हर्ष मंदर | अगले जिहाद' की कभी न खत्म होने वाली तलाश

भारत में पिछले एक दशक के दौरान "लव जिहाद", "लैंड जिहाद", "थूक जिहाद", "यूपीएससी जिहाद", "वोट जिहाद", "हलाल जिहाद" और अब "सरोगेसी जिहाद" जैसे कई शब्द सार्वजनिक और राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाए गए हैं. इन अभियानों का एक साझा पैटर्न दिखाई देता है—हर बार एक नया "जिहाद" गढ़ा जाता है और उसके केंद्र में मुस्लिम समुदाय, विशेषकर मुस्लिम पुरुषों को रखा जाता है.

हर्ष मंदर मुताबिक, इन कथित "जिहादों" में सबसे अधिक जोर मुस्लिम पुरुष की उस छवि पर दिया जाता है, जिसमें उसे एक ऐसे व्यक्ति के रूप में पेश किया जाता है जो हिंदू महिलाओं को छल, प्रेम या यौन संबंधों के जरिए अपने समुदाय की आबादी बढ़ाने की साजिश का हिस्सा है. "लव जिहाद" इसी सोच का सबसे चर्चित उदाहरण बना, जिसमें यह दावा किया गया कि मुस्लिम युवक योजनाबद्ध तरीके से हिंदू महिलाओं को प्रेमजाल में फंसाकर उनका धर्म परिवर्तन कराते हैं. हालांकि अब तक इस दावे की पुष्टि करने वाला कोई व्यापक और ठोस प्रमाण सामने नहीं आया है, लेकिन यह शब्द राजनीतिक अभियानों और सार्वजनिक बहस का स्थायी हिस्सा बन चुका है.

लेख का तर्क है कि यह केवल धार्मिक या सांप्रदायिक विवाद नहीं है, बल्कि महिलाओं के शरीर, उनकी पसंद और उनकी स्वतंत्रता पर नियंत्रण की राजनीति भी है. जब किसी महिला के अपने जीवनसाथी चुनने के फैसले को "साजिश" बताया जाता है, तो उसके अपने निर्णय लेने के अधिकार को भी नकार दिया जाता है. इस तरह महिलाओं को एक स्वतंत्र नागरिक के बजाय समुदाय की "इज्जत" और "सीमा" के प्रतीक के रूप में देखा जाता है.

लेख यह भी बताता है कि समय के साथ "जिहाद" की परिभाषा लगातार फैलती गई. पहले यह प्रेम संबंधों तक सीमित था, फिर जमीन खरीदने, व्यापार करने, भोजन बेचने, प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता पाने और यहां तक कि खाने-पीने की आदतों तक को "जिहाद" के रूप में पेश किया जाने लगा. हर नए अभियान में यह संदेश देने की कोशिश की गई कि मुस्लिम समुदाय किसी न किसी संगठित रणनीति के तहत बहुसंख्यक समाज को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहा है.

इस पूरी प्रक्रिया में सोशल मीडिया, राजनीतिक बयान और कुछ टीवी चैनलों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही. कई बार बिना किसी ठोस जांच या प्रमाण के ऐसे दावों को व्यापक प्रचार मिला, जिससे समाज में अविश्वास और ध्रुवीकरण बढ़ा. धीरे-धीरे ये शब्द केवल नारे नहीं रहे, बल्कि उन्होंने कानून, प्रशासनिक फैसलों और सार्वजनिक धारणा को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया.

लेख का निष्कर्ष है कि "अगले जिहाद" की यह लगातार चलने वाली तलाश किसी वास्तविक खतरे से अधिक एक राजनीतिक और वैचारिक परियोजना का हिस्सा दिखाई देती है. हर बार एक नया शब्द गढ़कर समाज में भय और संदेह का माहौल बनाया जाता है, जबकि उसके समर्थन में ठोस प्रमाण अक्सर सामने नहीं आते. ऐसी राजनीति न केवल धार्मिक ध्रुवीकरण को गहरा करती है, बल्कि नागरिकों के बीच विश्वास, महिलाओं की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है.

यह स्तंभकार, शोधकर्ता, शिक्षक और सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर के लेख का हिंदी में अनुदित सारांश है. मूल लेख अंग्रेजी में यहाँ पढ़ सकते हैं.

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