भवानी शंकर नायक | उल्टा रॉबिन हुड: मोदी सरकार कैसे कॉरपोरेट्स को खिलाती और देश को भूखा रखती है

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की हिंदुत्ववादी सरकार ने अपने 12 वर्षों के शासन में "हिंदू राष्ट्र" की अपनी वास्तविक प्रकृति को उजागर कर दिया है. दुनिया में शायद ही कोई ऐसी सरकार हो जो भारत में मोदी सरकार की तरह इतनी तेजी से कॉरपोरेट कर्जों को बट्टे खाते में डालती हो.

हाल ही में राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण यानी एनसीएलटी ने एस्सेल ग्रुप ऑफ कंपनीज और उसके चेयरमैन श्री सुभाष चंद्र के लिए करीब 6.5 करोड़ रुपये की पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी दी. यह मंजूरी लगभग 22,006.57 करोड़ रुपये के स्वीकृत ऋणदाता दावों के मुकाबले दी गई. इसका अर्थ है कि 1,260 से अधिक लेनदारों को अपने लगभग 99.97 प्रतिशत धन का नुकसान उठाना पड़ सकता है.

एक्सिस बैंक, आरबीएल बैंक, इंडसइंड बैंक, आईडीबीआई ट्रस्टीशिप, जो फ्रैंकलिन टेम्पलटन के लिए कार्यरत है, एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया और एचडीएफसी बैंक जैसे प्रमुख ऋणदाताओं ने इस समझौता योजना का विरोध किया था. इसके बावजूद यह योजना इन संस्थानों पर बाध्यकारी रूप से लागू कर दी गई. सिर्फ एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस में जमा सार्वजनिक धन को 1,322.39 करोड़ रुपये का नुकसान होने की आशंका है.

यह सार्वजनिक धन की निजी हितों के लिए बर्बादी है. छोटे बचतकर्ताओं और जमाकर्ताओं की मेहनत की कमाई कॉरपोरेट लाभ के लिए खत्म की जा रही है. और यह पहली बार नहीं है जब हिंदुत्ववादी सरकार के दौर में कॉरपोरेट कर्जों को बट्टे खाते में डाला गया हो.

मोदी सरकार के कार्यकाल में 2014 से 2025 के बीच 9.87 लाख करोड़ रुपये के कर्ज बट्टे खाते में डाले गए. इनमें 7.21 लाख करोड़ रुपये बड़े कॉरपोरेट्स से जुड़े थे, 2.65 लाख करोड़ रुपये बड़े कारोबारी घरानों से संबंधित थे, जबकि कृषि और संबद्ध क्षेत्रों के लिए केवल 1.67 लाख करोड़ रुपये का हिस्सा बताया गया.

कृषि और संबद्ध क्षेत्र में होने वाले अधिकांश कर्ज माफ या बट्टे खाते में डाले जाने का लाभ छोटे और गरीब किसानों के बजाय मिल मालिकों, बड़े किसानों और उर्वरक कंपनियों को मिलता है. मोदी सरकार के 11 वर्षों के दौरान भारतीय बैंकों ने कॉरपोरेट कर्जों में 19 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि बट्टे खाते में डाली. वहीं कृषि क्षेत्र के कर्जों में बट्टे खाते में डाली गई राशि न केवल अपेक्षाकृत कम रही, बल्कि वित्त वर्ष 2024-25 में इसमें गिरावट भी आई.

हिंदुत्व और कॉरपोरेट पूंजीवाद का गठजोड़?

मोदी सरकार के अपने आंकड़े भाजपा के नेतृत्व वाली हिंदुत्व राजनीति की वास्तविक प्रकृति को सामने लाते हैं. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर हिंदुत्व वास्तव में कॉरपोरेट पूंजीवाद की एक परियोजना बन गया है.

सत्ता में आने के बाद से मोदी सरकार ने खुले बाजार से भारी उधारी ली, कॉरपोरेट कर्जों को बट्टे खाते में डाला और सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाओं को कमजोर करने के बाद उनके विनिवेश या निजीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया. सरकार कॉरपोरेट मुनाफे को बढ़ाने वाली एक मशीन की तरह काम कर रही है.

सरकार "कॉरपोरेट्स के लिए रॉबिन हुड" की तरह काम कर रही है, जहां सार्वजनिक धन को निजी हितों की ओर स्थानांतरित किया जा रहा है. हिंदुत्व कोई स्वतंत्र वैचारिक परियोजना नहीं, बल्कि कॉरपोरेट हितों को आगे बढ़ाने का माध्यम बन गया है.

जनता के लिए नहीं, कॉरपोरेट्स के लिए व्यवस्था?

हिंदुत्ववादी सरकार एक ऐसे शासन मॉडल की तरह काम कर रही है, जहां कॉरपोरेट शक्तियां प्रभावशाली भूमिका में हैं. यह एक तरह की "बुर्जुआ राजशाही" जैसी व्यवस्था है, जिसमें कॉरपोरेट हितों को राज्य और सरकार का संरक्षण मिलता है.

"हिंदू राष्ट्र" की अवधारणा के नाम पर किए जा रहे दावों के पीछे आम लोगों की भौतिक और रोजमर्रा की समस्याओं का समाधान नहीं है. शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और सार्वजनिक निर्माण के लिए संसाधनों की कमी का तर्क दिया जाता है. सड़क, परिवहन और संचार जैसे क्षेत्रों में सार्वजनिक निवेश सीमित रहने की बात कही जाती है. बड़े पैमाने पर औद्योगिकीकरण और रोजगार सृजन के लिए पर्याप्त निवेश नहीं होने का भी आरोप लगाया गया है.

किसानों के लिए बीज, सिंचाई और उर्वरक पर सब्सिडी के लिए पर्याप्त धन नहीं है, लेकिन कॉरपोरेट कर्जों को बट्टे खाते में डालने के लिए संसाधन उपलब्ध हैं. सरकार ऐसी नीतियां अपना रही है, जिनसे आम लोगों की कीमत पर कॉरपोरेट क्षेत्र को लाभ पहुंचता है.

"हिंदू राष्ट्र" की अवधारणा पर सवाल

"हिंदू राष्ट्र" की परिकल्पना एक ऐसी राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था का रूप ले सकती है, जिसमें आम नागरिकों, लोकतांत्रिक संविधान और संवैधानिक अधिकारों की तुलना में कॉरपोरेट हितों को प्राथमिकता मिले.

मोदी सरकार और हिंदुत्ववादी राजनीतिक परियोजना कॉरपोरेट पूंजीवाद के अनुकूल दिखाई देती है. सार्वजनिक कल्याण के बजाय कॉरपोरेट हितों को प्राथमिकता देने का आरोप लगाया जाता रहा है. सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और धार्मिक तनावों का इस्तेमाल आर्थिक मुद्दों और कॉरपोरेट हितों से जुड़े सवालों से ध्यान हटाने के लिए किए जाने की भी आलोचना होती रही है.

केंद्रीय सवाल यही है कि यदि सरकार की आर्थिक नीतियों का लाभ मुख्य रूप से बड़े कॉरपोरेट समूहों को मिलता है, जबकि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कृषि और सार्वजनिक कल्याण के क्षेत्रों में पर्याप्त निवेश नहीं होता, तो इसे लोकतांत्रिक और जनकल्याणकारी शासन के बजाय कॉरपोरेट हितों की ओर झुकी व्यवस्था के रूप में देखा जाना चाहिए.

(भवानी शंकर नायक राजनीतिक अर्थव्यवस्था और सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर लिखते हैं. यह ‘काउंटरकरंट्स’ में प्रकाशित उनके मूल अंग्रेजी लेख का हिंदी में अनूदित अंश है.)

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