सत्य सागर | बेचारे ज्ञानेश को दोष न दें, लोकतंत्र तो बहुत पहले मर चुका था

‘काउंटरकरंट्स’ में 29 सितंबर 2026 को प्रकाशित सत्य सागर का यह लेख भारत और केन्या के चुनावी संकटों को वैश्विक आर्थिक असमानता तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं के क्षरण से जोड़ता है. इसमें तर्क दिया गया है कि चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी लोकतंत्र के पतन की शुरुआत नहीं, बल्कि पहले से जारी संकट का परिणाम है.

सितंबर 2017 में नैरोबी हवाई अड्डे पर सत्य सागर की नजर एक स्थानीय अखबार की सुर्खी पर पड़ी—सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति चुनाव रद्द कर दिया. केन्या की अदालत ने चुनाव प्रक्रिया में अनियमितताओं और चुनाव आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी की हत्या के बाद दोबारा मतदान का आदेश दिया था. इस फैसले ने केन्या की लोकतांत्रिक संस्थाओं की कमजोरी उजागर की. तब भारत में भी ऐसी स्थिति पैदा होने की आशंका जताई गई थी.

भारत में विपक्ष की कमजोरी, मीडिया की सत्ता के प्रति नरमी और नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के राजनीतिक इस्तेमाल ने लोकतांत्रिक व्यवस्था के क्षरण को बढ़ावा दिया. अगस्त 2025 में राहुल गांधी ने चुनाव आयोग पर सत्तारूढ़ दल को ‘वोट चोरी’ में मदद पहुंचाने का आरोप लगाया. इसके बाद विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत बिहार में करीब 47 लाख और 12 राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों में 5.18 करोड़ नाम हटाए गए. उत्तर प्रदेश में यह संख्या 2.05 करोड़ बताई गई.

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, दस महीनों में दो चुनाव आयुक्तों ने मुख्य चुनाव आयुक्त के मतदाता सूची संबंधी फैसलों पर 14 बार लिखित आपत्ति जताई. चुनाव आयोग का कहना है कि मृत और दोहराए गए नाम हटाए जा रहे हैं, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने मई में पुनरीक्षण को बरकरार रखा. 2023 के कानून से मुख्य न्यायाधीश को आयुक्तों की नियुक्ति करने वाली समिति से हटाए जाने के बाद सरकार का चयन प्रक्रिया पर प्रभाव बढ़ गया है.

लोकतंत्र का संकट चुनावों से बड़ा है

भारत और केन्या ने ब्रिटिश शासन से चुनावी लोकतंत्र तो अपनाया, लेकिन औपनिवेशिक दौर की सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को दूर नहीं किया. वैश्विक स्तर पर भी पूंजी और सत्ता का केंद्रीकरण लोकतंत्र को कमजोर कर रहा है. ऑक्सफैम के आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया के अरबपतियों की संपत्ति 2025 में 2.5 ट्रिलियन डॉलर बढ़ी. जब मीडिया, अर्थव्यवस्था और राजनीतिक प्रभाव कुछ धनी लोगों के हाथों में केंद्रित हों, तब मतदान आम नागरिकों को वास्तविक आर्थिक शक्ति नहीं दे पाता.

भारत में सबसे अमीर एक प्रतिशत लोगों के पास लगभग 40 प्रतिशत संपत्ति है, जबकि केन्या में 125 सबसे धनी लोगों के पास 4.3 करोड़ नागरिकों से अधिक संपत्ति है. दोनों देशों में गरीबी, भूख और मानवाधिकार संबंधी चुनौतियां भी लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की सीमाएं उजागर करती हैं.

समाजवादी लोकतंत्र का प्रस्ताव

समाधान के तौर पर समाजवादी लोकतंत्र की परिकल्पना रखी गई है. इसमें संपत्ति का पुनर्वितरण, भोजन, आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षित रोजगार को अधिकार बनाना तथा पर्यावरणीय सीमाओं के भीतर अर्थव्यवस्था चलाना शामिल है. केवल चुनाव आयोग के अधिकारियों या मतदान प्रक्रियाओं को बदलने से समस्या हल नहीं होगी; आर्थिक शक्ति के वितरण में भी बदलाव जरूरी है.

ऐसे परिवर्तन के लिए व्यापक जन-संगठन और संघर्ष की जरूरत बताई गई है. भारत और केन्या के श्रमिकों, किसानों, अल्पसंख्यकों तथा असंगठित कामगारों को धर्म, जाति और जातीय पहचान से ऊपर साझा आर्थिक मुद्दों पर एकजुट करना बड़ी चुनौती है. लोकतंत्र की बहाली का प्रश्न केवल निष्पक्ष चुनावों तक सीमित नहीं, बल्कि इस बात से भी जुड़ा है कि समाज की संपत्ति और निर्णय लेने की शक्ति किसके हाथ में है.

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