अग्निपथ 2.0 की जरूरत: भारत को सस्ती सेना चाहिए, सस्ता सैनिक नहीं
‘द प्रिंट’ में प्रकाशित पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल एच. एस. पनाग के लेख में अग्निपथ योजना में व्यापक सुधार की जरूरत पर जोर दिया गया है. अग्निपथ के तहत भर्ती होने वाले पहले अग्निवीर अब चार साल की सेवा पूरी करने के करीब हैं. नौसेना का पहला बैच इस साल के अंत तक अपना कार्यकाल पूरा करेगा, जबकि सेना और वायुसेना के बैच अगले साल अपने निर्धारित कार्यकाल के अंतिम चरण में पहुंचेंगे. ऐसे में यह योजना की पहली वास्तविक परीक्षा मानी जा रही है.
सरकार के सामने चुनौती यह है कि न तो अग्निपथ 1.0 को बिना बदलाव के सही मानकर उसका बचाव किया जाए और न ही राजनीतिक दबाव में इसे पूरी तरह खत्म कर दिया जाए. जरूरत एक व्यापक रूप से संशोधित "अग्निपथ 2.0" की है, जो आर्थिक जरूरतों के साथ सैन्य क्षमता और सैनिकों के हितों के बीच संतुलन बनाए.
सुधार जरूरी था
अग्निपथ योजना के पीछे मूल तर्क यह था कि भारत लंबे समय तक ऐसी जनशक्ति-आधारित सेना नहीं चला सकता, जिसमें रक्षा बजट का लगातार बढ़ता हिस्सा वेतन और पेंशन पर खर्च हो और आधुनिकीकरण के लिए कम संसाधन बचें. सशस्त्र बलों को युवा, अपेक्षाकृत छोटी और तकनीकी रूप से अधिक सक्षम बनाना जरूरी है.
पेंशन का बोझ केवल नियमों में बदलाव करके कम नहीं किया जा सकता. इसके लिए सैन्य जनशक्ति की पूरी संरचना में बदलाव की जरूरत है. हालांकि सही रणनीतिक उद्देश्य होने से कोई योजना अपने आप सही नहीं हो जाती.
2022 में शुरू की गई अग्निपथ योजना के तहत युवाओं को चार साल के लिए भर्ती किया गया. प्रत्येक बैच के अधिकतम 25 प्रतिशत अग्निवीरों को स्थायी सेवा के लिए चुना जाना था, जबकि बाकी 75 प्रतिशत को सेवा निधि और अन्य लाभों के साथ बाहर होना था. शुरुआत से ही प्रशिक्षण, सैन्य क्षमता, मनोबल, रिटेंशन, वेतन और चार साल बाद रोजगार जैसे मुद्दों पर सवाल उठे थे. अब चार साल के अनुभव के बाद इन सवालों को वास्तविक अनुभव के आधार पर देखने का समय है.
चार साल शायद बहुत कम हैं
एक सैनिक को केवल शुरुआती प्रशिक्षण देकर पूरी तरह तैयार नहीं माना जा सकता. सैन्य क्षमता प्रशिक्षण, फील्ड अनुभव, अभ्यास, यूनिट में काम और आधुनिक उपकरणों के इस्तेमाल से लगातार विकसित होती है. यह बात तकनीकी भूमिकाओं में और भी महत्वपूर्ण है.
आज भारतीय सशस्त्र बल जटिल सेंसर, संचार प्रणाली, एयर डिफेंस सिस्टम, ड्रोन और प्रिसिजन हथियारों जैसी तकनीकों को तेजी से अपना रहे हैं. किसी सैनिक, नाविक या एयरमैन को इन उपकरणों को चलाने का प्रशिक्षण देना केवल शुरुआत है. उन्हें प्रभावी ढंग से संचालित और बनाए रखने के लिए व्यावहारिक अनुभव भी जरूरी है.
ऑपरेशन सिंदूर के अनुभव ने भी आधुनिक सैन्य प्लेटफॉर्म के लिए अनुभवी जनशक्ति की जरूरत को रेखांकित किया है. रिपोर्टों के अनुसार तीनों सेनाएं अधिक अग्निवीरों को बनाए रखने की जरूरत महसूस कर रही हैं. सेना और वायुसेना में रिटेंशन दर करीब 50 प्रतिशत तक बढ़ाने पर विचार की खबरें हैं, जबकि नौसेना तकनीकी जरूरतों के कारण इससे भी अधिक कर्मियों को बनाए रखना चाहती है.
शुरुआती कार्यकाल चार की बजाय पांच साल किया जा सकता है. साथ ही सभी सैन्य भूमिकाओं के लिए एक समान रिटेंशन प्रतिशत तय करना व्यावहारिक नहीं होगा. एक इन्फैंट्री राइफलमैन, टैंक क्रू, मिसाइल टेक्नीशियन, रडार ऑपरेटर, एयरोनॉटिकल टेक्नीशियन और नौसैनिक इंजीनियर की प्रशिक्षण और अनुभव की जरूरतें अलग-अलग हैं. इसलिए तकनीकी और विशेषज्ञ भूमिकाओं में प्रशिक्षित कर्मियों को अधिक समय तक बनाए रखने की जरूरत हो सकती है.
सबसे बड़ी खामी - "असमान सैनिक"
अग्निपथ योजना की सबसे गंभीर समस्या "असमान सैनिक" की स्थिति है. एक अग्निवीर और नियमित सैनिक एक ही सेक्शन में काम कर सकते हैं, एक ही मोर्चे पर तैनात हो सकते हैं, एक ही हथियार संभाल सकते हैं और एक ही खतरे का सामना कर सकते हैं. लेकिन सक्रिय सेवा के दौरान उनके वेतन और मृत्यु या दिव्यांगता की स्थिति में मिलने वाले लाभों में अंतर हो सकता है.
शॉर्ट-सर्विस और स्थायी सैनिकों के कार्यकाल, पेंशन और सेवा समाप्ति के बाद मिलने वाले लाभों में अंतर हो सकता है, लेकिन सक्रिय सेवा के दौरान सैनिकों के वेतन, लागू भत्तों, ऑपरेशनल लाभ, बीमा, मृत्यु और दिव्यांगता मुआवजे, चिकित्सा सुविधाओं और पारिवारिक कल्याण में समानता होनी चाहिए.
जनशक्ति का गणित सुधारना होगा
अग्निपथ योजना को सेना की पूरी जनशक्ति संरचना से अलग करके नहीं देखा जा सकता. 2022-23 में करीब 46,000 अग्निवीरों की वार्षिक भर्ती शुरू हुई थी, जो 2026 में बढ़कर करीब 70,000 हो गई. वर्ष के अंत तक लगभग 2.08 लाख अग्निवीर सेवा में हो सकते हैं.
सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के अनुसार हर साल भारतीय सशस्त्र बलों से करीब 60,000 नियमित सैन्यकर्मी सेवानिवृत्त होते हैं. यदि केवल 25 प्रतिशत अग्निवीरों को स्थायी सेवा में रखा जाता है, तो इतनी बड़ी संख्या में होने वाली वार्षिक सेवानिवृत्ति की भरपाई करना मुश्किल होगा. 50 प्रतिशत रिटेंशन के बाद भी पूरी जनशक्ति संरचना पर नए सिरे से विचार करना जरूरी होगा.
इसका मतलब पुराने बड़े स्थायी सैन्य ढांचे में लौटना नहीं है. इसके बजाय सेना के आकार, संगठन और संरचना में व्यापक सुधार की जरूरत है. भारत को अपेक्षाकृत छोटा स्थायी सैन्य कैडर और बड़ा शॉर्ट-सर्विस कैडर विकसित करना होगा, ताकि आधुनिक युद्ध की जरूरतों के अनुसार जनशक्ति का बेहतर इस्तेमाल किया जा सके.
सुनिश्चित बदलाव के रास्ते
अग्निपथ की शुरुआती कमजोरी यह थी कि चार साल बाद बाहर होने वाले युवाओं के लिए नागरिक जीवन में रोजगार का स्पष्ट रास्ता नहीं था. केवल यह मान लेना कि सैन्य प्रशिक्षण के बाद युवा अपने आप नौकरी पा लेगा, पर्याप्त नहीं था.
बाद में सरकार ने इस दिशा में कुछ कदम उठाए. जुलाई 2026 में गृह मंत्रालय ने सीएपीएफ में कांस्टेबल और असम राइफल्स में राइफलमैन पदों के लिए पूर्व अग्निवीरों को 50 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की. आयु सीमा में छूट और कुछ भर्ती प्रक्रियाओं में रियायत की व्यवस्था भी की गई.
रेलवे ने भी पूर्व अग्निवीरों के लिए अलग-अलग स्तर के पदों में आरक्षण तय किया है. कई राज्य सरकारों ने पुलिस और अन्य विभागों में उनके लिए अवसर देने की घोषणा की है. सैन्य कौशल को नागरिक क्षेत्र में मान्यता देने और उच्च शिक्षा से जोड़ने के प्रयास भी शुरू हुए हैं.
अब जरूरत इन व्यवस्थाओं को एक व्यवस्थित ढांचे में जोड़ने की है. इसके लिए एक राष्ट्रीय अग्निवीर ट्रांजिशन अथॉरिटी बनाई जा सकती है, जो सीएपीएफ, राज्य पुलिस, रेलवे, रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों, सरकारी नौकरियों, निजी उद्योग, कौशल प्रमाणन, उच्च शिक्षा और स्वरोजगार के लिए एक सिंगल-विंडो व्यवस्था तैयार करे. किसी युवा को अग्निवीर बनने से पहले ही यह स्पष्ट होना चाहिए कि सेवा पूरी होने के बाद उसके सामने कौन-कौन से करियर विकल्प उपलब्ध होंगे.
अग्निपथ 2.0
अग्निपथ योजना जल्दबाजी में शुरू की गई थी और इससे पहले कोई पायलट प्रोजेक्ट नहीं चलाया गया. यही इसकी शुरुआती कमजोरी थी. लेकिन अब चार साल के अनुभव के आधार पर सशस्त्र बलों और रक्षा मंत्रालय को एक औपचारिक और पारदर्शी समीक्षा करनी चाहिए.
अग्निपथ 2.0 में छह प्रमुख बदलाव किए जा सकते हैं. पहला, इसे केवल भर्ती योजना नहीं बल्कि सशस्त्र बलों के व्यापक जनशक्ति पुनर्गठन का हिस्सा बनाया जाए. दूसरा, शुरुआती कार्यकाल चार की बजाय पांच साल किया जाए. तीसरा, अलग-अलग भूमिकाओं और सैन्य जरूरतों के आधार पर रिटेंशन तय हो. चौथा, सक्रिय सेवा के दौरान अग्निवीरों और नियमित सैनिकों के वेतन, भत्तों तथा मृत्यु-दिव्यांगता लाभों में समानता हो.
पांचवां, रोजगार, शिक्षा, कौशल प्रमाणन और स्वरोजगार के लिए राष्ट्रीय स्तर की ट्रांजिशन अथॉरिटी बनाई जाए. छठा, सीएपीएफ, रेलवे और अन्य सरकारी संस्थानों में घोषित अवसरों को केवल घोषणा या कोटा तक सीमित न रखकर समयबद्ध भर्ती से जोड़ा जाए.
भारत को युवा सेना चाहिए, लेकिन कम अनुभवी सेना नहीं. देश को रक्षा खर्च में दक्षता चाहिए, लेकिन इसकी कीमत सैनिकों के हितों और सैन्य क्षमता से नहीं चुकाई जा सकती. पेंशन का बोझ कम करना जरूरी हो सकता है, लेकिन युद्धक प्रभावशीलता को कमजोर करके नहीं.
अग्निपथ का समाधान इसे खत्म करना या बिना बदलाव जारी रखना नहीं, बल्कि इसकी कमियों को दूर करते हुए इसे आधुनिक युद्ध और भारतीय सैनिकों की जरूरतों के अनुरूप बनाना है. भारत को सस्ती सेना चाहिए, लेकिन सस्ता सैनिक नहीं.

