श्रवण गर्ग | ‘साबरमती आश्रम’ नहीं, ‘गांधी विस्टा’ कहिए!

साफ़ हो गया है कि देश के राजनीतिक नेतृत्व के लिए गांधी, उनके विचार और आश्रमों (सेवाग्राम और साबरमती) की ज़रूरत उनका आधुनिकीकरण करके उन्हें भी ‘सेंट्रल विस्टा’ जैसा बनाने जितनी ही बची है. गांधी के अहिंसक ‘डांडी मार्च’ को संघ के हिंसक ‘डंडा मार्च’ में पहले ही बदला जा चुका है!

एक राष्ट्र के रूप में नागरिकों को जिस तरह के संवेदनाशून्य रोबोटों में ढाला और प्रशिक्षित किया जा रहा है, उनके कदमों में जिस तरह की तेज़ी और स्वरों में तीक्ष्णता लाई जा रही है, भविष्य की सम्भावनाओं को लेकर ख़ौफ़ उत्पन्न करती है.

हम अपनी इस शर्म को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने में संकोच कर रहे हैं कि एक विचार के रूप में गांधी की ज़रूरत नहीं बची है. हमारे शिखर पुरुषों ने नागरिकों को स्वतंत्रता संग्राम के नए नायक और स्व-रचित इतिहास के पन्ने सौंप दिए हैं.

जासूसी के आयातित उपकरणों के मार्फ़त नागरिकों पर नज़र रखी जा रही है कि वे क्या पढ़, सुन और बोल रहे हैं. वीरों का नया आभूषण अहिंसा के स्थान पर हिंसा बन गया है.

इसीलिए सत्ताओं द्वारा विभाजन की नई विभीषिकाओं को जन्म दिए जाने की कोशिशों के बीच हुईं राहुल गांधी की दो साहसिक भारत जोड़ो यात्राओं को इन उम्मीदों के साथ नहीं देखा गया था कि यह युवा नेता आज के समय का कोई नया महात्मा गांधी हैं और उसके द्वारा धारण किए जाने वाले महँगे टी-शर्ट में भी लोगों को हाथ से कते सूत से बुनी बापू की धोती के दर्शन हो रहे हैं, बल्कि इसलिए कि उनके स्वागत के लिए सड़कों पर जगह-जगह उमड़ती हुई भीड़ विभाजनकारी ताक़तों के ख़िलाफ़ अहिंसा को हथियार बनाकर खड़े होने के गांधी के साहस की पुनर्स्थापना कर रही है!

(श्रवण गर्ग वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक टिप्पणीकार हैं.)

Previous
Previous

श्रवण गर्ग | इंडिया ब्लॉक में दरार के बाद राहुल गांधी अकेले कैसे लड़ेंगे?

Next
Next

भवानी शंकर नायक | भारत में छात्र आत्महत्या का संकट, सपनों की मौत और उदारवादी पलायनवाद