‘नीतिगत पंगुता’ : केंद्रीय विश्वविद्यालयों में कुलपतियों के कार्यकाल में बार-बार विस्तार से विशेषज्ञ हैरान
सरकार ने आधा दर्जन केंद्रीय विश्वविद्यालयों के निवर्तमान कुलपतियों को फिर से नियुक्त किया है या उनके पांच साल के कार्यकाल को आगे बढ़ाया है. शिक्षाविदों और कार्यकर्ताओं के एक वर्ग द्वारा इस कदम को "नीतिगत पंगुता" के उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है.
बसंत कुमार मोहंती की रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने, केंद्रीय विश्वविद्यालयों के कुलाध्यक्ष के रूप में अपनी क्षमता में, पिछले तीन महीनों में दिल्ली विश्वविद्यालय और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के निवर्तमान कुलपतियों - योगेश सिंह और संगीता श्रीवास्तव - को पांच साल का दूसरा कार्यकाल देने के शिक्षा मंत्रालय के प्रस्ताव को मंजूरी दी है. मुर्मू ने हाल ही में दोनों विश्वविद्यालयों की कार्यकारी परिषदों की उन सिफारिशों को मंजूरी दी थी, जिनमें उनके परिनियमों के उस प्रावधान में संशोधन करने की बात कही गई थी जो निवर्तमान कुलपतियों के दूसरे कार्यकाल पर रोक लगाता था.
जुलाई में, मुर्मू ने हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति सत प्रकाश बंसल, हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय के टंकेश्वर कुमार, कर्नाटक केंद्रीय विश्वविद्यालय के बट्टू सत्यनारायण, दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय के कामेश्वर नाथ सिंह और गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर के आलोक कुमार चक्रवाल के कार्यकाल के विस्तार को मंजूरी दी थी.
दिल्ली विश्वविद्यालय के अंतर्गत आने वाले मिरांडा हाउस कॉलेज की संकाय सदस्य आभा देव हबीब ने कहा कि किसी भी व्यक्ति के लिए किसी शैक्षणिक संस्थान का नेतृत्व करने के लिए एक दशक का समय बहुत लंबा होता है. उन्होंने सवाल उठाया, “दस साल का समय बहुत लंबा होता है जब एक नापाक गठजोड़ बन सकता है और पनप सकता है. फिर भी, कई कुलपति अपने पदों पर बने हुए हैं. क्यों?”
सूचना का अधिकार (आरटीआई) कार्यकर्ता नवीन नौटियाल ने कहा कि सरकार को निवर्तमान कुलपति का कार्यकाल समाप्त होने से काफी पहले ही कुलपति की नियुक्ति प्रक्रिया शुरू कर देनी चाहिए. उन्होंने कहा, “सरकार समय पर पदों का विज्ञापन नहीं देती है. जब कुलपति का पांच साल का कार्यकाल समाप्त होता है, तो एक साल के लिए कार्यकाल बढ़ा दिया जाता है. यह नीतिगत पंगुता का एक उदाहरण है.”

