1.56 अरब हेक्टेयर भूमि क्षरित, दुनिया की कुल भूमि का 10% और भारत के क्षेत्रफल से करीब 5.2 गुना: संयुक्त राष्ट्र

‘डाउन टू अर्थ’ में हिमांशु नितनवारे की 1 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, संयुक्त राष्ट्र की खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) की रिपोर्ट में दुनिया की 1.56 अरब हेक्टेयर भूमि के क्षरण का उल्लेख है. यह क्षेत्रफल दुनिया की कुल भूमि का करीब 10 प्रतिशत और भारत के क्षेत्रफल का लगभग 5.2 गुना है. रिपोर्ट में जंगलों के क्षरण और बहाली के बीच बढ़ते अंतर को भी रेखांकित किया गया है.

दुनियाभर में जंगलों का क्षरण उनकी बहाली की तुलना में तेजी से हो रहा है. संयुक्त राष्ट्र की द स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स फॉरेस्ट्स 2026: रिस्टोरिंग फॉरेस्ट्स एंड लैंडस्केप्स रिपोर्ट के अनुसार, 46 करोड़ हेक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र क्षरण की स्थिति में है. जलवायु परिवर्तन, जनसंख्या वृद्धि, शहरीकरण और बुनियादी ढांचे का विस्तार इसके प्रमुख कारण हैं. भूमि उपयोग में बदलाव, ऊर्जा और संसाधनों की बढ़ती मांग तथा आजीविका के लिए भूमि पर निर्भरता भी इस समस्या को बढ़ा रही है.

रिपोर्ट के अनुसार, भूमि क्षरण का अर्थ पारिस्थितिकी तंत्र से मिलने वाली वस्तुओं और सेवाओं में लगातार गिरावट है. इसमें जैविक संसाधन, जल संबंधी सेवाएं और भूमि से जुड़ी सामाजिक-आर्थिक सुविधाएं शामिल हैं.

बहाली के लक्ष्य से पीछे दुनिया

कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता रूपरेखा के तहत 2030 तक क्षरित पारिस्थितिकी तंत्र के 30 प्रतिशत हिस्से की बहाली का लक्ष्य है. इसे हासिल करने के लिए करीब 46.9 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर प्रभावी बहाली की जरूरत है. हालांकि, 2026 तक देशों की रिपोर्ट में केवल 20.65 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र को बहाली के तहत दर्ज किया गया है.

रिपोर्ट के मुताबिक, 1990 से 2025 के बीच प्राकृतिक रूप से विकसित होने वाले जंगलों का क्षेत्रफल 32.4 करोड़ हेक्टेयर घटा. अफ्रीका में 2019 तक लगभग 33.4 करोड़ हेक्टेयर भूमि, यानी कुल क्षेत्रफल का करीब 12 प्रतिशत, क्षरित थी. एशिया में यह आंकड़ा 58.3 करोड़ हेक्टेयर या लगभग 19 प्रतिशत और दक्षिण अमेरिका में 24.5 करोड़ हेक्टेयर या करीब 14 प्रतिशत रहा.

2025 में दुनिया का कुल वन क्षेत्र 4.14 अरब हेक्टेयर था, जो कुल भूमि का लगभग 32 प्रतिशत है. 1990 के बाद से वनों की कटाई के कारण दुनिया में करीब 48.9 करोड़ हेक्टेयर वन क्षेत्र समाप्त हुआ. इसी अवधि में जैव विविधता से समृद्ध प्राथमिक जंगलों का क्षेत्रफल 11 करोड़ हेक्टेयर घटा.

जंगलों में आग और भूमि उपयोग में बदलाव

वनों की कटाई और क्षरण से जैव विविधता, जलवायु स्थिरता और भूमि की उत्पादकता प्रभावित होती है. रिपोर्ट के अनुसार, 1990 से 2000 के बीच हर साल औसतन 1.07 करोड़ हेक्टेयर वन क्षेत्र का शुद्ध नुकसान हुआ. 2000 से 2015 के दौरान यह घटकर 36.8 लाख हेक्टेयर सालाना रहा, लेकिन 2015 से 2025 के बीच फिर बढ़कर 41.2 लाख हेक्टेयर हो गया. इसकी एक वजह नए वन क्षेत्र के विस्तार की धीमी गति रही.

बहाली की जरूरत वाले क्षेत्रों की पहचान करते समय 93 देशों और क्षेत्रों ने जंगलों में आग से प्रभावित भूमि, जले हुए जंगलों और वनाग्नि से प्रभावित क्षेत्रों का बार-बार उल्लेख किया. कई देशों ने वन क्षरण को पेड़ों के आवरण और जंगलों की संरचना में कमी के रूप में परिभाषित किया. अस्थिर कटाई, खराब वन प्रबंधन और भूमि उपयोग में बदलाव से जंगलों की घनता, उत्पादकता तथा प्राकृतिक पुनर्जनन क्षमता घटती है. मिट्टी का कटाव, अत्यधिक चराई और सीमावर्ती भूमि का क्षरण भी इसकी वजहों में शामिल हैं.

रिपोर्ट के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र के वन दशक के अंतिम वर्षों में वैश्विक बहाली लक्ष्यों और जमीन पर हो रहे काम के बीच की दूरी कम करने का सीमित लेकिन महत्वपूर्ण अवसर है. इसके लिए अलग-अलग प्रयासों के बजाय समन्वित बहाली कार्यक्रम, बेहतर मानक, स्थानीय क्षमता और नियमित निगरानी की जरूरत होगी.

Previous
Previous

कर्नाटक: नाम हटाने के लिए थोक में ‘फॉर्म-7’ दाखिल करने पर बवाल, चुनाव आयोग से जांच की मांग

Next
Next

सत्य सागर | बेचारे ज्ञानेश को दोष न दें, लोकतंत्र तो बहुत पहले मर चुका था