2026 में भारत में सीवर, सेप्टिक टैंक और बंद जगहों में 125 लोगों की मौत

‘मकतूब मीडिया’ की रिपोर्ट के मुताबिक, दलित आदिवासी शक्ति अधिकार मंच (डीएएसएएम) ने जनवरी से 2 अक्टूबर 2026 के बीच देश के 20 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में सीवर, सेप्टिक टैंक, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और अन्य बंद जगहों में काम के दौरान कम से कम 125 मौतें दर्ज की हैं. संगठन के अनुसार, ये घटनाएं केवल दुर्घटनाएं नहीं हैं, बल्कि असुरक्षित सैनिटेशन कार्य, ठेकेदारी व्यवस्था, संस्थागत लापरवाही और सुरक्षा नियमों के कमजोर क्रियान्वयन की समस्या को दिखाती हैं.

डीएएसएएम के आंकड़ों में जुलाई सबसे घातक महीना रहा, जिसमें 28 मौतें दर्ज हुईं. मार्च में 25, जून में 20, मई में 19 और अप्रैल में 10 मौतें हुईं. राज्यवार आंकड़ों में बिहार में 14, तमिलनाडु में 12, हरियाणा में 11 और उत्तर प्रदेश में 10 मौतें दर्ज की गईं.

कई मामलों में मौत जहरीली गैसों और ऑक्सीजन की कमी के कारण हुई. एक कर्मचारी के टैंक या सीवेज चैंबर में बेहोश होने के बाद दूसरा व्यक्ति उसे बचाने बिना सुरक्षा उपकरण के अंदर गया और खुद भी उसी जहरीले वातावरण का शिकार हो गया. डीएएसएएम ने इसे बार-बार सामने आने वाला ऐसा पैटर्न बताया, जिसे पर्याप्त सुरक्षा और प्रशिक्षित रेस्क्यू व्यवस्था से रोका जा सकता है.

रिपोर्ट में कई गंभीर घटनाओं का उल्लेख है. बिहार में मार्च के दौरान दो अलग-अलग सेप्टिक टैंक हादसों में चार-चार लोगों की मौत हुई. रायपुर के एक निजी अस्पताल में 20 फीट गहरे सेप्टिक टैंक में तीन कर्मचारियों की मौत हुई. मई में लखनऊ में करीब 15 फीट गहरे सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान दो कर्मचारियों की जान गई. जून में दिल्ली के मुंडका में एक फैक्ट्री के सेप्टिक टैंक में तीन लोगों की मौत हुई. जुलाई में मेघालय के शिलॉन्ग में भूमिगत पानी की टंकी में पांच लोगों की मौत हुई.

डीएएसएएम ने कहा कि कई मामलों में मजदूरों के पास गैस डिटेक्टर, ऑक्सीजन मॉनिटर, ब्रीदिंग उपकरण, सुरक्षा हार्नेस और प्रशिक्षित रेस्क्यू टीम जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं थीं. संगठन ने यह भी चिंता जताई कि सेप्टिक टैंक या सीवेज संरचना में मरने वाले श्रमिकों को कई बार ‘निर्माण मजदूर’ या ‘औद्योगिक श्रमिक’ जैसी श्रेणियों में दर्ज किया जाता है, जिससे वास्तविक सैनिटेशन कार्य और उससे जुड़े जोखिम छिप जाते हैं.

संगठन ने इस संकट को जाति आधारित श्रम व्यवस्था से भी जोड़ा. उसके अनुसार, दलित समुदाय ऐतिहासिक रूप से सैनिटेशन और जोखिमपूर्ण मैनुअल श्रम से जुड़े रहे हैं, जबकि ठेकेदारी और अनौपचारिक रोजगार ने श्रमिकों को और असुरक्षित बनाया है. कई मजदूर बिना लिखित अनुबंध, प्रशिक्षण, बीमा और सामाजिक सुरक्षा के काम करते हैं.

डीएएसएएम ने हर मामले में जिम्मेदारी तय करने, उचित कानूनी कार्रवाई, सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के मशीनीकरण और हर प्रभावित परिवार को कम से कम 30 लाख रुपये मुआवजा देने की मांग की है. संगठन ने रोजगार, पेंशन, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा सहित व्यापक पुनर्वास की भी मांग की.

संगठन के अनुसार, किसी भी कर्मचारी को गैस और ऑक्सीजन की जांच, सुरक्षा उपकरण और प्रशिक्षित रेस्क्यू व्यवस्था के बिना बंद जगह में नहीं भेजा जाना चाहिए. उसने देशभर में सैनिटेशन कार्य का ऑडिट, मौतों का पारदर्शी राष्ट्रीय डेटाबेस और खतरनाक मैनुअल एंट्री समाप्त करने के लिए व्यापक राष्ट्रीय रणनीति की मांग की है.

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