेंसियां बैंक खातों और घर की पूरी जांच करें तो कोई अवैध संपत्ति नहीं मिलेगी.
फिलहाल एसआईटी की जांच जारी है और अंतिम रिपोर्ट का इंतजार है. लेकिन जमीन खरीद विवाद के बाद अब चढ़ावे में कथित गड़बड़ी के आरोपों ने एक बार फिर राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं. अनिल कुमार मिश्रा पर अभी तक कोई आरोप सिद्ध नहीं हुआ है, लेकिन अयोध्या में राम मंदिर से जुड़े लगभग हर बड़े विवाद में उनका नाम सामने आने से वे एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में हैं.

