जब हर नागरिक को अपनी नागरिकता साबित करनी पड़े: भारत की नागरिकता परियोजना और संवैधानिक दांव
‘आर्टिकल 14’ में प्रकाशित राजनीतिक वैज्ञानिक निरजा गोपाल जयाल के लेख के मुताबिक, भारत में नागरिकता की अवधारणा धीरे-धीरे ऐसे दौर में पहुंच रही है, जहां हर नागरिक से अपनी नागरिकता साबित करने की अपेक्षा की जा रही है. उनके अनुसार, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी), विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर), नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और नागरिकता से जुड़ी अन्य सरकारी पहलों में एक साझा सोच दिखाई देती है. यह सोच नागरिक को पहले से नागरिक मानने के बजाय उस पर संदेह करने की है. इस प्रवृत्ति को "एलिएनेज की धारणा" यानी नागरिक को संभावित विदेशी मानने की मानसिकता बताया गया है.
लेख में कहा गया है कि यह बदलाव केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि नागरिकता की संवैधानिक अवधारणा को बदलने का प्रयास भी है. इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वैचारिक सोच, जो विनायक दामोदर सावरकर के "हिंदुत्व" के विचारों से प्रभावित मानी जाती है, नागरिकता को धर्म से जोड़कर देखती है. इसके विपरीत भारतीय संविधान धर्म के आधार पर किसी भी भेदभाव के बिना समान नागरिकता की गारंटी देता है.
लेख के अनुसार, 1955 के नागरिकता कानून में समय-समय पर हुए संशोधनों ने नागरिकता की प्रकृति बदल दी है. 1985 के संशोधन के बाद जन्म के आधार पर मिलने वाली नागरिकता पर पहली बार शर्तें लगीं. 2003 के संशोधन के जरिए राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) की व्यवस्था लाई गई तथा "अवैध प्रवासी" की अवधारणा जोड़ी गई. वहीं, 2019 के नागरिकता संशोधन कानून ने पहली बार धर्म के आधार पर कुछ समुदायों को नागरिकता पाने में प्राथमिकता दी. लेख में दावा किया गया है कि इन बदलावों का सबसे अधिक प्रभाव मुस्लिम समुदाय पर पड़ा है.
विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर भी चिंता जताई गई है. इसमें कहा गया है कि पहले मतदाता सूची केवल मतदान का अधिकार तय करती थी, लेकिन अब यह नागरिकता और सरकारी कल्याणकारी योजनाओं तक पहुंच से भी जुड़ती दिखाई दे रही है. इस कारण मतदाता सूची से नाम हटने का असर केवल मतदान तक सीमित नहीं रह सकता.
लेख में यह भी कहा गया है कि वर्तमान राजनीतिक विमर्श में नागरिकों के अधिकारों की तुलना में कर्तव्यों पर अधिक जोर दिया जा रहा है, जबकि संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान करता है. यदि नागरिकता के सवाल को धर्म, पहचान और संदेह से जोड़ा जाता है, तो इससे समानता, धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक अधिकारों पर आधारित संवैधानिक व्यवस्था कमजोर हो सकती है.
अंत में सुझाव दिया गया है कि जन्म के आधार पर नागरिकता की मूल व्यवस्था बहाल की जाए, 2003 और 2019 के नागरिकता संशोधनों की समीक्षा या उन्हें निरस्त किया जाए, एनआरसी, एनपीआर और एसआईआर जैसी व्यवस्थाओं को समाप्त किया जाए तथा मतदाता सूची को कल्याणकारी योजनाओं से अलग रखा जाए. साथ ही नागरिक समाज, न्यायपालिका और लोकतांत्रिक संस्थाओं की सक्रिय भूमिका को संविधान की मूल भावना की रक्षा के लिए आवश्यक बताया गया है.

