20 साल से लंबित मामला, सुप्रीम कोर्ट में आधे घंटे में निस्तारित
सुप्रीम कोर्ट में 20 से अधिक वर्षों से लंबित विधायी विशेषाधिकार बनाम प्रेस की स्वतंत्रता से जुड़े मामले को मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 7 जजों की पीठ ने निष्फल मानते हुए आधे घंटे में खारिज कर दिया.
कृष्णदास राजागोपाल के अनुसार, यह विवाद 2003 में शुरू हुआ था, जब तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता की आलोचनात्मक संपादकीय छापने पर तमिलनाडु विधानसभा ने 'द हिंदू' के संपादकों को गिरफ्तार करने का प्रस्ताव पारित किया था. विधानसभा का तर्क था कि यह संविधान के अनुच्छेद 194 के तहत सदन के विशेषाधिकार का हनन है. इसके खिलाफ 'द हिंदू' के संपादक सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, जहां वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत प्रेस की आजादी का पक्ष रखा.
मामला 2003 में 5 जजों और हाल ही में अगस्त में 7 जजों की संविधान पीठ को भेजा गया था. हालांकि, सुनवाई के दौरान विधानसभा के वकील राजू रामचंद्रन ने अदालत का ध्यान इस ओर दिलाया कि समाचार पत्र के खिलाफ प्रस्ताव 2004 में ही वापस ले लिया गया था, जो अदालती रिकॉर्ड में दर्ज होने से छूट गया था. संविधान पीठ ने कहा कि प्रस्ताव की वापसी पर सुप्रीम कोर्ट का ध्यान नहीं गया था. मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालत किसी अकादमिक अभ्यास में समय व्यर्थ नहीं करना चाहती. न्यायालय ने कानूनी प्रश्नों को भविष्य के लिए खुला रखते हुए मामले का निस्तारण कर दिया. इस बीच वरिष्ठ अधिवक्ता ए.एम. सिंघवी ने हल्के-फुल्के अंदाज में टिप्पणी भी की कि न्यायालय ने दो रिकॉर्ड बनाए हैं—“सात जजों की पीठ द्वारा सबसे छोटी सुनवाई और सबसे त्वरित सुनवाई.”

